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दुनिया मेरे आगे: कौशल की जगह

कारीगरी अगर किसी भी काम में शिल्प-पटुता है तो हमारे चारों और न जाने कितने ही कारीगर मौजूद हैं। यहां तक कि कॉलेज में किसी सेमिनार या उत्सव के लिए छात्राएं जिस तरह से बोर्ड बनाती हैं, वह उनकी कलात्मकता और कारीगरी का अच्छा-खासा सबूत होता है। करीने से बनाए गए कागज के फूल दृश्य या परिदृश्य मन को बांध लेते हैं।

हैंडलूम पर चलते कारीगर के हाथ और दिखती कुशलता।

‘इसे कहते हैं क्राफ्टिंग’- पानी की नाली के अंदर नए डाले गए पाइप को बारीक सीमेंट से जोड़ते व्यक्ति ने मुझसे बातचीत करते हुए कहा। ‘क्राफ्टिंग’ शब्द पर मैं चौंकी, फिर सोचा कि पानी जैसे पदार्थ को रोक कर रखने के लिए दो पाइपों को बारीकी से जोड़ने का काम शिल्प जैसी दक्षता की ही मांग रखता है तो वह काम ‘क्राफ्टिंग’ ही तो है। कामिक बुल्के के अंग्रेजी-हिंदी कोश में इसके समकक्ष शब्द ‘कौशल’, ‘शिल्प-पटुता’ आदि सुझाए गए हैं। कुल मिला कर इसका सार-सत्व कारीगरी है।

कलाकारी और कारीगरी दो अलग-अलग शब्द हैं। एक का संबंध कला, यानी जिसमें भाव को अधिक से महत्त्व देने से है तो दूसरे का संबंध शिल्प से है। पर मुझे पहली बार पता चल रहा था कि कारीगरी केवल गहने गढ़ने में, कपड़े या साढ़ियां बुनने में या काष्ठ धातु या अन्य सामग्री से मूर्तियां, फर्नीचर या बर्तन बनाते हुए ही नहीं, बल्कि पानी के बेकार पाइप को ठीक करना भी कारीगरी ही है। एक बार मेरे पिताजी ने बताया था कि उनकी नानी अच्छी कारीगर थीं। वे तरह-तरह के पकवान और अचार बनाने में माहिर थीं। पाक कला के संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग अक्सर किया जाता है।

एक बार हलवाई की दुकान पर यह पूछने पर, कि आज समोसे नहीं हैं, उसने उत्तर दिया- ‘नहीं आज कारीगर नहीं आया’। किसी मिठाई को बनाने में माहिर व्यक्ति या कपड़ा सिलने या कोट-पैंट की खास तरह की कटिंग करने वाला कुशल व्यक्ति भी कारीगर ही कहलाता है। मेरे यहां पहाड़ में कारीगर शब्द किसी भी काम में दक्षता दिखाने के अर्थ में अक्सर प्रयुक्त होता है। यहां तक कि चारा काटने में कुशलता दिखाने पर भी कारीगरी दिखाई जा सकती है।

कारीगरी अगर किसी भी काम में शिल्प-पटुता है तो हमारे चारों और न जाने कितने ही कारीगर मौजूद हैं। यहां तक कि कॉलेज में किसी सेमिनार या उत्सव के लिए छात्राएं जिस तरह से बोर्ड बनाती हैं, वह उनकी कलात्मकता और कारीगरी का अच्छा-खासा सबूत होता है। करीने से बनाए गए कागज के फूल दृश्य या परिदृश्य मन को बांध लेते हैं।

इस कारीगरी से अक्सर सामना होता रहा है। एक बार अपने पैतृक गांव में ऊपर पहाड़ थोड़ा निचाई पर देखने में धरती का एक टुकड़ा जैसा दिखाई देता था, मानो कोई खूबसूरत गलीचा बिछा हो। पूछने पर पता चला कि यह भगत की थली है, यानी जमीन का वह छोटा टुकड़ा, जिस पर सब्जियां और फूल उगाए जाते हैं। भगत के बारे में पता चला वे गांव के वयोवृद्ध जुलाहा हैं। यहां वे अपनी कारीगरी को फूलों की क्यारियों में भी दिखा रहे थे, जहां फूल गलीचे की तरह सौंदर्य में और रंग योजना में उगाए गए थे।

काम करने के तरीके और तहजीब भी कई तरह की होती है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करती है। एक और वे लोग होते हैं जो काम को बला की तरह टालते हैं। उन्हें केवल काम खत्म करने से मतलब होता है। जैसे-तैसे जल्दी-जल्दी वे इस तरह का काम करते हैं कि उसे सुधारने में ही ज्यादा वक्त लग जाता है।

दूसरी ओर वे लोग होते हैं जो काम को अपनी पूरी दक्षता के साथ करते हैं। जब तक उनके भीतर संतोष नहीं होता, वे काम करते हैं। काम को दक्षता के साथ करने की अभिरुचि ही इस तरह की कारीगरी को जन्म देती है। यह अनायास नहीं है उपले रखने के बिटौरों पर या पुराने कपड़ों से बनाई गई कथरियों पर भी ग्रामीण महिलाएं खूबसूरती से आकृतियां उकेरती हैं।

शिल्प-पटुता या क्राफ्ट के अनेक उदाहरण विश्व भर में मिलते हैं। लकड़ी के खिलौने, गुड्डे-गुड़िया, खूबसूरत तोरण-द्वार, खूबसूरती से सजाए गए फूल और तो और कागज भी इनके माध्यम हैं। जापान का ओर्गेमी आर्ट उनमें से एक है, जहां कागज के जरिए खूबसूरत कलाकृतियां बनाई जाती हैं। यों केवल जापान ही नहीं, लगभग सभी जगह बच्चों को क्राफ्ट कक्षा में कागज की इन खूबसूरत आकृतियों को बनाना सिखाया जाता है। पाठशालाओं में अब भी बच्चे इस तरह कागज-गत्ते और अन्य वस्तुओं से क्राफ्ट की चीजें बनाते हैं और कुछ तो सालों सहेज कर भी रखी जाती हैं। अक्सर दूसरी या तीसरी कक्षा में ट्रे, झोंपड़ी और मिट्टी के खिलौने, जैसे फल या सब्जियां बनाना ‘क्राफ्ट’ में शामिल रहता है।

बदलते समय ने इस कौशल को प्रभावित किया है। गांवों का तो पता नहीं, लेकिन शहरों के बाजार में सहज उपलब्ध वस्तुओं ने बच्चों से उनकी शिल्प-पटुता को छीन लिया है। कहा जाता है बच्चों का सबसे प्यारा खिलौना वह होता है, जो वे खुद अपनी कल्पना से बनाते हैं। छड़ी का घोड़ा बना कर या फिर गेट या खाट पर सवार होकर उसे वाहन बना कर खेलना अब भी बच्चों का प्रिय शगल है। प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ कहानी तो हम सबको याद होगी, जहां बालक हमीद जब दादी के लिए चिमटा खरीद लाता है तो बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि ‘यह कोई खिलौना है’? तब हमीद कहता है- ‘खिलौना क्यों नहीं है? हाथ में ले लिया फकीरों का चिमटा हो गया, कंधे पर रख लिया बंदूक हो गई’। इस कल्पना के साथ अगर बच्चों का हस्त कौशल भी शामिल हो जाए तो बच्चों की रचनात्मकता को नया आयाम मिल सकता है।

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