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कुछ दिन नोवी साद में

यहां गंदगी नजर नहीं आती। सड़क पर कार और अन्य वाहन भी लोग बड़े सलीके से खड़ा करते हैं। किसी और को कोई भी शिकायत और परेशानी न हो, इसका खयाल रखा जाता है। अपना कूड़ा-कचरा लोग नगर निगम के बड़े कूड़ेदान में ही फेंकते हैं। फुटपाथ और साइकिल ट्रैक भी साफ और किसी भी […]

यहां गंदगी नजर नहीं आती। सड़क पर कार और अन्य वाहन भी लोग बड़े सलीके से खड़ा करते हैं। किसी और को कोई भी शिकायत और परेशानी न हो, इसका खयाल रखा जाता है। अपना कूड़ा-कचरा लोग नगर निगम के बड़े कूड़ेदान में ही फेंकते हैं। फुटपाथ और साइकिल ट्रैक भी साफ और किसी भी तरह के अतिक्रमण से दूर हैं।

पैदल चलना और साइकिल चलाना यहां लोगों को पसंद है। अपने बयालीस दिन के प्रवास में कभी वाहनों का शोर नहीं सुना, हॉर्न भी एक या दो बार ही कहीं किसी वाहन का बजा। हमारे यहां तो वाहन आवाज के साथ ही स्टार्ट होता है, कभी आरती बज उठती है तो कभी कोई गीत की धुन!

मुख्य चौक एक खुले मंच की तरह है। एक ओर गिरिजाघर की तिकोनी ऊंची मीनारें हैं तो दूसरी ओर दुकानें। यहां दिन भर चहल-पहल रहती है। कुछ देर बैठ कर वहां घट रहे हर दृश्य को करीब से देखा। कभी साइकिल पर गुजरती कुछ स्त्रियां, गुब्बारे हाथ में उठाए कुछ बच्चे, विदेशों से आए पर्यटक अपने गाइड को गंभीरता से सुनते हुए, अपनी-अपनी मंजिल की ओर जाते छात्र-छात्राओं की टोली हंसी-ठिठोली करती ओझल हुई, दूर एक वृद्ध महिला अपने एकांत में खोई किसी अदृश्य को निहार रही हैं। यहां की महिलाओं में बराबरी का आत्मविश्वास है। अपने स्त्रीत्व को लेकर उनका नजरिया हिंदुस्तानी महिलाओं से भिन्न हैं।

यहां बैठ कर आसपास दिख रहे सुंदर यूरोपीय स्थापत्य को रेखांकित करने में बहुत सुख है। स्केच बुक में गिरिजाघर की तिकोनी मीनार जिस तरह ठहर रही है, यह अनुभव शब्दातीत हैं। इसे सिर्फ उतारा या उतरता हुआ देखा जा सकता है। यास्मीना को अपने स्केच दिखाता यहां की गलियों के अपने भ्रमण के किस्से सुनाता। वे उम्र में मुझसे दस साल बड़ी हैं, पर बीच मिट्टी का संबंध है। उनके लिए कई बार दही, आलू, पुलाव आदि बनाया तो उन्होंने भी सर्बियाई शाकाहारी ब्रेड आदि बनाए। कभी वे कहतीं कि मेरे पूरे घर में भारतीय खुशबू फैल गई है।

शेशा, इवाना, येलेना आदि कलाकार मित्रों को भी हमने भोजन पर बुलाया। एक कलाकार का घर कुछ खास होता है। यास्मीना का यह फ्लैट भी खास है। एचिंग प्रिंट, चित्र, छोटे मूर्ति शिल्प, किताबें आदि यही घर सज्जा के सामान हैं। मेरे आने के बाद उन्होंने मेरा एक बड़ा चित्र, जो मैंने खास उनके लिए ही बनाया था, अपनी मुख्य दीवार पर लगा लिया है। वे कहती हैं कि अब भी तुम्हारी उपस्थिति यहां है। यह समय भावुकता का नहीं, कला के नए आयाम खोजने का है।

पेत्रोवरादीन के ऊपर बने रेस्तरां के बाहर एक ऊंची मीनार पर एक बड़ी घड़ी दोपहर के दो बजा रही थी। कुछ लोग इसके पास जाकर तस्वीरें खिंचवा रहे थे। दुनव से मुखातिब लोहे की पतली छड़ों से बनी रेलिंग में अनेक छोटे ताले बंधे थे। हर ताले पर कुछ लिखा था। इवाना ने बताया कि ये प्रेम बंध हैं। ऐसी मान्यता है कि प्रेमी-प्रेमिका अपना नाम लिख कर यहां ताला लगाएं तो वे ताउम्र प्रेम में बंधे रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे हमारे यहां मंदिरों, वृक्षों में कलावा, घंटियां बांधते हैं। पचमढ़ी के त्रिशूल भी इन तालों को देख कर याद आए। यहां प्रेम में सदा बंधे रहने की मन्नत मांगी जाती है तो अपने यहां पुत्र, व्यवसाय, स्वास्थ्य, नौकरी, घर आदि की।

महल के तल पर अनेक स्टूडियो हैं। चित्रकार अपने चित्र बना रहे हैं। नोवी साद नगर निगम इन स्टूडियो की देखरेख करता है। चित्रकार मित्र शेशा का स्टूडियो भी यहीं है। गोल छत और दीवारों का उनका स्टूडियो पूरी तरह चित्रों से भरा है। यहां के स्थानीय पेय राकिया से उन्होंने स्वागत किया। इवाना के लिए तुर्की कॉफी बनी। शेशा के चित्र जमीन के चित्र हैं। ठीक उनके व्यक्तित्व की तरह। इवाना का स्टूडियो भी है यहां कला विद्यालय के करीब। एक हथकरघा स्टूडियो भी है। रंग-बिरंगे धागे हैं, लूम हैं। कलात्मक टेपेस्ट्री यहां बनाई जाती है।

यहां भी कभी आकर काम करने का मन है। यह स्टूडियो समय-समय पर कलाकारों के लिए प्रतियोगिता भी आयोजित करता है। स्टूडियो की संचालक ने यास्मीना को पहचान लिया। ये दोनों स्कूल में साथ पढ़ी हैं। यास्मीना बड़े चाव से अपने बचपन के बारे में बताती हैं। अपने प्रवास के दौरान कई बार शाम की सैर के दौरान दुनव सेतु पर होकर पेत्रोवरादीन पहुंचा हूं। यहां शाम को पब में कुछ मित्र एकत्र होते और पूल गेम खेलते। बचपन में कैरम की सीख यहां बहुत काम आई। इस शहर की यात्रा से काफी कुछ सीखा है, जो समय-समय पर अपनी कला में व्यक्त होगा। ‘

सीरज सक्सेना

 

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