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रिश्तों के तार

पुरानी पीढ़ी को भी यह समझने की जरूरत है कि दुनिया में संचार और संपर्क का जरिया और संजाल फैलते जाने के दौर में आज की पीढ़ी पहले के मुकाबले तेजी से बदल रही है।

Author नई दिल्ली | February 19, 2016 12:03 AM
दुनिया भर के समाजों में परिवार की बुनियाद के रूप में विवाह एक जरूरी पहलू है।(प्रतीकात्मक तस्वीर)

संस्कृति कोई ठहरी हुई व्यवस्था नहीं है। इसमें समाज और उसके भीतर संबंधों के बनने की प्रक्रिया हमेशा एक-सी नहीं रही है। वक्त के साथ खड़ी होती जरूरतों और बनती-बदलती परंपराओं के मुताबिक एक दूसरे के संपर्क में आने और संबंधों के स्वरूप भी बदलते रहे हैं। मसलन, दुनिया भर के समाजों में परिवार की बुनियाद के रूप में विवाह एक जरूरी पहलू है। लेकिन एक दूसरे से अलग समुदायों में विवाह की परंपरा में थोड़ा या ज्यादा फर्क रहा है। आमतौर पर एक समुदाय में कोई रिवायत एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा होती है। हमारे समाज में विवाह के तौर-तरीकों से सभी परिचित रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से जितनी भी शादियों में मेरा जाना हुआ, एक आम बात सब जगह दिखी। कुछ जोड़ों का प्रेम विवाह था। हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है। मगर एक अर्थ में नई बात यह थी कि ये रिश्ते सोशल मीडिया के सबसे ज्यादा लोकप्रिय मंच फेसबुक से शुरू हुए थे। जाहिर है, पहले बातचीत शुरू हुई, वह दोस्ती और प्रेम में तब्दील हुई और फिर वह प्रेम शादी में परिवर्तित हुआ। इनमें से कुछ जोड़े फिलहाल खुशहाल शादीशुदा जिंदगी में हैं और कुछ के घर में तो नन्हे मेहमान की किलकारी भी गूंज चुकी है।

यहां दिलचस्प बात यह है कि कुछ युवाओं के माता-पिता ने तो अपने बच्चों के बीच पनपे प्रेम और फिर इस संबंध को स्वीकार कर लिया और आपसी सहयोग से शादी में परिवर्तित करवा दिया। लेकिन कुछ माता-पिता को इसे मानने में कुछ समय लगा। उनका कहना था कि फेसबुक फालतू वक्त काटने की जगह है और इस पर होने वाली जान-पहचान से बने रिश्ते भरोसेमंद और स्थायी नहीं होते। फिर इन रिश्तों की सत्यता पर भी प्रश्न चिह्न है। आखिर जिस व्यक्ति और परिवार को पहले कभी देखा नहीं, किसी के जरिए कोई जान-पहचान नहीं, कोई दूसरा जानने वाला दोनों के बीच कड़ी भी नहीं, वहां कैसे बेटी या बेटे का संबंध जीवन भर के लिए जोड़ दें। माता-पिता की फेसबुक से बने रिश्तों को लेकर थोड़ी हिचक होना और संदेह करना वाजिब चिंता है। उनकी मानें तो उनके बच्चे अभी इतने परिपक्व नहीं कि यों ही दिल के हाथों मजबूर होकर जीवन का इतना महत्त्वपूर्ण फैसला कर लें।

इसमें कोई शक नहीं कि ज्यादातर युवाओं के लिए फेसबुक वक्त काटने का एक जरिया है। वे छोटी-छोटी बातें और तस्वीरें अपने दोस्तों के साथ साझा करने में इसका इस्तेमाल करते हैं। मसलन वे कहां गए-आए, वहां उन्होंने कैसे मौज-मस्ती की। यों देखा जाए तो ज्यादातर मामलों में किसी के द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गई बातें या तस्वीरें उसके व्यक्तित्व में झांकने के लिए एक खिड़की का काम करती हैं। अगर किसी ने झूठी प्रोफाइल बनाई भी है तो थोड़ी-सी समझदारी से की गई पूछताछ या फिर रूबरू मिलने पर थोड़े प्रयास में उस व्यक्ति की सच्चाई सामने लाई जा सकती है। हालांकि इसमें धोखे की काफी गुंजाइश होती है, फिर भी अगर खोजबीन की जाए तो सच का पता लगाया जा सकता है।

यहां बात सिर्फ इतनी-सी है कि फेसबुक की दुनिया में हुई जान-पहचान के बाद किसी के प्रेम में पड़ते हुए दिल के साथ-साथ दिमाग से भी काम लिया जाए और यों ही किसी पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं किया जाए तो कोई जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति गलत ही निकले। यह वही फेसबुक है जो आज की तारीख में दोस्ती से लेकर प्रेम संबंधों तक के लिए कई बार एक अच्छा माध्यम भी साबित हो रहा है। इसके बावजूद एक सावधानी बरती ही जानी चाहिए। खासतौर पर महिलाओं के लिए यह आभासी दुनिया अभी इतनी भरोसेमंद नहीं हुई है कि उसी बेफिक्री के साथ किसी के साथ जुड़ जाया जाए, जितना कि वास्तविक दुनिया में। इसके अलावा, अगर माता-पिता को भी विश्वास में लिया जाए और मन में यह भरोसा रखा जाए कि वे भी हमारा भला चाहते हैं, तो दोस्ती को रिश्ते में बदलने में मदद ही मिलेगी।

पुरानी पीढ़ी को भी यह समझने की जरूरत है कि दुनिया में संचार और संपर्क का जरिया और संजाल फैलते जाने के दौर में आज की पीढ़ी पहले के मुकाबले तेजी से बदल रही है। इसी के साथ जीवन-शैली से लेकर सोचने-समझने और जीवन के बारे में फैसले लेने के पुराने ढर्रे भी बदल रहे हैं। यह पीढ़ी पुराने रिवाजों से बाहर आकर आजादी से सोचने लगी है। दूसरी ओर, अब माता-पिता भी चाहते हैं कि बच्चे का जीवन-साथी उसकी पसंद का हो, क्योंकि जीवन तो आखिर बच्चे को अपने जीवन-साथी के साथ ही गुजारना है।

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