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दुनिया मेरे आगेः तेज धूप में घनी छांव

उन रास्तों की तेज धूप तब धूप नहीं रहती, जब आगे कोई सुंदर संसार आपके इंतजार में हो। तेज धूप में भीगते हुए जब हम लौट रहे थे, तब मन में यही खयाल था।

Author April 29, 2016 3:30 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

उन रास्तों की तेज धूप तब धूप नहीं रहती, जब आगे कोई सुंदर संसार आपके इंतजार में हो। तेज धूप में भीगते हुए जब हम लौट रहे थे, तब मन में यही खयाल था। वापसी के कदमों में संतुष्टि थी, आंखों में आश्वस्ति और ढेर सारा उत्साह। हम वापस लौट रहे थे देहरादून के रायपुर ब्लॉक में स्थित केशरवाला संकुल के राजकीय प्राथमिक विद्यालय, शिरेकी से। शिरेकी तक पहुंचने का रास्ता किसी ख्वाब की तरह खुलता है। दोनों तरफ ऊंची पहाड़ियां और पेड़, बीच में एक मुस्कराता-सा रास्ता।

शिरेकी एक छोटा-सा स्कूल है। एक कमरे वाला। हालांकि जिस इमारत में स्कूल है, वहां दो कमरे हैं। उनमें से एक में आंगनबाड़ी चलती है। एक कमरे वाले उस स्कूल में हम पहुंचे, जहां कक्षा एक से पांच तक के तेरह बच्चे बैठते हैं। हां, इस स्कूल में सिर्फ तेरह बच्चे हैं और एक शिक्षिका उर्मिला और उनके साथ एक शिक्षा मित्र हैं शीला कैंतुरा। एक सामान्य से सरकारी स्कूल की एक सामान्य-सी कक्षा दिखती है। बच्चे अपनी पढ़ाई में मगन और शिक्षिकाएं उनके साथ घुली-मिली।

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यों भी, स्कूल पहुंची शिक्षिकाओं की खाली कुर्सी मुझे अच्छी लगती है कि हम उन्हें ढूंढ़ें कि वे कहां हैं और वे बच्चों के किसी झुंड में से निकल कर कहें कि हम यहां हैं। बच्चे कहानियां सुनाने में मगन थे, कक्षा चार का हरमन तो खुद की लिखी कहानी सुना रहा था। हमने उससे पूछा कि तुमने कहानी कैसे लिखी, कैसे मन किया! इस पर उसने बताया कि मैंने तो बहुत सारी कहानियां लिखी हैं… बस मेरे मन में आती हैं और मैं उनको लिख लेता हूं। इतने छोटे-से बच्चे की यह बात दिल को छू गई।

शिक्षिकाएं इस तरह की रचनात्मकताओं के पीछे खड़ी हैं, लेकिन नजर आने में संकोच होता है उन्हें। कक्षा चार की किरन अंग्रेजी में सुंदर-सी हैंड राइटिंग में खूब सारे वाक्य लिख कर लाई। उन वाक्यों से खेलते-खेलते किरन लव्स टू ईट कढ़ी-चावल से लेकर आॅरेंज, राजमा-चावल, मैंगो, वाटर मिलन, चॉकलेट और चकोतरा तक की यात्रा तय कर लेती है। हर वाक्य के साथ उसका अंग्रेजी के शब्दों का संसार खुलता जाता है और साथ ही उसकी पसंद की खाने की चीजों का भी। बल्कि जब उसे अंग्रेजी के शब्द बोलते देखा तो उसके उच्चारण ने दिल को लुभाया।

दिलचस्प यह भी है कि कोई शिक्षिका उसके यह जानने का श्रेय नहीं लेना चाहतीं। ‘ये बच्चे खुद बहुत अच्छे हैं…’, शिक्षिका उर्मिला ने धीरे से कहा और अंजलि की कॉपी में कुछ लिखने लगीं। बच्चों को ढेर सारी कहानियां सुनाते हुए हमारे साथ गर्इं सीआरसीसी मंजू नेगी मानो खुद ही बचपन के किसी हिस्से में चली गई थीं। कहानियों को पढ़ लेना काफी नहीं है, उनका आनंद लेना बच्चों के लिए पहली जरूरत है। यह बात वे जानती हैं। हाव-भाव के साथ कहानियां सुनाते हुए बिल्ली का जिक्र आने पर बिल्ली और चूहे का जिक्र आने पर चूहे का अभिनय करते हुए पूरी कहानी का संसार वहां खुलता है। बस एक कमी रह गई थी कि कहानी के अंत में पूछे जाने वाले सवाल थोड़ा बेमजा-से लगते हैं।

शिरेकी एक छोटा-सा गांव है। शीला मैडम बताती हैं कि आसपास कोई भी बच्चा ‘आउट आॅफ स्कूल’ यानी स्कूल से बाहर नहीं है। यहां बच्चे जितने हैं, सब स्कूल आते हैं और रोज आते हैं। जाहिर है, रोज स्कूल आना स्कूल में मन लगने के कारण ही संभव होता होगा। मंजू ने बताया कि हमारी कोशिश होती है कि बच्चों को स्कूल आना इतना अच्छा लगे कि वे रोज स्कूल आएं।

इन शिक्षिकाओं के पास संसाधनों की कमी को लेकर कोई शिकायत नहीं मिलती। बस कुछ जिज्ञासाएं हैं कि कैसे वे अपने बच्चों को और बेहतर ढंग से पढ़ा सकें। बच्चों का आत्मविश्वास शिक्षक की ही पूंजी है, उन्हें लाड़-दुलार से रखना, उनमें आत्मविश्वास से भर देना दरअसल पढ़ाने से पहले की प्रक्रिया है, जिसे ये शिक्षिकाएं अपनी तरह से करने का प्रयास कर रही हैं… चुपचाप बिना किसी दिखावे या प्रचार के। शायद उन्हें भी नहीं पता कि उनकी कोशिशों के रंग कितने चटख हैं कि बच्चे भरपूर भरोसे के साथ कहते हैं कि मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूंगा, तो कोई बच्ची कहती है कि मैं तो डॉक्टर बनूंगी और किसी के इरादे पुलिस इंस्पेक्टर बनने के हैं। ये इन बच्चों के अभिभावकों को खुश करने वाली बातें भर नहीं हैं, बल्कि इन सपनों के पीछे एक ठोस आत्मविश्वास खड़ा है।

एक तरफ हजारों लाखों लोग शिक्षा जगत की चुनौतियों में उलझे हुए हैं दूसरी ओर कोई सीआरसीसी या कुछ शिक्षक खामोशी से किसी संगतराश की तरह बच्चों का व्यक्तित्व गढ़ने में लगे हैं। ऐसे स्कूलों को देख कर सरकारी स्कूलों से उठ रहे लोगों के भरोसे को सहेज लेने को जी चाहता है।

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