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दुनिया मेरे आगेः रियायत की चमक

हमारे बाजारों में यह फार्मूला विदेश से आया है। ‘रियायती कीमत’ का ढांचा अनेक सामानों के साथ चिपका होता है। मौसम बदलता है तो तैयार कपड़े या फिर किसी अन्य सामान को उस पर अंकित कीमत के मुकाबले अस्सी फीसद तक कम मूल्य में दे दिया जाता है।

Author March 15, 2018 3:13 AM
हम दो दोस्त शिमला के माल रोड पर टहल रहे थे। वहीं एक प्रसिद्ध ब्रांड की दुकान में नजर गई जहां लटकी पीले रंग की जैकेट अच्छी लगी। मैं उस दुकान की तरफ बढ़ने लगा तो मित्र बोले दो-चार दिन में ‘आॅफ’ लगने वाला है यानी इसकी कीमत गिरने वाली है, तब यही जैकेट चालीस प्रतिशत रियायत पर मिलेगी।

संतोष उत्सुक

हम दो दोस्त शिमला के माल रोड पर टहल रहे थे। वहीं एक प्रसिद्ध ब्रांड की दुकान में नजर गई जहां लटकी पीले रंग की जैकेट अच्छी लगी। मैं उस दुकान की तरफ बढ़ने लगा तो मित्र बोले दो-चार दिन में ‘आॅफ’ लगने वाला है यानी इसकी कीमत गिरने वाली है, तब यही जैकेट चालीस प्रतिशत रियायत पर मिलेगी। हुआ भी यही। कुछ दिन बाद मैंने वह जैकेट रियायत के मौसम में खरीद ली। एक मशहूर ब्रांड के नाम से बेचा जाने वाला जीरे का सौ ग्राम का पैकेट उस पर अंकित छियालीस रुपए मूल्य के बजाय सिर्फ तीस रुपए का मिला। प्लास्टिक के एक सामान पर तीन सौ अस्सी रुपए छपा था, जबकि दो सौ चालीस में बेचा जा रहा था। ये कुछ चीजें थीं। सैकड़ों और भी चीजें थीं। उन पर कीमत जितनी मर्जी छापो और चाहे जितने में बेचो। दशकों से यह फार्मूला हर तरफ हिट है ‘ग्राहक को भेड़ बना कर रखो और ऊन निरंतर उतारते रहो’।

हमारे बाजारों में यह फार्मूला विदेश से आया है। ‘रियायती कीमत’ का ढांचा अनेक सामानों के साथ चिपका होता है। मौसम बदलता है तो तैयार कपड़े या फिर किसी अन्य सामान को उस पर अंकित कीमत के मुकाबले अस्सी फीसद तक कम मूल्य में दे दिया जाता है। किसी वस्तु की कीमत में बहुत ज्यादा छूट या रियायत की घोषणा कर ग्राहकों पर दबाव बनाया जाता है। कई बार एक के साथ एक या कभी दो स्वेटर भी मुफ्त दिए जा रहे होते हैं। एक हजार रुपए का स्वेटर ढाई सौ में मिलता है। मशहूर ब्रांड वाली कंपनियां उन्नीस सौ रुपए की शर्ट पांच या साढ़े पांच सौ रुपए में लुटाती हैं। कितने सामान पर मूल्य छपा नहीं होता। यह ग्राहक की मोलभाव क्षमता पर निर्भर है कि वह कितने में ले सकता है। कितने ही ऐसे सामान होते हैं, जिनकी कीमतें ग्राहक की शक्ल और अक्ल देख कर तय की जाती हैं। कपड़े के थान पर मूल्य नहीं दर्ज होता है, वह प्रति मीटर की दर से बिकता है। ग्राहक को कोई अंदाजा नहीं कि कोई कपड़ा गुणवत्ता की कसौटी पर कैसा है।

कपड़ों को छपे मूल्य के नियम से सरकार ने बख्शा हुआ है। लेकिन अब रेडीमेड वस्त्रों ने जिस तरह बाजार पर कब्जा कर लिया है, उसमें यह जरूरत महसूस होती है कि कपड़े के थान पर भी मूल्य अंकित होना चाहिए, ताकि रियायत के मौसम में इस पर भी छूट मिले। हालांकि कपड़े को इससे छूट देकर सरकार ने कपड़ा उद्योग और विक्रेताओं को फायदा पहुंचाया है। दवाइयों का मामला बेहद संजीदा रहा है। सम्मानित कंपनियों की भी पांच रुपए कीमत की कोई दवाई पच्चीस से तीस रुपए में बिकती रही है। एक जैसी गुणवत्ता वाली दवाइयों की कीमत में कोई एकरूपता नहीं है। कई बार सौ या हजार प्रतिशत अधिक कीमत वसूल ली जाती है। अब जेनेरिक दवाइयां लिखी जा रही हैं, मगर फिलहाल लोगों को बहुत समझ में नहीं आता है। इसलिए उसके लाभ की पहुंच सीमित है।

एक तरफ तो स्थानीय प्रशासन अक्सर सुनिश्चित करता है कि छोटे मोटे ढाबे वाले कीमतों की सूची लगाएं, खाने-पीने की चीजों की कीमतें निर्धारित हों। दूसरी तरफ संबंधित सरकारी विभाग का किसी भी स्तर का कारिंदा चीजों पर चिपकाए दाम के संबंध में चौकन्ना तो क्या, जागरूक भी नहीं दिखता और कहीं नजर नहीं आता। इस मामले में किसी पर कोई र्कारवाई होना तो दूर की बात है। यह सीधे, और सरे बाजार व्यावसायिक ठगी है। हर मौके पर सामान जुटा लीजिए, जो चाहे कीमत तय कर दीजिए। ग्राहकों के अलावा सारे पक्ष लाभ में होते हैं। व्यापारी, सरकार और प्रशासन पैसा कमाने में जुटे रहना चाहते हैं। आम जनता को टीवी पर नाच-गान से लेकर धारावाहिक देखने में व्यस्त कर दिया गया है। दूसरी ओर, सुविधाप्राप्त उच्च वर्ग अपनी जिंदगी के शाही अंदाज को बनाए रखने में मस्त रहता है। ‘ब्रांड’ का दीवाना हो चुका भारतीय ग्राहक अनेक जगहों पर ठगा जा रहा है। सच तो यह है कि उसके सामने विकल्प भी धीरे-धीरे समेटे या फिर खत्म किए जा रहे हैं।

सारा समाज अपने में मगन दिखता है इस अंदाज में कि ‘हमें क्या लेना!’ वस्तु और उसकी कीमत को लेकर छाए धुंधलके के बीच एक साधारण व्यक्ति मूल्य का सही अंदाजा लगा पाने का आत्मविश्वास नहीं रख पाता। ऐसे में अब यह जिम्मेवारी सरकार और प्रशासन की बनती है कि वह हर वस्तु की उत्पादन लागत को आधार मान कर निर्माता, थोक और खुदरा विक्रेता के लाभांश सहित हर चीज पर मूल्य को अंकित करना अनिवार्य बनाए और उसी पर बिक्री सुनिश्चित करे। कीमतों के मामले में पारदर्शिता तभी आएगी और आम ग्राहकों को उचित मूल्य पर सामान मिल सकेंगे।

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