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नकल की बीमारी

शिक्षा संस्थाओं को विद्या का मंदिर माना जाता है। लेकिन आज देश के ज्यादातर स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय भी दो समस्याओं से त्रस्त हैं। एक तो विद्यार्थियों का कक्षा में नहीं जाना और फिर परीक्षा का पर्चा बाहर करने और परीक्षा में नकल करने के नित नए अंदाज विकसित करना। सभी को बिना मेहनत के अच्छे नंबर लाने की ललक है। साठ के दशक में कहा जाता था कि विद्यार्थी दो प्रकार के होते हैं।
Author May 4, 2015 17:35 pm

शिक्षा संस्थाओं को विद्या का मंदिर माना जाता है। लेकिन आज देश के ज्यादातर स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय भी दो समस्याओं से त्रस्त हैं। एक तो विद्यार्थियों का कक्षा में नहीं जाना और फिर परीक्षा का पर्चा बाहर करने और परीक्षा में नकल करने के नित नए अंदाज विकसित करना। सभी को बिना मेहनत के अच्छे नंबर लाने की ललक है। साठ के दशक में कहा जाता था कि विद्यार्थी दो प्रकार के होते हैं।

एक वे जो कक्षा में हमेशा कॉपी-किताब लेकर आते हैं। दूसरे वे जो कक्षा में तो नहीं, लेकिन परीक्षा हॉल में कॉपी-किताब लेकर जाते हैं। ऐसे भी विद्यार्थी हैं जो घर से निकल कर स्कूल और कॉलेज तो आते हैं, लेकिन कक्षाओं में कम ही जाते हैं। त्रासदी यह है कि जब से इंजीनियरिंग, मेडिकल और सीए या कंपनी सेक्रेटरी जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का महत्त्व बढ़ा है, तब से बहुत से अभिभावक पारंपरिक पाठ्यक्रम के लिए अपने बच्चों को ऐसे संस्थान में भेजने लगे हैं, जहां जाना जरूरी नहीं होता।

इस तरह वे भी अनुपस्थितिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। स्कूल-कॉलेजों में शायद ही कभी तीस-चालीस फीसद से ज्यादा उपस्थिति होती हो। कहने को पचहत्तर प्रतिशत उपस्थिति आवश्यक है, पर उपस्थिति कम बताने पर परीक्षा में बैठ पाना मुश्किल होने से हर स्तर पर कम उपस्थिति पूरी करने की कोशिश होती है।

इसके लिए अतिरिक्त कक्षा जैसे कागजी उपायों के जरिए अंक देकर कम उपस्थिति को पूरा किया जाता है। विद्यार्थी कहते हैं कि शिक्षक नहीं आते और शिक्षक कहते हैं कि विद्यार्थी नहीं आते। सच्चाई शायद दोनों ही ओर है। दूसरी ओर, बच्चे स्कूल-कॉलेज तो नहीं जाते, पर कोचिंग संस्थानों में जरूर जाते हैं।

जबकि कोचिंग संस्थानों में स्कूल-कॉलेज के मुकाबले ज्यादा फीस देनी पड़ती है। यह खेल ही समूची शिक्षा-व्यवस्था को खोखला कर रहा है। वरना कक्षा में पूरी निष्ठा और कौशल से पढ़ाने वाले योग्य शिक्षक का मुकाबला कौन-सा कंप्यूटर या इंटरनेट कर सकता है? कभी संस्थान अपने अच्छे शिक्षकों के लिए जाने जाते थे। आज वे लड़ाई-झगड़े, गलत काम और नकल के लिए बदनाम हो रहे हैं। फिराक साहब कक्षा में तो सिगरेट पीते थे, पर पढ़ाते कमाल के थे। आज का शिक्षक सिगरेट पीकर फिराक बनना चाहता है। आप फिराक बन कर सिगरेट तो पी सकते हैं, पर सिगरेट पीकर फिराक नहीं बन सकते।

नकल करने की प्रवृत्ति कमोबेश सभी शिक्षा संस्थाओं में गंभीर समस्या के रूप में उभरी है। क्या स्कूल और क्या कॉलेज या विश्वविद्यालय, सभी इस समस्या से ग्रस्त हैं। ऐसा माना जाने लगा है कि बिना नकल किए न कोई परीक्षा पास की जा सकती है और न ही अच्छे नंबर लाए जा सकते हैं।

यह सच है कि नकल पहले भी होती थी। पर तब नकल करने वाले कम थे और वे डर कर और सहम कर नकल करते थे। आज कई बार यह भी देखा जाता है कि कुछ छात्र बेखौफ होकर नकल करते हैं। पिछले दिनों बिहार में नकल करने और कराने वालों के चित्र सामने आए। सवाल सिर्फ बिहार का नहीं है।

झांंसी के एक महाविद्यालय में भी खुलेआम नकल की जा रही थी। अब तो बाकायदा व्यावसायिक रूप से शुल्क लेकर लोग नकल करवाने का ठेका लेते हैं। इंदौर विश्वविद्यालय के प्रबंधन के पाठ्यक्रम की परीक्षा में तो एक पुलिस अधिकारी वर्दी में नकल के लिए पकड़े गए। लेकिन बाद में लीपापोती करके मामला दबा दिया गया। नकल के साथ-साथ परीक्षाओं के परचे आउट होना और ऊंची कीमतों पर बिकना भी आम चलन हो गया है। उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग का पर्चा पांच-पांच लाख रुपए में बिकने की बात सामने आने पर वह परीक्षा रद्द कर दी गई। पहले भी अनेक परीक्षाओं में ऐसा हो चुका है।

सवाल है कि क्या इन गलत और आपराधिक हथकंडों के बिना परीक्षा पास नहीं की जा सकती? विद्यार्थी इतने असुरक्षित और घबराए हुए क्यों हैं कि उनका अपनी योग्यता और क्षमता पर से ही विश्वास उठ गया है? मध्यप्रदेश की व्यावसायिक परीक्षा में हुआ घोटाला नकल जैसी कुरीतियों का ही विकृत रूप है, जहां पैसे के बल पर भर्ती और प्रावीण्य सूची में स्थान पाकर डॉक्टर, इंजीनियर और पुलिस जैसे विभागों में लोग न जाने कितनों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं।

नतीजा यह है कि अब कोई अंक सूची पर भरोसा नहीं करता। अच्छे संस्थान लोगों का खुद चयन करते हैं और गुण-दोष के आधार पर विधिवत अपनी परीक्षा प्रणाली के बाद योग्य लोगों को चुनते हैं। फिर परीक्षा पास करने के लिए निरर्थक आपाधापी और हर अनुचित साधन से अच्छे अंक लाने की दौड़-धूप क्यों? शिक्षक, विद्यार्थी, शिक्षा संस्थान और व्यवस्था सभी के लिए यह आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण का विषय है।

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

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