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दुनिया मेरे आगेः बिखरते दौर में

हमारा सुख, अस्तित्व और पहचान हमारे अपनों से ही है। परिवार, समाज और अपने आसपास के लोगों से मधुर रिश्ते हमें खुशी देते हैं। इसी खुशी को बढ़ाने के लिए हम हमेशा रिश्तों को सहेजने की कोशिश करते हैं।

वीना सिंह

हमारा सुख, अस्तित्व और पहचान हमारे अपनों से ही है। परिवार, समाज और अपने आसपास के लोगों से मधुर रिश्ते हमें खुशी देते हैं। इसी खुशी को बढ़ाने के लिए हम हमेशा रिश्तों को सहेजने की कोशिश करते हैं। लेकिन आज के बदलते समय में यही खुशियां देने वाले रिश्ते लोगों को बोझ और दुखदायी लगने लगे हैं। आपसी मधुरता की जगह कटुता-सी घुलने लगी है। भले ही आज जीवन में लोग रिश्तों की मिठास को कम महसूस करते हों, लेकिन आपसी रिश्तों का अहसास, इनकी मधुरता व्यक्ति को आनंदित और पुलकित करती है।

आज जानबूझ कर व्यक्ति इन सुखद रिश्तों की अवहेलना करता है, क्योंकि रिश्ते लोगों को सीमाओं में बांधते हैं और वह बंधना नहीं चाहता है। रोक-टोक को सुरक्षा नहीं, रुकावट मानता है। हर व्यक्ति अपनी मर्जी के अनुसार चलना चाहता है। इसीलिए रिश्तों का दायरा दिनोंदिन संकीर्ण होता जा रहा है। लोगों की सोच-समझ कुछ ऐसी बदल गई है कि कई बार वे नकली-से व्यवहार करते दिखते हैं। हर व्यक्ति एक दूसरे के सामने ऐसे प्रस्तुत होता है जैसे वह बहुत ही अच्छा, संतुलित और सामंजस्यपूर्ण है। वह आपसी रिश्तों को खूब समझता है, घुलता-मिलता है और सभी रिश्तों का सम्मान करता है। लेकिन असल में वह ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता है। रिश्तों की गरिमा और मर्यादा का पालन करने को अब पिछड़ेपन के सूचक की तरह देखा जाता है। भागती-दौड़ती भौतिकता से भरी जिंदगी में कोई भी पिछड़ा नहीं कहलाना चाहता है। ऐसे में रिश्तों की आहुति तो होनी ही है।

रिश्तों की इस दुनिया में आमतौर पर लोग अपनों से ही चोटिल होते हैं। दरअसल, रिश्तों को संवारने की जिम्मेदारी अपनों की ही सबसे अधिक होती है। सबसे ज्यादा खुद की। हमारी सबसे बड़ी समस्या है खुद को न परखना। दूसरों की कमियों पर हम कड़ी नजर रखते हैं, लेकिन खुद पर नहीं। दूसरों की जिंदगी को ऊंचे पैमाने से नापना चाहते हैं और अपनी कमजोरियों के लिए तरह-तरह की सफाई देते हैं। दूसरों के दोषों पर हमारी नजर जरूरत से ज्यादा तेजी से दौड़ती है, लेकिन अपने साफ चमकने वाले दोषों या अवगुणों को भी अनदेखा कर देते हैं। सामाजिक और घरेलू संबंधों में गलतफहमी और विषमता पैदा होने का एक बड़ा कारण यह भी है।

अगर हम खुद की तरह दूसरों के लिए भी विनम्र और उदार बनें तो हमारे बीच में फैली कटुता और अनेक समस्याएं अपने आप खत्म हो जाएं। रिश्तों को संवारने के लिए हमें यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति में कुछ अच्छाइयां हैं तो कुछ कमियां हैं। अच्छाइयां तो हमें अच्छी लगती हैं, लेकिन उसकी कमियां, बुराइयां हमें खलती हैं और हम उसकी निंदा करते हैं। लेकिन जो अच्छाइयां हैं, उनकी प्रशंसा भूल जाते हैं। जबकि अगर बुराइयां निंदनीय हैं तो अच्छाइयां प्रशंसनीय होनी चाहिए। एक बुराई को छिपाने से कई बुराइयां जन्म लेती हैं जो रिश्तों के पतन का कारण बनती हैं। कभी-कभी जरूरत से ज्यादा नाराजगी, उदासी, परेशानी, नकारात्मकता आदि जीवन में रिश्तों की डोर को इस तरह उलझा देती हैं कि फिर सुलझाना मुश्किल होता है।

परिवार को विघटित न होने देने में महिलाओं की अहम भूमिका होती है। उनकी दैनिक गतिविधियों, रहन-सहन और अपने कर्तव्यों के प्रति सजगता का परिवार के लोगों पर बड़ा असर पड़ता है। स्त्री जन्मदात्री है। समाज का हर व्यक्ति उसकी गोद में पल कर बड़ा होता है और सबसे पहले अपनी मां से ही कुछ भी सीखना शुरू करता है। लेकिन आज कामकाजी महिलाओं की जीवन और कार्य की शैली में बदलाव आया है। इसलिए कई बार उनके पास इतना समय नहीं निकल पाता है, न वह अपने कर्तव्यों के प्रति इतनी सजग है कि अपने बच्चों के व्यक्तित्व विकास की जिम्मेदारी पर पूरा ध्यान केंद्रित कर सके।

वह अपना उत्तरदायित्व निभाती है, लेकिन अब अपना मूल्य भी समझने लगी है कि उसकी भी एक जिंदगी है। जब वह अपना महत्त्व समझने लगती है और अपने अधिकारों की बात करती है तो कहा जाने लगता है कि इससे परिवार की नींव हिल जाएगी और मधुर रिश्ते टूट जाएंगे। पुरुष को घर का मुखिया माना जाता है। लेकिन वह भी परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने में असमर्थ है। उसमें भी कहीं न कहीं समर्पण के भाव में कमी आई है। बड़े-बुजुर्ग जो घर परिवार को बांध कर रखते थे, उनकी स्थिति तो आज बेहद कमजोर हो चुकी है।

इसी तरह परिवार का हर सदस्य ‘मेरी भी अपनी एक जिंदगी है’ मान कर अपने साथ अकेला होता जा रहा है। इसलिए हमें यह मानने की जरूरत है कि मेरी जिंदगी केवल मेरी नहीं, हम सबकी जिंदगी है और एक दूसरे से जुड़ी हुई है। हम अकेले नहीं, सबके साथ खुश हैं। हम एक दूसरे से बल पाते हैं। यह सच हमें स्वीकार करना चाहिए कि हम अपने मजबूत रिश्तों से ही मजबूत होते हैं।