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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में सीमा श्रोत्रिय का लेख : हालात के मारे

एक पेट से भरे व्यक्ति को आप कुछ खाने के लिए देंगे तो वह नहीं खाएगा। लेकिन अगर भूखे को रोटी दी जाए तो वह उसे खाकर अपने पेट की आग बुझाएगा।

Author नई दिल्ली | July 21, 2016 6:30 AM
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सड़क पार करते हुए अचानक मेरी नजर एक ऐसे लड़के पर पड़ी, जिसका चेहरा बहुत मासूम था और वह कूड़े के ढेर के पास कुछ गुनगुनाते हुए कूड़ा बीन रहा था। उसकी प्यारी मुस्कान देख और मधुर गाने को सुन कर मैं वहां रुक गई। मुझे लगा कि लगभग बारह-तेरह साल का वह बच्चा कूड़े में हाथ डालते हुए एक तरह से अपना भविष्य खोज रहा था। मैं उस बच्चे से बात करने की अपनी इच्छा को रोक नहीं पाई। पूछने पर उसने अपना नाम ‘गुड्डू’ बताया। फिर मैंने पूछा कि क्या तुम स्कूल नहीं जाते हो? उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उसे अपने पास प्यार से बुलाया और ममता भरे अंदाज में फिर अपनी बात दोहराई। उसने जो बताया उसके मुताबिक उसके घर के हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि अपना पेट भरने के लिए इसके सिवाय कुछ दिमाग में नहीं आया। उसके पिताजी बीमार थे और उनके इलाज पर इतना पैसा लग गया कि घर में खाने तक की मुश्किल है। मां बर्तन मांज कर बच्चों के साथ गुजारा करती हैं।

यह बात मन में कौंधती है कि ऐसे बच्चों की इस जिंदगी के पीछे क्या मजबूरी हो सकती है? लगता है कि इस तरह के बच्चों की कहानी परिवारों के मजबूर हालात और लाचारगी बयान करती है। हमारे यहां सरकारी तौर पर सामाजिक सुरक्षा का सवाल कोई मायने नहीं रखता, जिसके चलते खासकर बच्चों को ऐसे हालात से दो-चार होना पड़ता है। आज तेजी से बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में यह जानना जरूरी है कि स्कूल जाने की उम्र में आखिर क्यों गुड्डू जैसे हालात के मारे बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं? कई का नाम स्कूलों में दर्ज होने के बावजूद उनमें से बहुतों को कूड़े के ढेर में अपने भविष्य से संघर्ष करते देखा जा सकता है।

दरअसल, ये बच्चे बेबस और हालात के मारे होते हैं। इनकी गरीबी इन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करती है। मगर अध्यापकों का काम शायद ऐसे बच्चों को फटकार लगाने भर तक सीमित रह गया है। वे कभी समस्या के दूसरे पहलू को नहीं देखते। जब किसी को बहुत कोशिश के बावजूद रोटी नहीं मिले, भूख सताए, तो वह क्या करे? इस मसले पर सरकारी इंतजाम और नियम-कायदे की क्या हालत है, सभी जानते हैं। लेकिन ऐसे परिवारों और उनके बच्चों के सामने भीख मांगने, चोरी या कोई अपराध करने और कूड़ा बीनने के बीच कौन-सा विकल्प बेहतर है? हर हाल में पिसना तो बच्चे को ही है। परिवार, समाज और व्यवस्था की ओर इस काम में झोंक दिए जाने के बाद वह बच्चा बड़ी ‘लगन’ से ‘अपने’ काम को पूरा करता है। इस उम्र में ही अनजाने ही वह परिवार की जिम्मेदारी उठा लेता है। उसे इतना भी नहीं पता होता कि यह उस पर थोपी गई गलत जिम्मेदारी है। लेकिन वह भी क्या करेगा? उनके घर का माहौल और उनका समूचा सांस्कृतिक परिवेश ही ऐसा होता है, जहां ऐसा करना उनकी मजबूरी है और उनके मां-बाप तक के सामने इसे एक सहज काम मानने के बजाय कुछ दूसरा सोचने का विकल्प नहीं होता।

जो साधन-संपन्न है, उसके लिए कूड़ा दूर रहने की चीज है, जबकि वंचित लोग उसमें मजबूरीवश अपने लिए अवसर की तलाश करते हैं। एक पेट से भरे व्यक्ति को आप कुछ खाने के लिए देंगे तो वह नहीं खाएगा। लेकिन अगर भूखे को रोटी दी जाए तो वह उसे खाकर अपने पेट की आग बुझाएगा। किसी भी जतन से नहीं मिले और अगर अंदर विद्रोह पैदा हो जाए तो वह छीन कर भी खा लेगा। सवाल है कि क्या यह हम सबका फर्ज नहीं है कि बच्चों को नैतिक और मानवीय मूल्यों से लैस करें? समाज के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें इन समस्याओं के निराकरण के लिए कोई न कोई पहल करनी होगी। स्कूलों में इस तरह के बच्चों को डांटने-फटकारने की बजाय उन्हें बड़े प्यार से समझाना होगा। उनकी मनोवैज्ञानिक स्थिति और भावनाओं को अहमियत देते हुए उन्हें स्कूल में आने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना होगा। उन्हें अच्छी और मनोरंजक कविताएं-कहानी सुनाई जाएं, खेल खेलने के हालात दिए जाएं, उनके लिए अनूकूल वातावरण बनाया जाए। अगर स्कूल में उनका मन लगने लगेगा तो कूड़े में अपने काम की चीजें बीनना एकमात्र विकल्प नहीं रहेगा।

इसमें कोई शक नहीं कि इन बच्चों के ऐसे हालात में पलने-बढ़ने का सबसे बड़ा कारण इनके मां-बाप का अशिक्षित होना है। शिक्षा से गरीबी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि ऐसे लोग पहले जिंदा रहने के लिए अपना पेट भरें या पहले पढ़ाई के बारे में सोचें? सामाजिक दृष्टि से गरीबों के प्रति हमारी और सरकार की जिम्मेदारी बनती है। प्राकृतिक संसाधनों पर गरीबों का पहला हक मानने की हमको आदत बनानी चाहिए, ताकि उन्हें भी जिंदगी जीने का हौसला मिल सके।

(सीमा श्रोत्रिय)

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