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प्रकृति के साए में

आज जरूरत है कि हम अपनी संवेदना को बचाए रखें। अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त न हो जाएं कि हमारे बीच से प्रकृति के बाकी तोहफे गायब हो जाएं। कुछ जिम्मेदारी सरकार ले और कुछ जवाबदेही हम भी लें.

jansatta, duniya mere aage, column, nature, culture, kahma sharma articleचित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

उस दिन सुबह के लगभग पांच बजे थे। बाबूजी इस बेला को ब्रह्म-मुहूर्त्त कहते थे। घड़ी की टिक-टिक एकांत में थोड़ा कोलाहल घोलने की जिद पर आमादा थी। बाहर धुंध ही धुंध पसरा पड़ा था। ठंडी हवा की तेज झोंकों में कुहरा रूई की फाहों की तरह क्रमिक गति से इधर-उधर उड़ रहे थे। अंधेरा अभी छंटा नहीं था। मेरे आंगन में मालती की लत्तियों के बीच बने घोंसले से एक अजनबी चिड़िया मेरे साथ उठने की सूचना अपनी मधुर आवाज से मुझे दे रही थी। अभी भी लोग सो रहे थे। लेकिन मेरे साथ मेरी अपनी चिड़िया भी जग रही थी। जीवन की निस्सारता में सरसता की सुगंध मुझे इसी चिड़िया की चहचाहट से मिलती है। लेकिन उस दिन वह घोंसले में छिपी थी और मैं भी।

धीरे-धीरे उजाले का प्रवेश होने लगा था। घर की धीमी बत्तियों को मैं बंद करने में मशगूल हो गया। रसोई में जाकर अदरक वाली चाय बनाने और पीने की जिद अभी छूटी नहीं है। सुबह की चाय, दरअसल चाय से बढ़ कर कहीं बहाना है दिन की शुरुआत का। चाय बनाते हुए मैंने देखा कि रसोई की खिड़की पर लटकी वही नन्ही चिड़िया मेरी खिड़की के शीशे पर अपना चोंच मार रही है। मैं निस्तब्ध होकर उसके मुख-मंडल को पढ़ लेना चाहता था। मुझे कभी लगता कि वह अपने परछाई से प्यार-दुलार कर रही है तो कभी लगता कि वह उसे पा लेना चाहती है। शीशे पर चोंच की आवाज खट-खट-खट…! इस आवाज से मैं मंत्रमुग्ध था। इसमें मुझे संगीत की धुन सुनाई दे रही थी। इसमें जीवन का सुंदर लय था।

मेरे छोटे-से आंगन में फूल से लदी हुई मालती और अपराजिता का साम्राज्य है। लाल और उजले फूलों के बीच अपराजिता का नीला पुष्प मानो प्रकृति का अनुपम शृंगार कर रहा हो। फूलों के मादक गंध से मधुमक्खियां भाव-विभोर लग रही थीं। फूलों से परागकण लेते हुए शायद उनका शरीर नीले रंग का हो गया था। प्रेम का अहसास तो मुझे मधुमक्खियों के इन्हीं करतबों से पता चलता है। हालांकि यह मेरी खामखयाली भी हो सकती है। मैंने देखा है कि फूल भंवरे को अपने भीतर कई घंटों तक समेटे रखता है। जब वह बाहर आता है तो पहले की तरह फिर से पंख फैलाए उड़ जाता है। घनी लताओं के बीच अब भी ततैया के कई छत्ते हैं। छत्ते के बीच ‘रानी’ का निवास है। आसपास के पेड़ों पर पक्षियों के घोसले हैं। मैं उन पक्षियों के नाम नहीं जानता। मेरे मित्र और पड़ोसी भी उसे नहीं पहचानते। दिन के उजाले में कई आमंत्रित और कुछ मेहमान पक्षियों की भीड़ होती है। इसमें गौरैया, कबूतर, मैना, कौवा भी शामिल होते हैं। सभी दिन में अठखेलियां कर रात में न जाने कहां छिप जाते हैं। गौरैया मेरे घर के भीतर तूफान मचाए रखती है। गिलहरी का तो हाल ही मत पूछिए। उसका आधिपत्य तो सभी मेहमान स्वीकारते हैं।

मैं जानता हूं कि जिस चिड़िया को मैं नहीं पहचान पा रहा हूं वह कहीं दूर देश से आया हुआ मेरा मेहमान है। लेकिन जब पानी खोजते उन चिड़ियों को भटकते देखता हूं तो दिल कराह उठता है। ‘अतिथि देवो भव’ की संकल्पना शायद केवल मनुष्यों के लिए है, इन विदेशी चिड़ियों के लिए नहीं। मैं मां के हाथ की बनी खजुरी और कटोरे में पानी हर रोज अपने घर के आसपास फुदकने वाली चिड़ियों को देता हूं। लेकिन इससे न उनका जी भरता है, न मेरा।

बहरहाल, दिल्ली में मेरा घर और आंगन एक तरह से यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क के बीचो-बीच है। आज जब पूरी दिल्ली प्रदूषण से तंग है, ऐसे समय में भी यहां थोड़ी राहत है। आमतौर पर मैं यहां का तापमान कम पाता हूं। फिर भी दिल्ली की गरमी के बारे में यहां का कौन व्यक्ति अनजान होगा। एक दिन कमरे में पंखा चल रहा था। इसी बीच इधर-उधर फुदकते हुए गौरैया-युगल में से एक दुर्घटनावश लहूलुहान गया था। मैंने करीब से उन दोनों की आंखों में प्रेम और दर्द को पढ़ा था। मुझे याद है मेरी पत्नी उस दिन बहुत रोई थी। मैं भी परेशान हुआ था। पूरे आंगन में गौरैया का झुंड उतर कर मुझसे मौत के कारण को जान लेना चाहता था।

आज जरूरत है कि हम अपनी संवेदना को बचाए रखें। अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त न हो जाएं कि हमारे बीच से प्रकृति के बाकी तोहफे गायब हो जाएं। कुछ जिम्मेदारी सरकार ले और कुछ जवाबदेही हम भी लें। तभी हमारी पारिस्थितिकी बची रह पाएगी।

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