दुनिया मेरे आगे : रोशनी का अंधेरा

लगभग दो दशक पहले सफर के दौरान एक गांव के पास हमें ‘मिल्की वे’ दिखा था और ‘एयर ग्लो’ के सारे रंग भी दिखे थे। आज उस तरह की साफ आकाशगंगा देखने के लिए शायद हिमालय जाना पड़े।

Author Updated: January 26, 2021 7:39 AM
openआसमान का सांकेतिक फोटो।

दीप्ति वि कुशवाह

लगभग दो दशक पहले सफर के दौरान एक गांव के पास हमें ‘मिल्की वे’ दिखा था और ‘एयर ग्लो’ के सारे रंग भी दिखे थे। आज उस तरह की साफ आकाशगंगा देखने के लिए शायद हिमालय जाना पड़े। कुछ साल पहले मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर के पास के जंगल में हजारों जुगनुओं को देखना भी याद है। टिमटिमाते तारों को देख कर न जाने कितने लोगों ने अपने किसी गुजर चुके प्रिय व्यक्ति को याद किया है। टूटते तारों से मनौतियों की डोरियां बांधी गर्इं। आकाशी नीलिमा प्रेमपूरित पंक्तियों की प्रेरणा बनी।

तारों को देख कर समुद्र में कितने नाविकों ने अपने पथ खोजे हैं। बचपन में रातों में बच्चों को ध्रुवतारा और सप्त ऋषिमंडल देखना सिखाया जाता था। न जाने कब से चांद को ‘मामा’ कहा जाता है। गरमी की रातों में आंगन में बिस्तर बिछते और बच्चे आकाश में तारे खोज-खोज कर बंटवारा करते… ये तेरा, वह मेरा।

अब अपने चांद-तारों को नंगी आंखों से देखने के लिए शहर से दूर किसी ऐसे स्थान पर जाना पड़ता है, जहां आकाश शहरी-प्रकाश की मार से बचा हुआ है। शहरों की रोशनी ने रात के अंधेरे को नुकसान पहुंचा कर हमारे हिस्से के तारों को दूर कर दिया है। हम उजाले की संतानें अब एक नए तरह के प्रदूषण का सामना कर रही हैं। प्रकाश प्रदूषण, जिसे अंग्रेजी में फोटो-पॉल्यूशन कहा जाता है, की चर्चा अभी कम है, पर इसे खतरे की दहलीज पर पहुंचते देर नहीं लगेगी। यह दरअसल कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था का अत्यधिक, गलत या आक्रामक उपयोग है।

हमारे शहरों के आकाश रात को रोशनी से भरे रहते हैं। स्ट्रीट लाइट, होर्डिंग, दुकानों के बोर्ड, गाड़ियों की बत्तियां आदि। घर में कंप्यूटर, लैपटॉप, फ्रिज, मोबाइल स्क्रीन, नाइट बल्ब… जितने अधिक उपकरण, उतनी अधिक लाइट, रात में भी। हम बिजली पर होने वाले खर्च की बात नहीं कर रहे। चिंता की बात यह है कि गैरजरूरी प्रकाश मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधों, सबके स्वास्थ्य और जीवनचर्या के संतुलन को बिगाड़ रहा है। एक होती है ‘सर्केडियन रिद्म।’ प्रकाश-प्रदूषण इस लय को बिगाड़ देता है। यह लय हमारे शरीर की वह आंतरिक घड़ी है जो हमें उजाले में उठने और अंधेरे में सोने को कहती है। अधिक प्रकाश होने के कारण वातावरण में एक ‘उजलापन’ आ जाता है, जिससे आंतरिक जैव-घड़ी का संतुलन गड़बड़ा जाता है। रात को अधिक प्रकाश से आकाश धुंधला हो जाता है और तारे दृष्टि के दायरे से लुप्त।

