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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में सदाशिव श्रोत्रिय का लेख : मोह की मासूमियत

सवाल यह है कि माता-पिता द्वारा मोह के वशीभूत हो अपने बच्चों की हर जिद पूरी करने को क्या बच्चों के आदर्श लालन-पालन की संज्ञा दी जा सकती है?

Author नई दिल्ली | August 25, 2016 5:49 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

कोई भी यह गौर कर सकता है कि पिछले कुछ दशकों के दौरान बच्चों के प्रति माता-पिता के मोह में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। हालत यह है कि आज बच्चा कोई इच्छा अपने मां-बाप के सामने जाहिर करता है और वे उसकी पूर्ति में खुद को असमर्थ पाते हैं तो एक खास तरह के अपराध-भाव से भर उठते हैं। पहले भी माता-पिता अपने बच्चों से बहुत प्यार करते थे, लेकिन इतने मोहासक्त नहीं होते थे। यह माना जाता था कि किसी बच्चे को परिवार और समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए अनुशासित और प्रशिक्षित करना जरूरी है। बच्चे के उचित विकास को न केवल माता-पिता, बल्कि समाज भी अपनी सामूहिक जिम्मेदारी के तौर पर देखता था। शिक्षकों और बुजुर्गों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे बच्चों को परिवार और देश-समाज का उपयोगी सदस्य और नागरिक बनाने में हर संभव मदद करेंगे और इसके लिए जरूरत पड़ने पर कड़वी बात कहने या दंडित करने में भी संकोच नहीं करेंगे। लेकिन लगता है, बच्चों के प्रति अधिकतर माता-पिता का व्यवहार हमारे समय में काफी बदल गया है।

अतीत की ओर निगाह डालने पर हम पाते हैं कि पहले इस देश का आम नागरिक काफी गरीबी में जीता था। संयुक्त परिवारों का आकार काफी बड़ा होता था। उनमें बच्चों की संख्या भी अधिक होती थी और किसी माता या पिता का केवल अपने बच्चों पर अधिक ध्यान देना पारिवारिक अशिष्टता के रूप में देखा जाता था। मगर परिवार-नियोजन की सफलता और संयुक्त परिवारों की टूटन के कारण एक ओर परिवार छोटे होने लगे, वहीं देश की आर्थिक उन्नति के साथ हर वर्ग के लोगों की समृद्धि में भी कुछ इजाफा हुआ। यही वजह है कि माता-पिता का अपने बच्चों की जरूरतों और इच्छाओं पर ध्यान देना संभव होने लगा। इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि जिन माता-पिता को अपने बचपन में उपेक्षा के कारण बहुत-सी इच्छाओं का दमन करना पड़ा था, उन्होंने अपने बच्चों को उस तरह की उपेक्षा और इच्छाओं के दमन से बचाने का प्रयास किया। भेड़चाल के आदी हमारे समाज में माता-पिता द्वारा बच्चों की हर सही-गलत इच्छा की पूर्ति की प्रवृत्ति हमारे यहां महामारी की तरह फैलने लगी।

संयोग से यही वह समय था जब उदारीकरण के बाद पूंजीवाद इस देश में अपने पांव फैला रहा था। पूंजीवादी उद्योग को भारतीय परिवारों की इस भावनात्मक स्थिति में व्यापारिक लाभ की नई संभावनाएं नजर आर्इं और उसने अपनी दुकानों को बच्चों के आकर्षण और उपयोग की एक से एक नई वस्तुओं से भरना शुरू कर दिया। भारतीय बाजार तब बच्चों के लिए नई डिजाइन के महंगे कपड़ों, आकर्षक खिलौनों, रंगीन और चिकने कवर वाली बाल-पुस्तकों, तरह-तरह की टॉफी-चॉकलेट, चटपटे मसालेदार नमकीन के पैकेट, स्टेशनरी आदि से पट गए। बच्चों की रुचियों में परिवर्तन नजर आने लगे। औसत आय वाले घरों के बच्चे भी अपने मां-बाप से उनका जन्म दिन मनाने और केक काटने का आग्रह करने लगे। हर घर में टीवी की उपस्थिति का फायदा उठाते हुए इस बाजार ने बच्चों को तरह-तरह के कंप्यूटर खेलों और कार्टून धारावाहिकों की लत लगा दी।

सवाल यह है कि माता-पिता द्वारा मोह के वशीभूत हो अपने बच्चों की हर जिद पूरी करने को क्या बच्चों के आदर्श लालन-पालन की संज्ञा दी जा सकती है? यह सच है कि बच्चों के लालन-पालन में मां-बाप को बच्चों की भौतिक और भावनात्मक आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि उन्हें बच्चों को अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना नहीं सिखाना चाहिए। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनका सामना जीवन की अनेक तरह की चुनौतियों से होता है। इन चुनौतियों के रहते कई बार बच्चों को उनका इच्छित हासिल नहीं हो पाता। पराजय की इन स्थितियों के लिए अगर बच्चे पहले से तैयार न हों तो वे कुंठा या अवसाद के शिकार होकर या किसी नशे की गिरफ्त में आकर अपनी जिंदगी बर्बाद कर सकते हैं।

बच्चे की हर इच्छा पूरा करने वाले माता-पिता उन्हें केवल जिद्दी, आरामतलब, फिजूलखर्च, अनैतिक और कामचोर बनाते हैं। वे उन्हें उन इच्छाओं के नियंत्रण के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं करते, जो परिवार, संस्थाओं या समाज में उनके समन्वयन के लिए जरूरी है। किसी गलत काम से रोके जाने पर ऐसे बच्चे आतंकवादी बन सकते हैं, क्योंकि उनमें दूसरों की बात सुन कर अपने आपको सुधारने की प्रवृत्ति का अभाव होता है। अगर माता-पिता अपने बच्चों को सही और गलत में भेद करना न सिखाएं, मानव और पशु जीवन का अंतर न समझाएं और अगर वे उनकी रुचियों का परिष्कार कर उन्हें शिष्ट और सुसंस्कृत न बनाएं तो वे निश्चय ही परिवार और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य से विमुख हो रहे होंगे।

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