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स्वच्छता का समाज

यह कोई छिपी बात नहीं है कि जगह-जगह थूकने से कई तरह के रोग फैलने की आशंका हमेशा बनी रहती है।

स्वच्छ भारत अभियान योजना को प्रधानमंत्री ने दो अक्तूबर, 2014 को शुरू किया था। (फाइल फोटो)

हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर थूकने पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से एक प्रस्ताव पारित किया। बताया गया कि जगह-जगह थूकने से संक्रमणकारी बीमारियां तेजी से फैलती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह प्रस्ताव राज्य विधानसभा में एक सार्वजनिक आचार-संहिता बन कर कानूनी रूप में सामने आएगा और महाराष्ट्र में सार्वजनिक स्थानों पर थूकने और गंदगी फैलाने वालों पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू होगा। अफसोस है कि इस खबर को जनसंचार माध्यमों में जरूरी जगह नहीं मिली।

यह कोई छिपी बात नहीं है कि जगह-जगह थूकने से कई तरह के रोग फैलने की आशंका हमेशा बनी रहती है। विशेषकर बच्चे जल्द ही ऐसे संक्रमण की चपेट में आते हैं। यों भी, भारत भर में इस तरह से कहीं भी थूकने, कूड़ा-करकट फेंकने, अपशिष्ट का समुचित वैज्ञानिक निस्तारण न होने के कारण वातावरण विषैल धूल-कणों और हवा से भरा होता है। बीड़ी-सिगरेट और तंबाकू उत्पादों का सेवन करने वाले लोग खुले में थूकते हैं तो यह दिखने में जितने खराब लगता है, उससे ज्यादा इससे परिवेश में लार-थूक या बलगम से उत्सर्जित होने वाले कीटाणुओं की भरमार हो जाती है। विषैले धूल-कणों से भरी धरती और आकाश के बीच की परत इन कीटाणुओं को पनपने का अनुकूल वातावरण मुहैया कराती है।

आज देश में बहुत सारे लोग सार्वजनिक स्थानों पर पान-गुटखा-तंबाकू चबा कर थूकने वालों से परेशान और असहज तो जरूर होते हैं, पर जब कोई राज्य सरकार इस असभ्य व्यवहार को सार्वजनिक रूप से प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव लेकर आ आती है, तो आश्चर्य कि पढ़े-लिखे लोगों के बीच ही इस पर चर्चा नहीं होती। जो लोग वर्तमान सामाजिक पर्यावरण के साथ-साथ भावी पीढ़ी को स्वस्थ और निरोग देखना चाहते हैं, तब तो उन्हें ऐसे कार्यक्रमों को एक सामाजिक अभियान बनाने की पहल से अवश्य जुड़ना चाहिए। उन्हें इतना तो सोचना ही चाहिए कि जब कुछ लोग अपनी गंदी आदतों को सरकारी और सामाजिक स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए नकारात्मक एका बनाए रख सकते हैं, तो अच्छी पहल के लिए अच्छे लोग एक साथ क्यों खड़े हो सकते हैं!

जगह-जगह थूकने की यह आदत हमारे देश में नेताओं से लेकर आम लोगों तक की है। अचरज की बात यह है कि ऐसे लोग थूकने के लिए केवल सार्वजनिक खुली जगह का ही चुनाव नहीं करते बल्कि निजी-सरकारी संस्थानों के कूड़ेदानों, शौचालयों में भी बाज नहीं आते। यहां तक कि अपने घर के सदस्यों के स्वास्थ्य की चिंता भी इनको नहीं होती और अपनी इस बुरी आदत को ये लोग घर पर भी बनाए रखते हैं।

इस संदर्भ में सालों पुरानी एक बात याद आती है। उत्तर प्रदेश के हाईटेक शहर नोएडा के अट्टा मार्केट में पहले श्रमिक न्यायालय हुआ करता था। न्यायालय उस इमारत की दूसरी मंजिल पर स्थित था। मैं वहां किसी कार्य के सिलसिले में अक्सर जाता था। वहां पहली मंजिल से शुरू और दूसरी मंजिल तक निर्मित सीढ़ियों के किनारे गुटखा, पान-तंबाकू की पीक से दीवारें रंगी मिलती। मैं सोचता कि यहां के अधिकारी यह सब देखते हुए कैसे ऊपर अपने कार्यालय में जाकर चुपचाप बैठ जाते हैं और इस सामाजिक बुराई के विरुद्ध कोई पहल नहीं करते। लेकिन कुछ दिनों बाद जब एक दिन मैं वहां पहुंचा तो देखा कि लोग जहां-जहां थूकते थे, दीवार के उन हिस्सों को बढ़िया ढंग से रंग-रोगन करके उन पर देवी-देवताओं के चित्रों वाली चमचमाती टाइलें चिपका दी गई थीं। उसके बाद वही जगहें साफ-सुथरी दिखने लगीं।

यानी इस मामले में कानून से अलग धार्मिक प्रतीक चिह्नों का सहारा लेकर अपने कार्यालय भवन को गंदा होने से बचाने का एक अनूठा प्रयास किया गया। उपाय कठोर कार्रवाई करके भी किया जा सकता था। हालांकि यह अपने आप में एक फौरी उपाय है, जिसमें केवल उन तस्वीरों से बचने की कोशिश की जाएगी, थूकने के लिए कोई दूसरा कोना खोज लिया जाएगा। सवाल है कि ऐसी आदतों पर काबू पाने के लिए देवी-देवताओं के चित्र का इस्तेमाल करने की नौबत ही क्यों आए! एक ऐसा समाज क्यों नहीं बने, जिसकी आदत में यह बात शुमार हो कि वह जहां-तहां असभ्यों की तरह न थूके।

यह न सिर्फ गंदगी फैलाने या इससे बीमारियों के संक्रमण के लिहाज से निहायत ही एक खराब आदत है, बल्कि ऐसी आदतों से लाचार रह कर या गंदगी वाली जगहों में खुद सहज रह कर एक पिछड़ी हुई संस्कृति को बनाए रखने की आदत है। यों एक सभ्य समाज में इस तरह की आदतें विकसित नहीं होतीं और लोग खुद ही सचेत और जागरूक होते हैं। लेकिन अगर कहीं कानून अनिवार्य हो जाता है तब भी नागरिकों को अपने हित में इस तरह के नागरिक दायित्व विकसित करने चाहिए, ताकि ऐसे मामलों में कानून के दखल देने की जरूरत नहीं पड़े।

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