गांव के आधुनिक होने के साथ शहर और संपन्न हो रहे हैं, देश उच्च तकनीकी से लैस हो रहा है… कृत्रिम प्रकाश की मांग बढ़ रही है। समाज अत्यधिक और आक्रामक रोशनी की सुरंग में घुसा जा रहा है। प्रकाश-संश्लेषण से पौधे अपनी खुराक तैयार करते हैं। इसके लिए सूर्य-प्रकाश चाहिए। अंधेरे में वे ‘फाइटोक्रोम’ नामक यौगिक का निर्माण करते हैं जो उनके स्वस्थ मेटाबॉलिज्म के लिए जरूरी है। जाहिर है, अंधेरे की कमी से इस यौगिक के निर्माण की प्रक्रिया खंडित होती है।

अब खबरें आने लगी हैं कि कई वृक्ष बेमौसम फूल रहे हैं या एक ही प्रजाति के वृक्षों में से किसी ने मौसम पर नहीं, बाद में फल दिए। पेड़-पौधों को वसंत, वर्षा या शिशिर के ‘शुभकामना संदेश’ नहीं मिलते, वे तो प्राकृतिक कारकों के आधार पर ही फूल-फल के लिए तैयार होते हैं। कृत्रिम प्रकाश इस संतुलन को बाधित कर रहा है। पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, सबके दिल चाक हैं इस मारक रोशनी से। यह चकाचौंध कुछ जीव-प्रजातियों को विलुप्ति की तरफ धकेल रही है। सबसे खतरनाक यह है कि प्रवासी पक्षियों का जीवन हमारे द्वारा उत्पन्न प्रदूषण के मकड़जाल में फंस कर खत्म हो रहा है। चांद-तारों की स्थितियों से रास्ता तय करने वाले गंतव्य पर कैसे पहुंचेंगे, सोचने की बात है!

प्रकृति ने शारीरिक गतिविधियों को दिन और रात के क्रमवार आने-जाने के हिसाब से निर्मित किया है। कृत्रिम तेज रोशनी हमारे रेटिना को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर सकती है। ‘मेलॉटोनिन हारमोन’ की भूमिका हमारे प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाने में है। यह कोलेस्ट्रोल को बढ़ने से भी रोकता है। पर शायद कम लोग यह जानते होंगे कि मेलॉटोनिन अंधेरे में उत्सर्जित होता है। इस हारमोन को बनाने वाली ग्रंथियों को बरबस हमसे ‘अंधेरा कायम रहे’ कहना पड़ रहा है।

हमारी दिनचर्या में शामिल कंप्यूटर भी उसी नीली प्रदीप्ति का एक बड़ा जनक है जो शरीर के ऊतकों के लिए हानिप्रद है। एलईडी लाइटों का खूब ढिंढोरा पीटा गया, लेकिन एलईडी से निकलती हैं यूवी रेज, वही नीली प्रदीप्ति। तो प्रकाश-प्रदूषण से बचने के लिए हमें ‘वार्म-लाइटिंग’ की तरफ लौटना चाहिए। सड़कों पर स्ट्रीट लाइट आकाश की तरफ जाने से रोका जाए तो रात की दृश्यता बढ़ेगी। आकाश निर्मल होगा। तारे हमारी बालकनी में टहलने आएंगे। साइन बोर्ड, नियान लाइट वाले विज्ञापन-पटों, रात भर काम में जुटी रहने वाली फैक्ट्रियों आदि के लिए प्रकाश-प्रदूषण से संबंधित नियमावली बने तो पेड़-पौधे, पशु-पक्षी हमें धन्यवाद अवश्य कहेंगे।

अगर आपको अंधेरे में सोने की आदत नहीं है, तो कृपया डालिए। रात को देर तक जागना, शरीर पर अतिरिक्त प्रदीप्ति झोंकना है। इस अत्याचार से बचा जाए। हमारी खिड़कियों पर पर्दे हों जो घर के प्रकाश को बाहर जाने से रोकें। यह शहर के आकाश की सेहत सुधारेगा। अन्यथा कभी ऐसा न हो कि हमारे बच्चे तारों का पाठ इतिहास की कक्षाओं में पढ़ें और जब हम उन्हें ‘तारे जमीं पर’ जैसी कोई फिल्म दिखाने ले जाएं, तो वे पूछें- ‘तारे मतलब क्या?’

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