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दुनिया मेरे आगेः संवेदना की भाषा

समाज में रहते हुए हर मनुष्य का यह सहज कर्तव्य होना चाहिए कि वह आत्मीय जनों के साथ घटित दुख पर संवेदना व्यक्त करने जरूर पहुंचे। तत्काल न पहुंच सकें, तो बाद में पहुंचे। संवेदना व्यक्त करने से सामने वाले की पीड़ा कम होती है।

समाज उन्हें ही सम्मान की नजरों से देखता है, जिनमें संवेदना बची हुई है।

गिरीश पंकज

कुछ समय पहले पड़ोस में एक युवक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस घर के बाहर भीड़ जमा थी, तो मैंने एक परिचित से मामले के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उस घर में रहने वाले एक युवक की कल मृत्यु हो गई। मैंने कहा- ‘ओह! तब तो संवेदना व्यक्त करने मुझे भी जाना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि आप वहां जाकर क्या करेंगे? उनसे आपका कोई परिचय तो है नहीं! परिचय होता तो कोई बात थी! मुझे उस परिचित की बात कुछ पल के लिए तो ठीक लगी, लेकिन मैं सोचने लगा कि आखिर शोकग्रस्त परिवार हमारा पड़ोसी है। भले ही उनसे कभी कोई संवाद नहीं हुआ, मगर पास-पड़ोस के नाते मुझे जाना चाहिए। इसलिए मैं शोक व्यक्त करने पहुंच गया। मेरे पहुंचते ही गमगीन चेहरे वाले एक सज्जन मेरे पास आकर खड़े हो गए। मैं समझ गया कि वे युवक के पिता हैं। मैंने उन्हें नमस्कार किया। उन्होंने भी नमस्कार किया। मैंने कुछ देर के लिए उनके हाथों को पकड़ कर संवेदना व्यक्त करने की कोशिश की।

वे मौन थे। मैं भी कुछ नहीं बोल पा रहा था। लेकिन संवेदना की भाषा आपस में बात कर रही थी। तब मुझे महसूस हुआ कि हम मुंह से कुछ न बोलें, यह बहुत जरूरी नहीं होता। कई बार हमारा मौन भी संवाद कर लेता है। मैंने जो कुछ कहा, सामने वाले ने उसे बिल्कुल वैसा ही समझा। कुछ देर में खड़ा रहा। उसके बाद सज्जन शवयात्रा की तैयारी में लग गए। मैं भी कुछ देर बैठ कर वापस लौट गया।

मेरी सहज आदत है कि जो मेरे जो परिचित हैं, उनके यहां अगर कोई शोक होता है, तो जाने की कोशिश करता हूं। मैं ही क्यों, हर संवेदनशील इंसान यही करता है। हमारी सामाजिकता ने हमें यह पाठ बचपन से ही पढ़ाया है कि किसी के सुख में शामिल भले न हो सको, दुख में शामिल होने की कोशिश जरूर करो। यह शामिल होना ही हमारी सामाजिकता का प्रमाण है। मैंने कुछ तथाकथित पढ़े-लिखों को देखा है कि वे आमतौर पर किसी के यहां शोक व्यक्त करने नहीं जाते। मैं चकित रह जाता हूं यह देख कर कि कैसे हमारी संवेदना भोथरी होती चली जा रही है। वह व्यक्ति जो कभी किसी की शवयात्रा में शामिल नहीं हुआ, क्या मृत्यु की वेदना की कविता रच सकता है? क्या वह मानवीय संवेदना को पकड़ सकता है? शायद नहीं। वह फूल-पत्ती पर तो कविता कर सकता है, उड़ती चिड़िया पर भी शायद कुछ लिख-पढ़ ले, लेकिन जीवन के कटु सत्य मृत्यु से उपजी पीड़ा को वह शब्द नहीं दे सकता। कभी देगा भी तो वह निष्प्राण सृजन ही साबित होगा।

समाज में रहते हुए हर मनुष्य का यह सहज कर्तव्य होना चाहिए कि वह आत्मीय जनों के साथ घटित दुख पर संवेदना व्यक्त करने जरूर पहुंचे। तत्काल न पहुंच सकें, तो बाद में पहुंचे। संवेदना व्यक्त करने से सामने वाले की पीड़ा कम होती है। उसे अकेलापन महसूस नहीं होता। उसे लगता है कि मेरे साथ बहुत से लोग शामिल हैं। ऐसा करके हम अपने भीतर एक सहृदय मन को ही बचाए रखने में भी सफल होते हैं। अगर हम निर्मम बन कर किसी की मृत्यु पर अपनी तटस्थता को जीते रहेंगे, तो धीरे-धीरे हमारे भीतर का स्पंदित हृदय पथरीला होता चला जाएगा। उस हृदय को तरलता प्रदान करने के लिए यह बहुत जरूरी है कि कहीं जब शोक की खबर आए, तो हम उपस्थित होकर मरहम बनने की कोशिश करें।

इस भागमभाग वाले समय में अब अनेक लोग अपने काम से काम रखते हैं । यह एक हद तक ठीक भी है। लेकिन मुझे लगता है, हमें दूसरों के लिए भी थोड़ा बहुत वक्त निकाल लेना चाहिए। आज हमने किसी के लिए वक्त निकाला है, कल वह हमारे लिए भी वक्त निकालेगा। सामाजिक व्यवहार एकतरफा नहीं चलता। अगर हमें समाज में रहना है, तो सामाजिक नागरिक बन कर रहना होगा। मैंने महसूस किया है कि अनेक लोग असामाजिक जीवन को ही अपनी विशिष्टता समझ लेते हैं। इस प्रवृत्ति के पोषक मुझे कुछ विशिष्ट लोग ज्यादा नजर आते हैं। ऐसा नहीं है कि जिसकी मृत्यु हुई है, उसके परिचितों में वे न रहे हो। मगर किसी परिचित की मृत्यु पर भी उनके परिचित अगर शव-यात्रा या श्मशान घाट में नजर न आएं तो इसे हम क्या कहें? हालांकि कहीं जाना या न जाना किसी का व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि अगर हम सामाजिक प्राणी हैं तो समय निकाल कर कम से कम किसी की मृत्यु पर हमें उसके परिजनों से मिलने जरूर जाना चाहिए।

मृत्यु एक शाश्वत सत्य है। एक दिन सबको जाना है, मगर इस जाने के पहले का जो थोड़ा-बहुत समय हमारे पास है, उसको हम संवेदना के लिए भी बचा कर रखें। खा-पीकर अघाए तो अनेक लोग होते हैं, लेकिन समाज उन्हें ही सम्मान की नजरों से देखता है, जिनमें संवेदना बची हुई है। दरअसल, संवेदना ही आदमी को इंसान बनाने की पहली सीढ़ी है। जो संवेदना की भाषा बोलता है, वही अपने भीतर के उच्च भाव को जाग्रत कर सकता है।

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