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दुनिया मेरे आगेः एकांत की चाह

एकांत किसे नहीं चाहिए! एकांत सामान्य तौर पर असामाजिक या समाज-विरोधी नहीं होता, बल्कि यह मनुष्य होने की अनिवार्य मांग है, जहां व्यक्ति अपने जीवन में झांक सके, अपनी इच्छानुसार कल्पनाएं कर सके और बार-बार अपना ही नया रूप गढ़ सके।

Author Published on: March 26, 2016 3:19 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

एकांत किसे नहीं चाहिए! एकांत सामान्य तौर पर असामाजिक या समाज-विरोधी नहीं होता, बल्कि यह मनुष्य होने की अनिवार्य मांग है, जहां व्यक्ति अपने जीवन में झांक सके, अपनी इच्छानुसार कल्पनाएं कर सके और बार-बार अपना ही नया रूप गढ़ सके। लेकिन इस एकांत से स्त्री को वंचित रखने की कोशिश होती है। सवाल है कि स्त्री के एकांत से पुरुष को डर क्यों लगता है? क्या इसलिए कि एकांत ही वह जगह है जहां स्त्री सबसे ज्यादा स्वाधीन होती है। और यह स्त्री की स्वाधीनता ही है जो पुरुष को सबसे ज्यादा अखरती है। लेकिन स्त्री की भी चाहत होती है कभी बोझिल पलों के बाद, कभी जाने-अनजाने आसपास से थोड़ा अलग होकर, तो कभी पति-बच्चों-परिवार से कुछ क्षणों के लिए दूर होकर, कभी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय अपने लिए निकाल कर सुरक्षित एकांत की।

हर पल किसी न किसी की निगाहों के दायरे में रहने की अपनी ऊब नहीं होती क्या? इसलिए हर स्त्री उस ‘स्पेस’ की कामना करती है, जिसमें वह बिल्कुल अकेली रह कर अपने अस्तित्व को जी सके। कितना सुखद होता है बिना टोकाटाकी के यों ही चहलकदमी करना या घंटों बैठ कर आसमान की ओर ताकना। यह जगह घर की बालकनी हो सकती है, पार्क का कोई कोना और सड़क के किनारे भी। यहां तक कि किसी भीड़ भरे मॉल की कोई सूनी बेंच भी, जो स्त्री को यह मौका देती है कि वह आने-जाने वालों को देख सके या अपने अकेलेपन में खोने का लुत्फ उठा सके, उसके मन को सकून मिल सके। शर्त इतनी-सी है कि वह महिलाओं के लिए सुरक्षित हो।

विडंबना यह है कि किसी भी अकेली महिला को देखते ही संदिग्ध चरित्र का मान लिया जाता है। उसके अकेले बैठने, टहलने या आसमान को ताकते रहने के आपत्तिजनक मायने निकाल लिए जाते हैं, अस्वाभाविक समझा जाता है। जहां ये सवाल मुखर नहीं होते, पुरुषों की आंखों से झांकते हैं, ज्यादा उग्र हुए तो हमले की शक्ल ले लेते हैं। इस शक्की बिरादरी में पुलिस भी शामिल है, जिसका एक काम सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अकेली औरत के साथ जिस पुलिस को दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए, वह कई बार दुश्मन की तरह पेश आती है। समाज की तरह वह पूछ बैठती है कि अकेले वहां बैठ कर क्या कर रही थी! कोई बताए कि अकेले बैठना या अकेले टहलना किस दंड विधान के तहत जुर्म है? मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब वह महिला गरीब या श्रमिक वर्ग की हो। तब तो उस महिला के साथ कुछ अपमानजनक संबोधन अपने आप जुड़ जाते हैं। रक्षक को भक्षक बनते देर नहीं लगती। गरिमामय पदों को सुशोभित करने वाले लोग भी यह कहने से नहीं चूकते कि भले घर की लड़कियों को देर रात कहीं आना-जाना ही नहीं चाहिए।

क्या यह हैरत की बात नहीं है कि जैसे-जैसे शिक्षा का फैलाव हो रहा है, मानव अधिकारों के कसीदे पढ़े जा रहे हैं, स्त्री को फिर से गुलाम बनाने कोशिशें भी चल रही हैं। महिलाओं के लिए ड्रेस कोड तय हो रहे हैं, ताकि वे खुद को दमनकारी परंपरा के अनुकूल ढक कर रखें। ‘लाडली’ और ‘बेटी बचाओ अभियान’ रचने वाला समाज औरतों को दिन ढलते ही घरों में कैद करने का पक्षधर है। ऐसे ही लोग बलात्कार जैसी जघन्य घटना के लिए भी महिला को ही दोषी ठहरा देते हैं। अकेलेपन को चरित्र के साथ जोड़ कर एक नया और दमनमूलक सांस्कृतिक व्याकरण बनाया जा रहा है।
क्या यह एक मजाक नहीं है कि स्त्री के आचरण के बारे में हमेशा पुरुष ही तय करेगा कि स्वाधीनता कहां खत्म होती है और उच्छृंखलता कहां से शुरू होती है? स्त्री के लिए पुरुष ही कानून बनाता है, वही मुकदमा भी चलाता है और वही फैसला भी सुनाता है। लेकिन जो स्त्री अब गुलामी की जंजीरें पहनने के लिए तैयार नहीं है, अपने व्यक्तित्व पर पुरुष के ‘कॉपीराइट’ को खारिज करती है और अपने जीवन को अपनी तरह से परिभाषित करना चाहती है। मगर हमारा सामाजिक ताना-बाना ही ऐसा है कि हम महिलाओं के पृथक अस्तित्व की कल्पना नहीं कर पाते। समाज की नजर में वह स्त्री हमेशा गलत होती है, जो पुरुषों द्वारा खींची गई रेखाओं को स्वीकार नहीं करती!

चमकते हुए आधुनिक कहे जाने वाले शहरों, साफ-सुथरे मुहल्लों और सभ्य कहे जाने वाले लोगों के बीच महिलाओं के प्रति इतनी संकीर्णता क्यों है? जरूरत है सोच में बदलाव की। अगर हम वाकई मानव स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, आधुनिकता के उपासक हैं और मानव अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो हमें अपने विचार बदलने होंगे। महिलाएं अब अपने ऊपर थोपे हुए विचारों और परंपराओं को नहीं ढोना चाहतीं। वे अपने विवेक से काम लेना चाहती हैं, अपनी निजी जिंदगी के नियम-कायदे खुद रचना चाहती हैं। उन्हें समाज चाहिए तो अपना एकांत भी चाहिए। महिलाओं की चौहद्दी तय करने के बजाय उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, उनकी गरिमा का खयाल रखा जाए, यह उनका अधिकार है। भयमुक्त समाज केवल पुरुषों को नहीं, स्त्रियों को भी उतना ही चाहिए।

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