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दुनिया मेरे आगेः संवाद का सिरा

बच्चा घर में हर किसी का प्यारा-दुलारा होता है। वह मां-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी की गोद से उतर कर स्कूल में कदम रखता है, जहां उसे वैसे ही प्यार और परवाह की जरूरत होती है।
Author April 11, 2018 03:20 am
आखिर बातचीत ही वह माध्यम है जिसके जरिए बच्चों के विचारों को पंख लगते हैं।

कालू राम शर्मा

बच्चा घर में हर किसी का प्यारा-दुलारा होता है। वह मां-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी की गोद से उतर कर स्कूल में कदम रखता है, जहां उसे वैसे ही प्यार और परवाह की जरूरत होती है। लेकिन देखा जाए तो होता इसका उलट है। बच्चे घरों से बहुत कुछ सीख कर स्कूल में आते हैं। वे भाषायी तौर पर काफी समृद्ध होते हैं। उनका कौतूहल कुलांचे मारता है। जन्म के बाद शिशु को लेकर परिवार के लोग कितने सपने बुनते हैं! चार-पांच साल तक बच्चा दुनिया को अपने से ही समझने की भरपूर कोशिश करता है। वह अपने दायरे में हर घटना और चीज पर नजर रखता है और उसकी व्याख्या करता है।

चार-पांच साल की उम्र के पड़ाव पर उसका वास्ता स्कूल से पड़ता है। मगर सच यह है कि स्कूल भावनात्मक और शैक्षिक, दोनों रूप से बच्चों की परवाह नहीं करते। हम सरकारी या निजी, किसी भी स्कूल की बात करें, हालात अमूमन एक जैसे ही कहे जा सकते हैं। जितनी जल्दी हो सके, उसे वह सब कुछ सिखा दिया जाए, जो स्कूल ने तय किया है। फिर उसे परीक्षा की भट्ठी में झोंक दिया जाता है। स्कूल में उसे मिलता क्या है? सधे हुए अंदाज में कतार में बैठना, शिक्षक के निर्देशों का पालन करना और मर्जी से या अपनी मर्जी के खिलाफ भी कुछ पढ़ना और करना।

मैंने बहुतों की बोलती बंद होते देखी है। घर-आंगन में जिन बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वे स्कूल में घोर चुप्पी साध लेते हैं और यह चुप्पी वे घर भी लेकर लौटते हैं। स्कूल में भर्ती होने के बाद बच्चों के कौतूहल का ग्राफ धड़ाम से नीचे गिर जाता है। ऐसा क्यों होता है? दरअसल, बच्चा स्कूल में आकर खुद को बेगाना महसूस करता है। घर में जहां वह अपनी मर्जी और स्वच्छंदता के साथ समय बिताता है, वह सब स्कूल उससे छीन लेता है। स्कूल बनाए तो बच्चों के लिए, मगर वहां बचपन की परवाह नहीं होती। स्कूल के अपने नियम होते हैं जो काफी हद तक जड़ होते हैं। कक्षाएं, चारदिवारी, किताबें…! शिक्षा तंत्र की ऊपर से नीचे तक की पूरी व्यवस्था बच्चों के मनोविज्ञान को चिढ़ाती है। बच्चे अपने रहन-सहन और व्यवहार में वैसा ही लचीलापन चाहते हैं जो उन्हें घर में मिलता है। वे चीजों को छूना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बदन को ताजी हवा के झोंके छुएं। उन्हें चिड़िया का कलरव सुनना अच्छा लगता है। वे अपने आसपास के लोगों से बतियाना चाहते हैं। वे हर मामूली घटना पर कौतूहल भरी नजरें गड़ाना चाहते हैं। वे घटनाओं में अर्थ खोजना चाहते हैं। यह सब स्कूल में बच्चों को नसीब नहीं होता।

सवाल है कि स्कूल बच्चों के हिसाब से चले या बच्चे स्कूल के हिसाब से? स्कूलों को चाहिए कि वे बच्चों के विचारों को पनपने के लिए स्थान दें। विचारों का मामला सीधे तौर पर बच्चों के मनोवैज्ञानिक स्तर के अनुसार बातचीत और खोजबीन से जुड़ा हुआ होता है। प्रारंभिक स्तर पर बच्चों को कक्षाओं की चारदिवारी से मुक्त करने की जरूरत है। निदा फाजली ने कहा है- ‘बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे।’

आखिर बातचीत ही वह माध्यम है जिसके जरिए बच्चों के विचारों को पंख लगते हैं। भाषाशास्त्रियों के मुताबिक भाषा की तासीर मौखिक होती है। लिपि भाषा को संरक्षित करती है। बच्चों के पास मौखिक भाषा होती है। शिशु बैठने और चलने के साथ ही भाषा पर पकड़ बनाना शुरू कर देते हैं। एक बच्चा जो भी बोलता है, वह अर्थ लिए होता है। बच्चों का दिमाग भाषा सीखने के लिए तैयार होता है। बस उसे अवसर देने की जरूरत है। घरों की तरह बच्चों को स्कूलों में भी सायास अवसर देने की जरूरत है। अगर हम मकान बनाते हैं तो पहले एक मजबूत ढांचा या मचान बनाते हैं, जिस पर मकान खड़ा होता है। स्कूली व्यवस्था बच्चों में सोचने का मचान गढ़ने की उपेक्षा करती है। सोचने का ढांचा बोलने और क्रिया या करने से होता है। बच्चा जो कुछ भी करता है, वह भाषा के जरिए ही व्यक्त करता है। सवाल यह है कि बोलने पर रोक क्यों हो!

तोत्तोचान की मिसाल हमारे सामने है। प्रधानाध्यापक कोबायाशी से तोत्तोचान खूब बतियाती है और वे उसकी हर बात को बड़े ध्यान से सुनते जाते हैं। तोत्तोचान का स्कूल रेल के डिब्बे में लगता था। वहां तोत्तोचान को हर काम करने की आजादी थी। क्या ऐसी आजादी स्कूलों में नहीं दी जा सकती? जाहिर है, मामला नजरिए का है। शिक्षा जगत के कथित जिम्मेदार लोगों को चिंता यह होती है कि बच्चों को अगर आजादी दी तो वे बिगड़ जाएंगे। इतना ही नहीं, कक्षाओं में बच्चों को बातचीत के अवसर भी नहीं मिलते। प्रोफेसर कृष्ण कुमार के मुताबिक, ‘नर्सरी और प्राथमिक कक्षाओं के स्तर पर बच्चों के लिए बातचीत करना, सीखने और सीखने को सुदृढ़ बनाने का एक बुनियादी माध्यम है।’

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