जिंदगी का सादा पाठ

स्वर और व्यंजनों के मेल से वर्णमाला बनती है। प्राथमिक विद्यालय में ही इस परिभाषा से परिचित हो चुके थे।

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सांकेतिक फोटो।

स्वरांगी साने

स्वर और व्यंजनों के मेल से वर्णमाला बनती है। प्राथमिक विद्यालय में ही इस परिभाषा से परिचित हो चुके थे। लेकिन जीवन में इसे आजमाने में भूल क्यों कर बैठे? हम अपने आसपास ऐसा समाज चाहते हैं, जो बिल्कुल हमारी तरह हो। उसमें कोई बाहरी तत्त्व न हो। लेकिन समाज में हर तरह के लोग होने से ही वह पूरा समाज बन सकता है! हम अगर चाहें कि केवल स्वर ही हो या केवल व्यंजन ही, तो क्या बारहखड़ी लिखी जा सकेगी? क्या वाक्य बन पाएंगे? क्या भाषा समृद्ध हो पाएगी? समाज भी नाना तरह के लोगों, उनके विचारों, भावनाओं और अनुभूतियों से समृद्ध बनता है।

समाज केवल विज्ञान के दम पर नहीं चल सकता, केवल अर्थशास्त्र के बूते नहीं, केवल कॉरपोरेट या ग्लैमर की दुनिया के बल पर नहीं। कोमल स्वरों के साथ उसमें कठोर व्यंजन भी जरूरी होते हैं। कठोर व्यंजनों को परिपूर्ण स्वर बनाते हैं, जिन्हें हम अकार, उकार, इकार की मात्राएं कहते हैं। एक भी मात्रा कहीं इधर से उधर लग जाए तो अर्थ का अनर्थ तक हो जाता है। ‘सर’ कहने पर किसी को दी गई कोई उपाधि ध्यान आती है, ‘सिर’ कहने पर मस्तिष्क। ‘सुर’ कहने पर संगीत के स्वर, केवल मात्रा बदल देने से भाव बदल जाते हैं। वैसे ही लोगों का है। लोग वे ही होते हैं, केवल उनके स्थान परिवर्तन से हमारा उनके प्रति नजरिया बदल जाता है।

एक के पहले शून्य लगने से उसका मूल्य नहीं बदलता, लेकिन अगर वही शून्य एक के बाद लग जाने पर दहाई, सैकड़ा, हजार हो जाता है। जिन लोगों को हम हाशिये पर धकेलने की भूल करते हैं, उनके बारे में इस पाठ को फिर से याद करना बहुत जरूरी है। किसी दिन वे ताकत बन कर आगे आ गए तो उनकी कीमत करोड़ों में भी गिनी न जा सकेगी। गणित का ही सिद्धांत है कि शून्य होने के लिए ‘एक्स’ और ‘वाई’ का योग होना लाजिमी है। एक के मूल्य से ही दूसरे का मूल्य तय होता है। अगर ‘एक्स’ इस अहंकार में रहे कि उसका मूल्य ज्यादा है तो उसका वह मूल्य ‘वाई’ की बदौलत ज्यादा है।

मतलब बाहर से कुछ भी देखना-परखना नहीं है। हम जिन पाठों को सीख कर यहां तक आए हैं, उनके दोहराव की ही जरूरत है। उन पर चिंतन-मनन की जरूरत है। जब हम तन कर खड़े हो रहे हैं, तब हमारे तनने की वजह कोई दूसरा है, यह जानने की जरूरत है। वनस्पति विज्ञान में पेड़ की जड़ें मिट्टी को पकड़े होती हैं या मिट्टी पेड़ को गिरने से बचाती है, यह सोचने का विषय है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। सबको पता है कि पेड़ जितना ऊपर होता है, उसकी जड़ें मिट्टी में उतनी ही गहरी होती है। अगर मिट्टी मना कर दे कि मैं नहीं सहेजूंगी तो पेड़ का क्या होगा? वह एक क्षण में धराशायी हो जाएगा और अगर पेड़ ही कह दें कि वह मिट्टी को पकड़ कर नहीं रखेगा तो? बारिश का पानी मिट्टी को अपने साथ बहा ले जाएगा और वह जमीन में अवशोषित भी नहीं होगा। एक के होने में ही दूसरे का होना निहित है। हम बहुत सारी ज्ञान-विज्ञान की बातें समझ लेते हैं लेकिन जो मूल सिद्धांत है, उन सिद्धांतों को ही भूल जाते हैं।

स्कूली जीवन में उन कक्षाओं को ‘प्राथमिक कक्षाएं’ क्यों कहा जाता था? इसीलिए कि तब जो पढ़ाया जाता है, वह आधार होता है। आधार पक्का हो तो पूरा जीवन पक्का हो सकता है। लेकिन हम नींव को भुला कर अपनी इमारत रचने की बात करते हैं। उन छोटी कक्षाओं में हम बड़ी-बड़ी बातें करना नहीं जानते, लेकिन अपना रबड़-पेंसिल, शॉपर्नर बांट लेते थे। फिर बड़े होते हैं और चीजें साझा करने का आनंद झुठला कर सब कुछ अपने तक सीमित रखने का अट्टहास करने लगते हैं। मैं अपना किसी और को क्यों दूं, इसी से भेदभाव आने लग जाता है। जबकि बचपन में केवल लंच बॉक्स ही साझा नहीं होता, गलती होने पर सजा भी साझी होती है। बाद में हमें ‘अक्ल’ आती है कि अपनी गलती भी दूसरों पर थोपी जा सकती है और ऐसा करते हुए हम कितने झूठे बनने लगते हैं। उसका बोझ हमारे तन पर नहीं, मन पर इतना हावी होने लगता है कि वह धीरे-धीरे मानसिक तनाव, हृदयाघात जैसी बीमारियों की वजह तक बन जाता है।

कितनी सारी मुश्किलों से बचने का कितना सरल उपाय है कि हम सरल रहें। किसी बच्चे के सामने अलग-अलग रंग की मिट्टी रख दीजिए और उसे मिला दीजिए। फिर उससे पूछिए यह किस रंग का है, वह जवाब नहीं दे पाएगा। आप भी जवाब नहीं दे पाएंगे। हम यही तो कर रहे हैं। हम क्यों वैसा नहीं बन पा रहे हैं कि लाल रंग को लाल कहें, हरे को हरा, नीले को नीला और ऐसा कहते हुए किसी तरह का संकोच मन में न लाएं। हर सीधी बात पर हम इतना मुल्लमा चढ़ाए चले जाते हैं कि असली रंग ही खो जाता है। जबकि असली रंग ही असली पहचान होता है। हम इन सीधे-सादे पाठों को कब समझेंगे?

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