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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में सदाशिव श्रोत्रिय का लेख : सिकुड़ते सरोकार

चिकित्सा-तंत्र आज के समय में एक बड़े वाणिज्यिक संस्थान का रूप ले चुका है, जिसमें चिकित्सा के कुशल विशेषज्ञों के अतिरिक्त बड़े-बड़े पूंजीपति, महंगे निदानकर्ता, महंगी औषधियों के उत्पादक और विक्रेता आदि कई मुनाफा खोजने वाले शामिल हैं।

Author नई दिल्ली | June 16, 2016 3:22 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

चिकित्सक की परंपरागत छवि हमारे यहां उस व्यक्ति की रही, जिसके पास पहुंचते ही मरीज अपने दर्द में राहत महसूस करता था। तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक, टोने-टोटके, जड़ी-बूटियों और वात-पित्त-कफ आदि के अपने ज्ञान से, होम्योपैथिक दवाइयों के इस्तेमाल या एक्यूप्रेशर, रेकी आदि किन्हीं तरकीबों से उस कष्ट पाते हुए रोगी को राहत पहुंचाना, तसल्ली देना और यथासंभव उसकी सेवा और मदद करना चिकित्सक अपना धर्म मानता था। कोई-कोई चिकित्सक तो यह तक मानते थे कि उसने अगर अपनी विद्या को बेच कर कोई आर्थिक लाभ कमाने की चेष्टा की तो उसकी विद्या निष्प्रभावी हो जाएगी।

लेकिन आज चिकित्सक की इस पारंपरिक छवि में जबर्दस्त परिवर्तन आ गया है। इस बात को कोई भी आसानी से देख सकता है कि चिकित्सक और मरीज का संबंध अब उस कष्ट में राहत देने वाले मसीहा और उसके पास जाते ही राहत महसूस करने वाले इंसान का नहीं रहा। इस परिवर्तन के पीछे कारण क्या हो सकते हैं? क्या इसका कारण चिकित्सा का लगातार बढ़ता निजीकरण है? पहले जब ज्यादातर डॉक्टर राजकीय सेवा में थे, तब वे राजकीय चिकित्सालयों में उपलब्ध साधनों से सबका एक जैसा मुफ्त इलाज करते थे। पर अब निजी चिकित्सालयों में किसी रोग की चिकित्सा के लिए एक से एक महंगी सुविधाएं उपलब्ध हैं, तब डॉक्टर और मरीज के संबंध भी तेजी से चिकित्सा-विक्रेता और ग्राहक के होते जा रहे हैं। निजी चिकित्सक के लिए रोगी महज एक ग्राहक है, जिसे वह अपना विशिष्ट ज्ञान और कौशल बेचता है।

लेकिन यह विडंबनापूर्ण है कि जो मरीज अपनी रुग्णावस्था में सबसे सहायता और हमदर्दी की अपेक्षा रखता है, उसी को निजी चिकित्सक अपने एक ग्राहक के रूप में देखे। बदली हुई परिस्थितियों में अब तक श्रेष्ठ और उत्तम समझा जाने वाला चिकित्सा-कर्म आज खुद चिकित्सक को एक बेहतर इंसान बनाने के बजाय आत्मकेंद्रित और हृदयहीन बना रहा है। अगर चंद अपवादों को छोड़ दिया जाए तो डॉक्टर भी किसी अन्य व्यापारी की तरह आज वही करना चाहता है, जिससे वह अधिक से अधिक पैसा कमा सके। हर उस निजी डॉक्टर की फीस को, जिसकी रोगी-संख्या और प्रसिद्धि बढ़ रही हो, आप हर बार कुछ बढ़ा हुआ पाते हैं।

चिकित्सा-तंत्र आज के समय में एक बड़े वाणिज्यिक संस्थान का रूप ले चुका है, जिसमें चिकित्सा के कुशल विशेषज्ञों के अतिरिक्त बड़े-बड़े पूंजीपति, महंगे निदानकर्ता, महंगी औषधियों के उत्पादक और विक्रेता आदि कई मुनाफा खोजने वाले शामिल हैं। बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेजों और ऊंची कैपिटेशन फीस देकर उनमें प्रवेश चाहने वालों को भी इस तंत्र के ही हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। किसी डॉक्टर की कल्पना हम आज इस व्यापक चिकित्सा तंत्र के एक पुर्जे के रूप में कर सकते हैं।
यह बात अप्रिय लगते हुए भी सच है कि डॉक्टर की नजर अब मरीज से ज्यादा मरीज की जेब पर रहती है और उससे पैसा निकलवाने के लिए वह अब कई तरह के हथकंडे इस्तेमाल करता है। मेरे एक मित्र को घुटने के एक शल्य-चिकित्सक से मिलना पड़ा। मित्र की जांच के बाद चिकित्सक ने कहा कि उसे घुटने में कृत्रिम जोड़ लगवाना होगा। दो लाख रुपए खर्च करने होंगे।

एक अन्य डॉक्टर की राय इस मामले में कुछ भिन्न थी, इसलिए मेरे मित्र ने पूछा कि अगर वह तुरंत अपने घुटने में कृत्रिम जोड़ न लगवाए तो क्या होगा! इस पर डॉक्टर ने कहा कि तब धीरे-धीरे आपका दूसरा घुटना भी खराब हो जाएगा और इस वजह से जब आपका घूमना-फिरना बंद हो जाएगा तो आपका हृदय भी स्वस्थ नहीं रह पाएगा। मेरे मित्र ने मन ही मन कहा कि डॉक्टर साहब की इच्छा मेरे कष्ट-निवारण की है या अपना घुटने का कृत्रिम जोड़ बेचने की! मित्र दुबारा उन नामी डॉक्टर से मिलने की हिम्मत नहीं कर पाए।

चिकित्साशास्त्र के विकास ने आज डॉक्टरों के लिए संकटपूर्ण स्थितियों में भी मरीज को मौत के जबड़ों से बाहर खींच लाना संभव बना दिया है। शारीरिक अक्षमता या अचेतनावस्था के कारण मरीज के लगभग एक जिंदा लाश में तब्दील हो जाने की स्थिति में भी डॉक्टर उसे आजकल लंबे समय तक ‘जीवित’ रख सकते हैं। हमारी पारंपरिक नैतिकता मरीज के नजदीकी रिश्तेदारों को कई बार ऐसे धर्मसंकट में डाल देती है कि वे अपने प्रिय रोगी का इलाज करते हुए खुद घोर आर्थिक विपन्नता के कगार तक जा पहुंचते हैं।

यह सच है कि एक व्यापक व्यावसायिक तंत्र के पुर्जे के रूप में चिकित्सक आज उस सम्मान और स्वतंत्रता से वंचित हो गया है जो उसे पहले प्राप्त थी। मुझे पता नहीं कि यह सुनी गई बात कितनी सच है कि जो चिकित्सा प्रतिष्ठान मोटी तनख्वाहें देकर चिकित्सकों को अपने यहां रखते हैं, वे उनसे यह भी अपेक्षा करते हैं कि वे कुछ न्यूनतम लागत के महंगे निदानों और शल्य-चिकित्सा आदि की सिफारिश अपने मरीजों से अवश्य करेंगे, ताकि उस प्रतिष्ठान का कारोबार भी चलता रह सके।

(सदाशिव श्रोत्रिय)

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