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संवाद की सीमा

कैसी विडंबना है कि दिनोंदिन तकनीकी खोजें हमारी जीवन-शैली को आसान बना रही हैं, लेकिन हम ज्ञान-विज्ञान को लगभग धक्का मारते हुए और भी धर्मभीरु और खुद को ज्यादा कट्टर साबित करते हुए भक्त बनने को अभिशप्त हो रहे हैं।

Author नई दिल्ली | February 29, 2016 12:24 AM
(सोशल मीडिया)

आज के हालात को देखते हुए क्या हममें से बहुत सारे लोगों को ऐसा नहीं लगता कि बदलते समय के साथ हम और भी असंवेदनशील और अराजक होते जा रहे हैं? गैरों की तो जाने दिया जाए, हमारे भीतर अपनी ही आलोचना को सुनने का साहस अब नहीं बचा है शायद। बहुत मामूली बातों या महत्त्वहीन मुद्दों पर ही लोग आपस में यों भिड़ जाते हैं, मानो लड़ना ही हमारी नियति हो!

दूसरे को अपने अनुरूप बनाने की चाह ने हमें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हम अपने ही देश के विरुद्ध नारे लगा रहे हैं। क्रांतिकारियों द्वारा बरसों के संघर्ष के बाद मिली स्वतंत्रता का खुल कर यों ‘मजाक’ उड़ा रहे हैं जैसे न यह देश, न यहां के नागरिक हमारे लिए कुछ हैं। दूसरी ओर, हर बात को अपने अनुकूल बनाने या होने की शर्त तय करते मुट्ठी भर लोग अब यह तय कर रहे हैं कि हमें किस विचारधारा के साथ रहना चाहिए, किसके साथ नहीं। मानो देश की गरिमा से ज्यादा उन्हें अपनी कथित विचाराधारा से प्यार है।

कैसी विडंबना है कि दिनोंदिन तकनीकी खोजें हमारी जीवन-शैली को आसान बना रही हैं, लेकिन हम ज्ञान-विज्ञान को लगभग धक्का मारते हुए और भी धर्मभीरु और खुद को ज्यादा कट्टर साबित करते हुए भक्त बनने को अभिशप्त हो रहे हैं। सबके अपने-अपने ‘गॉड-फादर’ हैं और सब अपने-अपने उन ‘गॉड-फादरों’ की छवि की रक्षा करने के लिए सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक पर हमेशा मुस्तैद रहते हैं और उनकी आलोचना को सुनने का साहस किसी भी पक्ष में नहीं है। अपने विरोधियों या आलोचकों को ‘सबक’ सिखाना अब दोनों तरफ के भक्त-संप्रदाय का मुख्य शगल बन गया है।

इसके बरक्स जब से सोशल मीडिया पर फोटो-शॉप करके चीजों को प्रस्तुत करने का चलन बढ़ा है, तब से यह भी पता नहीं चल पाता कि असली क्या है और नकली क्या! ऐसे में कई बार भ्रम पैदा होता है तो यह स्वाभाविक ही है। इस तरह के बेढब और बेमानी मुद्दों में देश और जनता को हर वक्त फंसा कर रखा जा रहा है, जिसका कोई मतलब नहीं। तिल का ताड़ बना देना अब फैशन की श्रेणी में आ गया है। एक झूठ को इतनी दफा दिखाया और बताया जाता है कि कमजोर दिमाग वाले आखिरकार उसे सच मानने लगते हैं।

हर समय की नारेबाजी, बयानबाजी, हिंसा, तोड़-फोड़ ही अब हर किसी की चिंता का विषय है। देश कहां जा रहा है, इस पर सोचने की फुर्सत किसी के पास नहीं दिखती। गरीब-बेरोजगार कहां या किस स्थिति में है, देश में रोजगार की क्या हालत है, कितने लोगों की थाली खाली रह जा रही है, स्कूल-कॉलेज की क्या हालत है, दूरदराज के इलाकों में रहने वाले गरीब लोगों की अस्पतालों तक कितनी पहुंच है, इसकी फिक्र न नेताओं को है, न चिंतकों को, न बुद्धिजीवियों को और भक्त-संप्रदाय तो खैर सोचने की जरूरत भी नहीं समझते। उन्हें तो मतलब अपने-अपने कथित आंदोलनों और विचाराधाराओं के ‘हिट’ होने से है।

मुझे कभी-कभी वाकई हैरानी होती है उन लोगों के विचारों को सुन-पढ़ कर जिन्हें देश-समाज के भीतर हमेशा फासीवाद के सिवाय कभी कुछ अच्छा नजर ही नहीं आता। जबकि तमाम उथल-पुथल के बीच देश में समांतर और भी बहुत कुछ चल रहा होता है, देश विज्ञान और समाज के स्तर पर बहुत बड़ी-बड़ी कामयाबियां हासिल कर रहा होता है। सच तो यह है कि चाहे कोई माने या न माने, भरे पेट क्रांति और क्रांतिकारी बातें बहुत आसानी से कर ली जा सकती हैं, लेकिन भूख से दो-चार लोगों को पहले अपने पेट की फिक्र पहले सताती है। भरे पेट क्रांति के नारे भी उतने ही उत्साह से लगते हैं, जितने उत्साह से राम मंदिर बनवाने के। दोनों ही तरफ की कथित विचारधाराओं में ‘सहनशक्ति’ की गुंजाइश शायद खत्म हो चुकी है।

अक्सर ऐसा महसूस होता है कि हम एक देश होते हुए भी कई छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए हैं। हर किसी ने अपने हिस्से के आगे एक रेखा खींच रखी है। न कोई इधर से उधर जा सकता है, न उधर से इधर आ सकता है। वाद-विवाद और झगड़ों ने मानसिकताओं को पंगु बना दिया है। दुनिया विज्ञान और तकनीक के मामले में निरंतर आगे बढ़ती चली जा रही है। और एक हम हैं कि अभी तक जाति-धर्म और विचारधाराओं की अंधी गलियों में भटक रहे हैं।

एक लोकतांत्रिक देश होते हुए भी हमने इसे अघोषित इमरजेंसी के मुहाने पर ला खड़ा किया है। मत-भिन्नताएं कहां किस देश में नहीं होतीं। मगर इसका मतलब यह नहीं होता कि हम एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं। देश, दुनिया और समाज सिर्फ बेहतर संवाद से ही चल सकता है। न जाने कहां आ गए हैं हम, जहां आलोचना का विकल्प हिंसा बनती जा रही है।

(अंशुमाली रस्तोगी)

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