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परवरिश का परिवेश

यह विडंबना है कि अधिकतर मामलों में स्कूल और खुशी का कोई रिश्ता ही नहीं। ‘कैसा रहा स्कूल’, इस सवाल के जवाब में छिपी है हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी।

Author नई दिल्ली | April 22, 2016 2:49 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

आज के जो हालात हैं, उनमें मां का यह सवाल बेतुका-सा हो चुका है कि स्कूल कैसा लगा! मरे हुए शब्दों का बोझ जब तक बेटी पंखों से झटक कर एक ओर नहीं रख देगी, किसी सवाल का जवाब भी कैसे देगी बिटिया! जबकि उस बोझ को झटक देने में ही है मां के सवाल का जवाब। यह विडंबना है कि अधिकतर मामलों में स्कूल और खुशी का कोई रिश्ता ही नहीं। ‘कैसा रहा स्कूल’, इस सवाल के जवाब में छिपी है हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी।

क्या शिक्षा सिर्फ एक आवश्यक बुराई बन कर रह गई है? आॅस्ट्रियन चिंतक ईवान इलिच (1926-2002) की मशहूर किताब ‘डीस्कूलिंग सोसाइटी’ का मुख्य तर्क ही यह है कि अब समूचे समाज को स्कूलों से मुक्त करने की जरूरत है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पा रही। इलिच कहते हैं- ‘स्कूली शिक्षा इस भ्रम पर आधारित है कि हर तरह की सीख शिक्षा का ही परिणाम है। यह सही है कि कुछ चीजें शिक्षा के माध्यम से सीखी जा सकती हैं, पर ज्यादातर सीख स्कूलों से बाहर ही संभव होती है। स्कूल तो अधिकतर देशों में ऐसी जगहें बन चुके हैं, जहां बच्चों को उनकी जिंदगी की एक लंबी अवधि के दौरान कैद में रखा जाता है।’

इस देश में तो अधिकतर गांवों और यहां तक छोटे-बड़े शहरों में भी शिक्षा ‘गूमड़ युग’ से बाहर कदम नहीं निकाल पाई है। पढ़ाई के दौरान शारीरिक हिंसा के परिणामस्वरूप बच्चों के सिर पर उगे गूमड़ों की संख्या के आधार पर शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन होता है! बच्चे की बेरहमी से पिटाई, स्कूल में पांच-छह साल की बच्ची के साथ बलात्कार, होमवर्क न करने पर बच्चों को कड़ी धूप में खड़ा किया- इस तरह की खबरें हमारी सामूहिक चेतना के सामने इतनी बार कौंधती हैं कि अब वे अपना तीखापन, दंश, पीड़ा खो चुकी हैं!

बच्चों की शिक्षा संवेदनशील मुद्दा है और इसे बस शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों के लिए नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए। हमारे अपने जीवन के साथ जो चीजें गहराई से जुड़ी हैं, उनके बारे में जानने के लिए भी हम विशेषज्ञों के पास जाते हैं। ऐसी कोई विधा नहीं जो जीवन को समग्रता से, उसकी संपूर्णता में देखना सिखाए; जो समूचे कैनवास को सामने रख दे और जिंदगी के सुख-दुख, पीड़ा, हास्य, प्रेम, करुणा, नफरत, युद्ध, कुदरत के साथ हमारे रिश्ते, जिंदगी के सभी रंगों को एक साथ हमारी मेज पर रख दे और कहे- ‘यह रहा आपका जीवन, देखिए इसे और समझिए।

चलिए इसे समझने के लिए एक सहयात्रा में उतरा जाए, एक दूसरे के हाथ थाम कर। खुद से, जिंदगी से रूबरू हुआ जाए। स्कूलों में विषय तो पढ़ा दिए जाते हैं जैसे-तैसे, पर जीवन का विराट क्षेत्र, अपनी तमाम जटिलताओं और सरलताओं के साथ अछूता रह जाता है। जिन्हें हम शिक्षक कहते हैं, वास्तव में वे बस प्रशिक्षक भर होते हैं- जीविका के संकीर्ण कोने में सिमटे हुए, जीवन के असीमित क्षेत्र से अनभिज्ञ और बेपरवाह। जे कृष्णमूर्ति ने ऐसी शिक्षा के बारे में कहा है कि यह ‘कोने के पुजारियों’ (वरशिपर्स आॅफ द कॉर्नर) को जन्म देती है। यानी मौजूदा शिक्षा हमें सिर्फ जीवन के एक सीमित क्षेत्र से परिचित कराती हैं। जीवन की समग्रता को समझने का कोई आग्रह भी यह पैदा नहीं करती हमारे भीतर।

कोटा में बच्चों की आत्महत्या की घटनाएं इसके उदाहरण हैं। अनावश्यक भेड़ियाधसान में शामिल हुए बिना भी उत्कृष्टता कैसे प्राप्त की जा सकती है और आधुनिक जीवन की क्रूर मांगों के सामने टूटे बगैर कैसे सीमित संसाधनों के साथ जीवन को हंसी-खुशी जिया जा सकता है, बच्चों को यह समझाए बगैर उन्हें सिर्फ सफलता और संसाधन बटोरने की रुग्ण जीवन-शैली जीने के गुर सिखाए जाते हैं। यह हिंसा और क्रूर प्रतिद्वंद्विता को जन्म देता है।

हमारी समूची शिक्षा का आधार है- ईनाम, सजा और तुलना। घर में मां-बाप और स्कूल में शिक्षक यही तरीका अपनाते हैं बच्चों को पढ़ाने के लिए। ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब…’ सदियों से बच्चों को कहा जाता रहा है। इम्तहान में अच्छे नंबर लाने पर ईनाम, नहीं तो अपमान या सजा। कैसा लगता है जब अखबारों में पढ़ते हैं कि किसी बारह या पंद्रह वर्ष के बच्चे ने कम नंबर आने की वजह से खुदकुशी कर ली? एक भी बच्चा ऐसा करता है तो उसका कलंक हम सबके माथे लगता है, क्योंकि हमने एक ऐसा माहौल बनाया है जिसमें कामयाबी की पूजा की जाती है। हमारे घरों में बातें होती हैं कि ‘देखा, क्या शानदार निकला है उसका बेटा! महीने में दस लाख तो कहीं नहीं गया!’ बच्चा हर समय दबाव में रहता है। सजा, ईनाम, तुलना और भय- बस यही सड़े-गले पुराने तरीके हैं हमारे पास बच्चों की परवरिश के लिए। हम इस बात के लिए न धैर्य रखते हैं और न बच्चे को समय देते हैं कि वह वास्तव में पता लगा सके कि उसे क्या करना पसंद है, अपने दिल से।

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