आत्मनिर्भरता की सीख

कुछ दिनों पहले की बात है। शाम का वक्त था। घर आए कुछ मेहमानों के साथ चाय पर इधर-उधर की बातें हो रही थीं।

कुमकुम सिन्हा

कुछ दिनों पहले की बात है। शाम का वक्त था। घर आए कुछ मेहमानों के साथ चाय पर इधर-उधर की बातें हो रही थीं। बीच बीच में हंसी-ठहाके भी लग रहे थे। अचानक एक सहेली, जो लगभग पचपन साल की है, और थोड़ी बातूनी भी, बोल पड़ी- ‘कुछ सालों बाद तो इस तरह की मजलिसें लगनी बंद हो जाएंगी।’ एक पुरुष मित्र तुरंत कारण पूछ बैठे। ‘क्योंकि तब न हमारा जमाना रहेगा, न चाय पर कोई बुलाने वाला।’ सहेली का सीधा जवाब था।दरअसल, हमारे समय में काम का स्पष्ट बंटवारा हुआ करता था। घर के काम लड़कियां और महिलाएं करती थीं और बाहर के काम लड़कों और पुरुषों के जिम्मे था। जहां तक पढ़ाई-लिखाई की बात है, लड़कों का यह मुख्य काम था, लड़कियों का नहीं। उनका काम था खाना बनाना, घर सहेजना, मेहमानों के आने पर उनका स्वागत करना और जब, जितना समय मिले उसमें पढ़ाई कर लेना।

समय के साथ इस प्रथा में सकारात्मक बदलाव आया है। अब लड़कियों से भी केवल पढाई की अपेक्षा रखी जाने लगी है। इस मामले में स्पष्ट परिवर्तन आया है माता-पिता के दृष्टिकोण में। एक या दो बच्चे होने के कारण उनका लिंगभेद वाला नजरिया बदल-सा गया है। वे बेटा-बेटी दोनों को आगे बढ़ने के समान अवसर देने लगे हैं। दोनों के भविष्य को पुख्ता और समृद्ध बनाने में जुटे हैं। अगर बेटे को इंजीनियरिंग-डाक्टरी या मैनेजमेंट की पढ़ाई करा रहे हैं, तो बेटी को भी। यह बहुत अच्छी बात है। मगर पढ़ाई का हवाला देकर बच्चों को घर के कामकाज, सामाजिकता और नाते-रिश्ते की अहमियत नहीं सिखाना-बताना कहां तक जायज है? ऐसे बच्चे वैवाहिक जीवन में अपना परिवार कैसे संभालेंगे।

चर्चा चल ही रही थी कि मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘भई, अब तो स्थिति यह है कि अगर लड़का कहेगा कि उसे खाना बनाना नहीं आता, तो लड़की भी वही बात दोहराएगी।’ माहौल अब उतना खुशनुमा नहीं रहा, जितना शुरू में था। सहेली एकदम से गंभीर हो गई। वह गहन चिंता में डूब गई। उसका एक बेटा और एक बेटी है। दोनों ने इंजीनियरिंग की पढाई की है और अच्छी कंपनी में अच्छे वेतन पर कार्यरत हैं। बहुत होनहार हैं। उनके ज्ञान और उपलब्धियों की पहले भी चर्चा हुआ करती थी और आज भी होती रहती है।

कितना अच्छा होता अगर जिंदगी जीने के लिए इतना ही काफी होता। लेकिन अफसोस, इतना काफी नहीं है। इसके साथ व्यावहारिकता, दुनियादारी, घर के कामकाज आना बहुत जरूरी है। इन मामलों में हमारे बच्चे अगर अव्वल न हों, तो बहुत चिंता की बात नहीं, लेकिन बिलकुल ही अनाड़ी हों तो चिंता की बात जरूर है। मेरी सहेली दिन भर घर के कामों में व्यस्त और उसके दोनों बच्चे नौकरी में व्यस्त। नाश्ता-खाना-कपड़ा से लेकर उनके कमरे सहेजने तक के सारे काम वह खुद करती है। जब स्कूल-कालेज में थे तब उन्हें पढ़ाई से फुर्सत नहीं होती थी और अब नौकरी की व्यस्तता। यह कहानी सिर्फ उसकी नहीं, आज के ज्यादातर घरों की है।

‘अरे भाई, इतनी क्या फिक्र करनी है। पैसों से सब कुछ संभव है। आज के बच्चे बहुत कमाते हैं। घर के काम उन्हें खुद नहीं आता तो क्या हुआ, नौकर-चाकर रख लेंगे।’ मेरी दूसरी सहेली के विचार से सभी सहमत हो गए। तालियां बजीं और माहौल फिर से हल्का हो गया।कोरोना महामारी की दौर से गुजरते हुए मुझे अपनी सहेली की वे बातें बार-बार याद आती रहीं। क्या सचमुच पैसों से सब कुछ संभव है? क्या वर्तमान समय में भी वह ऐसी बातें करती? अगर कोरोना की जंग जीत गई होती, तो उससे इस पर जरूर बात करती। पर इतना तो तय है कि अब कोई भी इस तरह की बातें नहीं करेगा।

देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में रह रहे हमारे कितने ही नौजवान लड़के-लड़कियों का जीवन बंदी की घोषणा होते ही पंगु-सा बन गया। सौभाग्य से उनके पास पैसे थे, खाना बनाने के सारे साधन थे, पर दुर्भाग्य यह कि वे खुद खाना नहीं बना सकते थे, क्योंकि उन्होंने यह काम कभी सीखा ही नहीं। कभी उन्होंने या उनके माता-पिता ने इस बिंदु पर सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं की। बस यही सोच कर कि पैसा सब कुछ है, जी-जान से पढ़ाई और उसके बाद नौकरी करते रहे, पैसे बटोरते रहे।

इस महामारी से हम सबको कई सबक मिले हैं। एक सबक बच्चों और उनके माता-पिता को भी मिला है- अपना हाथ जगन्नाथ का। अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का। उन्हें बताएं कि पढ़ाई के साथ-साथ घर के काम सीखना भी अति आवश्यक है। ध्यान रहे कि आत्मनिर्भरता रातों-रात नहीं आती। यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसकी सफलता सतत प्रयास पर आधारित है। ऐसा प्रयास बच्चों का जीवन समृद्ध बनाएगा। उनमें जिंदगी की चुनौतियों का सामना करने का आत्मविश्वास भरेगा।

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