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दुनिया मेरे आगे: अस्तित्वहीनता का बोध

हाशिये के समूहों की चर्चा करते हुए अक्सर स्त्री, दलित, आदिवासी और अब किसान वर्ग की बात की जाती है, लेकिन इसी समाज में लैंगिक रूप से एक अलग समूह भी अपनी पहचान के संकट से जूझता रहा है। इसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। प्राकृतिक रूप से अपनी यौन विकृति के कारण समाज द्वारा इन्हें व्यंग्य, घृणा और तिरस्कार का शिकार होना पड़ता है।

वंचित वर्गों को सुविधा मुहैया कराने का प्रयास। फाइल फोटो।

कविता भाटिया

अक्सर आते-जाते मैं उसे देखती थी और कभी अगर ‘वह’ न दिखाई दे तो शोर-गुल वाली वह सड़क मुझे सूनी लगती थी। उस दिन चौराहे की लालबत्ती पर चटक रंग की साड़ी और कुछ गहरा मेकअप लगाए ताली बजाते, इठलाते वह रोज की तरह वाहनों के बीच अपनी जगह बनाते हुए लोगों से उनकी दया दृष्टि की अपेक्षा कर रही थी।

अचानक असामाजिक प्रवृत्ति के कुछ युवक उसे देख कर सीटी बजाते हुए भद्दी टिप्पणियां और अश्लील मजाक करने लगे। पहले तो वह भी कुछ कुपित हुई और उसने आपत्ति जताई तो बात बढ़ भी गई, पर बाद में वह सड़क के दूसरे किनारे चली गई। उसके चले जाने के बाद भी कुछ देर माहौल गरम रहा। उन युवकों के गलत और अपमानजनक व्यवहार पर कुछ कहने के बजाय वहां मौजूद बाकी लोगों की नजर और बातों में ‘उसके’ प्रति घृणा और तिरस्कार स्पष्ट दिख रहा था। कुछ लोगों ने तो उस वर्ग की असलियत और उनके कर्म पर अपना ज्ञान बघारना शुरू कर दिया था।

मैंने उसे आमतौर पर ऊंचे स्वर में बोलते ही सुना था। लेकिन पता नहीं क्यों, वह उस दिन संयत और शांत थी। मेरा मन भारी हो गया और मैंने नजर चुराने की कोशिश की। यह महज संयोग था कि उसी दिन के अखबार में ट्रांसजेंडर समुदाय को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए दिल्ली के नोएडा में एक मेट्रो स्टेशन को उन्हें समर्पित करते हुए उसे ‘प्राइड स्टेशन’ कहा गया था। इसके बरक्स जो हकीकत थी, वह मेरे सामने थी।

सामाजिक संरचना पर विचार करते हुए विचलित मन सोचने लगा कि समय और जरूरत के मुताबिक गठित सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में कुछ वर्ग कुद को उच्च मानते हुए मुख्यधारा के समूह कहलाने लगे तो कुछ वर्ग उपेक्षा और हीनता का शिकार होकर किस तरह हाशिये पर चले गए। मुख्यधारा माने जाने वाले समाज ने हाशिये के वर्गों और समूहों के खिलाफ अमानुषिक व्यवहार और अत्याचार भी किया।

हाशिये के समूहों की चर्चा करते हुए अक्सर स्त्री, दलित, आदिवासी और अब किसान वर्ग की बात की जाती है, लेकिन इसी समाज में लैंगिक रूप से एक अलग समूह भी अपनी पहचान के संकट से जूझता रहा है। इसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। प्राकृतिक रूप से अपनी यौन विकृति के कारण समाज द्वारा इन्हें व्यंग्य, घृणा और तिरस्कार का शिकार होना पड़ता है।

मोटे अनुमान के अनुसार, अपनी पहचान और सामान्य जीवन जीने की चाह रखने वाले इस समुदाय की आबादी भारत में बीस लाख से ऊपर है। समाज से सामान्य व्यवहार की अपेक्षा की लंबी जद्दोजहद में वर्ष 2011 में इन्हें ‘अन्य’ की श्रेणी में रखा गया तो 2013 में इन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ।
यों कहने को हम महाभारत में शिखंडी को एक किन्नर पात्र के रूप में तो धनुर्धर अर्जुन को वृहन्नला के पात्र के रूप में पढ़ते-जानते रहे हैं।

अर्जुन ने वृहन्नला के रूप में राजा विराट की नृत्यशाला में उनकी पुत्री उत्तरा को नृत्य सिखा कर अपने अज्ञातवास के दिन सुरक्षित बिताए थे। मुगल काल में सुल्तान अलाउद्दीन का सलाहकार मलिक काफूर भी किन्नर था, जो सुल्तान का दाहिना हाथ कहा जाता था। लेकिन आज समाज में रहते हुए अनुपस्थिति का दंश झेलने वाला यह समुदाय अपनी बुनियादी सुविधाओं तक से वंचित है। परिवार से परित्यक्त होने का दर्द, सामाजिक हिकारत, भेदभाव की पीड़ा और हाशिये पर जिंदगी जीने की इनकी व्यथा भयावह त्रासदी से कम नहीं।

सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ‘आइडेंटिटी डिसरिगार्ड’ यानी पहचान की उपेक्षा की बात करते हुए कहते हैं कि इस धारणा के मूल में दूसरों की बिल्कुल अवहेलना करने और उनके साथ किसी भी प्रकार से न जुड़ने और समान मूल्यों और आचार-व्यवहार का बिल्कुल त्याग कर देने का विचार केंद्रीय होता है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीसरे जेंडर’ के रूप में इन्हें मान्यता देने के साथ इन्हें वे सारे अधिकार देने को भी कहा है, जो अन्य पिछड़ी जातियों को हासिल है। यों संविधान के अनुच्छेद पंद्रह-ए के अनुसार कहा गया गया है कि सभी नागरिकों के साथ धर्म, जाति, लिंग, नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। पर समाज के कुछ लोगों की संवेदनहीनता और अमानवीयता इंसानियत को दागदार करती है।

दूसरी ओर अपने परिवार और समाज द्वारा उपेक्षित गौरी सावंत ने गायत्री को देह व्यापार व शोषण की अंधेरी दुनिया से निकाल ममता की एक अनूठी मिसाल कायम की है।

कैसी मानसिकता है हमारी? अपने घर में नवजात और नई नवेली बहू के आगमन पर या अन्य खुशियों में हम उन्हें अपना भागीदार बना कर उनकी पवित्र मानी जाने वाली दुआओं की आस रखते हैं, पर प्राकृतिक रूप से मिले उनके तीसरे पक्ष के जीवन को हम उनकी अस्तित्वहीनता मान लेते हैं और उनके प्रति संवेदनहीन हो जाते हैं।

ऐसे में सरकार द्वारा इनके उत्थान के लिए किए जा रहे प्रयास इन्हें मुख्यधारा से जोड़ते हुए एक आशाजनक भविष्य की उम्मीद तो देते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत हम सबको मालूम है। इस वर्ग को भी अपनी क्षमताओं को पहचानते हुए समाज में अपना योगदान देने के लिए तत्पर रहना चाहिए। तभी लोकतंत्र में मिला समानता का अधिकार सही अर्थों में सार्थक होगा।

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