प्रतिभा के पैमाने

पिछले दिनों संयोग से एक व्यक्ति के पारिवारिक समारोह में शामिल होने का अवसर मिला।

सांकेतिक फोटो।

कुंदन कुमार

पिछले दिनों संयोग से एक व्यक्ति के पारिवारिक समारोह में शामिल होने का अवसर मिला। यों तो ऐसे जमावड़े में समारोह के इतर भी कई राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लोगों के बीच खुल कर चर्चा होती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि बच्चों के परीक्षा परिणाम भी अब पारिवारिक समारोह में जगह बना रहे हैं और इस पर अक्सर खूब चर्चा होने लगी है। अगर किसी के बेटे या बेटी ने परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया है तो उसके अभिभावक उसकी खूब प्रशंसा करते हैं। करना भी चाहिए, क्योंकि अच्छे कार्यों की प्रशंसा से समाज में सकारात्मक संदेश जाता है। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी की प्रतिभा के खूब बखान करने से आसपड़ोस का कोई व्यक्ति आतंकित तो नहीं हो रहा। अक्सर हमने देखा है कि कुछ युवक और युवतियां प्रतिभा के नाम पर आतंकित हो जाते हैं। जैसे ही किसी व्यक्ति को सामान्य बुद्धि वाला व्यक्तित्व ठहरा दिया जाता है, वैसे ही उसके मन में यह धारणा बन जाती है कि सामान्य प्रतिभा वाले व्यक्ति प्रतियोगिता परीक्षा में बहुत कठिनाई से अपना स्थान बना पाते हैं।

अब तक ढूंढ़ने से भी किताबों और आसपड़ोस के परिवेश में हमें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो जन्मजात प्रतिभासंपन्न और तीक्ष्ण बुद्धि वाला हो। सच यह है कि हरेक व्यक्ति को अपनी प्रतिभा को उजागर करने के लिए श्रम और प्रयास करना पड़ता है। बगैर श्रम और प्रयास किए अपने अंदर की प्रतिभा को उजागर करना लगभग नामुमकिन है। जन्म से न कोई क्रिकेटर होता है, न तीरदांज और न ही निशानेबाज। कड़ी मेहनत अनथक प्रयास और उचित मार्गदर्शन में ही हमारे अंदर का क्रिकेटर, निशानेबाज, व्यापारी या अधिकारी बाहर निकल कर चमकता है। जन्म से ही लोग महान हो जाते तो फिर श्रम और अभ्यास महत्त्वहीन रहता।

हमने अपने आसपड़ोस ऐसे कई लोगों को देखा है, जो व्यवहार में अपने को बहुत तेजतर्रार दिखाते हैं और खुद को प्रतिभाशाली बता कर डींगें हांकते रहते हैं। दरअसल, ऐसे लोगों को देख कर हीन भावना से ग्रसित होने से बचना चाहिए। प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की यह पहचान है कि वह प्रत्येक कार्य के लिए धैर्यपूर्वक उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करता है। विभिन्न देशों के महान विचारकों ने धैर्य के प्रति श्रेष्ठ मनोदशा का नाम ही प्रतिभा रखा है। इसलिए यह कहा जाता है कि प्रतिभाशाली व्यक्ति सब कुछ कर डालने की अपेक्षा यह सोचता है कि क्या, कैसे, कब और किस परिस्थिति में करना आवश्यक है। महान विभूतियों के जीवन चरित्र के अध्ययन से ज्ञात होता है कि लंबी अवधि तक कष्ट सहने के बाद वे अपने को उस रूप में प्रकट कर पाएं, जिसे हम प्रतिभाशाली कहते हैं। हालांकि प्रतिभा पेड़ पर लटकने वाला कोई फल नहीं हैं, जिसे आसानी से प्राप्त किया जा सके, लेकिन प्रतिभा वह सामर्थ्य है, जिसकी प्राप्ति कठिन श्रम और अनवरत प्रयास द्वारा संभव होती है।

दरअसल, प्रतिभा उजागर करने में श्रम का योगदान सर्वाधिक है, जबकि आंतरिक प्रेरणा का नगण्य। श्रम करने को संकल्पित व्यक्ति खुद को प्रतिभाओं से ओतप्रोत व्यक्तित्व की श्रेणी में शामिल कर लेता है। वहीं प्रतिभा को पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम मानने वाले हाथों पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं। प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की कसौटी यह है कि उसके कथन को सामान्य जन प्रमाण मानते लगता है। इसके पीछे कारण यह है कि सामान्य लोग की भावनाओं को वाणी प्रदान करना प्रतिभा के क्षेत्र में आता है। आमतौर पर जब व्यक्ति अपने उद्देश्य में सफल हो जाता है, तब आम जनमानस में उसकी स्वीकारोक्ति प्रतिभाशाली के रूप में हो जाती है। वहीं संपूर्ण जगत का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अगर अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता है तो समाज उसे सामान्य व्यक्तित्व के तौर पर ही देखता है। दरअसल, अपने चिंतन में विश्वास करना और दुनिया को भी उसको मानने को बाध्य कर देने वाला व्यक्ति प्रतिभासंपन्न कहा जाता है।

प्रतिभा की अन्य कसौटियों में ईमानदारी का भी अपना खास महत्त्व है। ईमानदारी से अनवरत प्रयास और अनथक श्रम करने वाले व्यक्ति को प्रतिभाशाली बनने से कोई रोक ही नहीं सकता। प्रतिभा को ईश्वर प्रदत वस्तु और पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम मान लेने पर हम अपनी मेहनत और कोशिश के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं। इसलिए सबसे पहले हमें यह भ्रम मन से निकाल देना चाहिए कि प्रतिभा ईश्वर प्रदत और पूर्वजन्मों का परिणाम है और हमें अपने आपको किसी से कम नहीं आंकना चाहिए। जो जितना मेहनत करता है और अपने सामर्थ्य के प्रति ईमानदार रहता है, अगर कोई बेईमानी न हो तो उसे उस अनुपात में सफलता मिलती है। लोगों की प्रतिभा का मापन उसके उद्देश्यों की सफलता से ही होता है। जो अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में जितना सफल रहा, समाज ने उसे उतना ही प्रतिभाशाली माना। कह सकते हैं कि प्रतिभा नामक शक्ति हमारे व्यक्तित्व में उसी प्रकार समाहित रहती है, जिस प्रकार मेदिनी में सुगंध रहती है। हम अपने कृतकर्म द्वारा इस सुगंधरूपी प्रतिभा की सुषुप्तावस्था दूर कर सकते हैं।

पढें दुनिया मेरे आगे समाचार (Duniyamereaage News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।