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जोड़ने से तोड़ने तक

आजकल सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि मुद्दे सोशल मीडिया के विषय बन गए है और सोशल मीडिया का सबसे बड़ा हथियार मोबाइल ही है। भाई, मित्र, रिश्तेदार, परिचित-अपरिचित, सभी आपस में वाद-विवाद में उलझ गए है।

Author July 1, 2019 2:57 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

सतीश खनगवाल

बात बहुत पुरानी नहीं है। नब्बे के दशक में देश में आर्थिक सुधार जारी थे और इसी दौर में हमारे घर में टेलिफोन लगा था। असापास लड्डू बांटे गए थे। गली-मोहल्ले का पहला टेलिफोन था, इसलिए दो-तीन दिन तक पड़ोसियों का तांता लगा रहा। हमारी बैठक के एक कोने में विराजमान टेलिफोन का दर्शन किसी ‘देव-दर्शन’ से कम नहीं था। जाते समय सभी टेलिफोन नंबर ले जाना नहीं भूलते थे। बातों ही बातों में यह भी कह जाते- ‘अगर हमारा कोई फोन आ जाए तो बुला लेना।’ उनकी इस बात में आदेश, निवेदन, प्रेम, प्रार्थना, सद्भाव सब कुछ होता था।

ट्रिन-ट्रिन…! ओह! कितनी मधुर थी वह ध्वनि उन दिनों। सुनते ही मन प्रफुल्लित हो जाता था। घर वालों के साथ-साथ पड़ोसियों तक के कान भी इस ध्वनि पर लगे रहते थे। कमाल की बात यह होती थी कि अपने फोन कम आते थे और पड़ोसियों के ज्यादा। अगल-बगल वालों को तो घर से ही आवाज देकर बुला लेते थे। किसी-किसी परिचित को बुलाने के लिए एकाध किलोमीटर की यात्रा भी करनी पड़ जाती थी। मगर कोई हील-हुज्जत नहीं। कोई नाराजगी या शिकायत नहीं। जिस परिचित के लिए फोन आता था, उसे बुलाने के लिए दौड़ पड़ते थे। सामने वाला भी पूरा उपकार मान कर ऐसे दौड़ा आता था मानो समय पर नहीं पहुंचा तो ट्रेन छूट जाएगी। जो फोन सुनने आते, उन्हें आमतौर पर चाय-नाश्ता भी दिया जाता। लेकिन न कभी पिताजी के चेहरे पर शिकन देखी और ना मां के चेहरे पर झुंझलाहट।

यह केवल मेरे घर की कहानी नहीं है। यह नब्बे के दशक के हर उस घर की कहानी है, जिसमें टेलिफोन होता था। तब टेलिफोन मानवीय रिश्तों की नई कहानी लिख रहा था। अपने तारों से दिलों के तार जोड़ रहा था। वैमनस्य मिटा कर लोगों को करीब ला रहा था। यहां तक कि बिल्कुल अनजान आदमी, जो खराब टेलिफोन ठीक करने आता था, वह भी घर के सदस्य जैसा हो जाता था। टेलिफोन पर बातचीत करना बहुत महंगा होता था, मगर इसने लोगों को आपस में जोड़ दिया था। महीनों तक पहुंचने वालों पत्रों के स्थान पर बस कुछ ही मिनटों में समाचार और कुशलक्षेम अपनों तक पहुंचाने में टेलिफोन ने अपना पूरा योगदान दिया। जब दूर बैठे माता-पिता अपने बच्चों की आवाजें सुनते थे तो उन्हें लगता था कि बच्चे उनके सामने ही हैं और बच्चों को लगता था कि माता-पिता उनके सिर पर हाथ फेर रहे हैं।

धीरे-धीरे तकनीक का विकास हुआ। टेलिफोन का नया अवतार ‘मोबाइल’ आ गया। नए जमाने का यह छोटा-सा यंत्र घर के किसी कोने की शोभा बढ़ाने वाला नहीं था और न ही किसी तार से जुड़ा हुआ था। एक छोटी-सी चिप के माध्यम से कहीं भी और कभी भी इसका उपयोग आसानी के साथ किया जा सकता था। इसकी उपयोगिता और सुगमता ने इसे लोकप्रिय बना दिया। बड़ी कंपनियों के इस क्षेत्र में कूदने और उनकी आपसी होड़ से न केवल यंत्र सस्ते हुए, बल्कि बातचीत और संदेश भेजने की सुविधा भी सस्ती हो गई। टेलिफोन को अब ‘लैंडलाइन’ की संज्ञा दे दी गई। आम लोगों की तो क्या बिसात, खुद तकनीक के विशेषज्ञों को पता नहीं चला कि ‘दूरसंचार क्रांति’ कब ‘मोबाइल क्रांति’ में बदल गई। आज मोबाइल बातचीत करने या संवाद भेजने का यंत्र मात्र नहीं है, बल्कि सूचनाओं के प्रचार-प्रसार का सबसे सशक्त माध्यम है। किसी भी प्रकार की सूचना, वीडियो, ऑडियो, फोटो आदि तुरंत इससे प्रसारित होते हैं। लोगों को जागरूक बनाने में भी मोबाइल का काफी योगदान है। मोबाइल से अपराधी तक पकड़े जा रहे है। अन्याय, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था के विरुद्ध आम जनता ने मोबाइल के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद की है। मगर इस उजले पक्ष के साथ इसका एक स्याह पक्ष भी है। मोबाइल मानवीय रिश्तों में लकीर खींचने का काम कर रहा है।

आजकल सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि मुद्दे सोशल मीडिया के विषय बन गए है और सोशल मीडिया का सबसे बड़ा हथियार मोबाइल ही है। भाई, मित्र, रिश्तेदार, परिचित-अपरिचित, सभी आपस में वाद-विवाद में उलझ गए है। सब अपने-अपने मत और विचारधारा एक-दूसरे पर थोपने लगे हैं। एक-दूसरे को शक की निगाह से देखा जाने लगा है। लोग आनन-फानन में सूचनाएं प्रसारित करते हैं, बिना यह विचार किए कि उनके द्वारा प्रसारित सूचना कितनी सही है और कितनी गलत। गलत सूचनाओं का क्या प्रभाव पड़ सकता है। घर में जितने सदस्य हैं, उससे ज्यादा मोबाइल। व्यक्ति वास्तविक रिश्तों को छोड़ आभासी रिश्तों को मजबूत करने में लगा है। मोबाइल आज के समय का सबसे आवश्यक और उपयोगी यंत्र है। अगर सावधानी से इसका उपयोग किया जाए तो यह किसी वरदान से कम नहीं। लेकिन अगर इसी प्रकार इसका उपयोग होता रहा तो यह आपसी प्रेम और सद्भाव को निगल जाएगा। रिश्तों की मिठास खत्म कर देगा। आज जब मोबाइल को रिश्तों में दूरी पैदा करते देखता हूं तो बचपन के लैंडलाइन की याद आ जती है।

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