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दुनिया मेरे आगे: गोधूली-सी उम्मीद

ग्रामीण सहपाठियों के खेतों से सर्दी की दोपहरियों में मटर की घुघनी (घुघरी) का स्वाद लेकर, कड़ाहे पर खौलते गन्ने के रस से बिखरती ताजे गुड़ की सुगंध नथुनों में भर कर, शहर में अपने घर लौटते समय पांव बेमन से उठते थे। लेकिन ग्राम्य जीवन के कड़वे सत्य सतह के नीचे छिपे रह जाते थे।ग्रामीण सहपाठियों के खेतों से सर्दी की दोपहरियों में मटर की घुघनी (घुघरी) का स्वाद लेकर, कड़ाहे पर खौलते गन्ने के रस से बिखरती ताजे गुड़ की सुगंध नथुनों में भर कर, शहर में अपने घर लौटते समय पांव बेमन से उठते थे। लेकिन ग्राम्य जीवन के कड़वे सत्य सतह के नीचे छिपे रह जाते थे।

शहर की प्रदूषण भरी जिंदगी में ग्राम समाज का खेतों के बीच रहना हमेशा लुभावना लगता है।

ग्राम्य जीवन से मात्र औपचारिक परिचय मुझे अक्सर अपराधबोध बनकर सताता है। जीवन के आरंभिक संस्कारग्राही वर्ष जिस छोटे से शहर में बीते, वहां ग्रामीण और शहरी, दोनों संस्कृतियां शाम के झुटपुटे में रोशनी और अंधेरे की तरह आपस में घुली-मिली होती थीं। न तो गोधूली में गले की घंटियां टनकाते गाय-गोरू थान पर लौटते नजर आते थे, न ही स्थानीय नगरपालिका शहर की सड़कों को ट्यूबलाइट की रोशनी में नहला पाने की कूबत रखती थी। ‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे’ पंक्तियां मन ललचाती थीं। ग्रामीण सहपाठियों के खेतों से सर्दी की दोपहरियों में मटर की घुघनी (घुघरी) का स्वाद लेकर, कड़ाहे पर खौलते गन्ने के रस से बिखरती ताजे गुड़ की सुगंध नथुनों में भर कर, शहर में अपने घर लौटते समय पांव बेमन से उठते थे। लेकिन ग्राम्य जीवन के कड़वे सत्य सतह के नीचे छिपे रह जाते थे।

किशोरावस्था में कौतूहल हुआ कि प्रकृति प्रदत्त गहनों से सजी भारत माता सुमित्रा नंदन पंत को ‘खेतों में फैला है श्यामल, धूल भरा मैला-सा आंचल, गंगा यमुना में आंसू जल, मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी’ क्यों लगी। भगवतीचरण वर्मा की कविता ‘भैंसागाड़ी’ की आरंभिक पंक्तियां ‘चरमर-चरमर चूं चरर-मरर, जा रही चली भैंसागाड़ी’ पढ़ कर पहले तो हंसी आई उस सजीव ध्वनि से अपने कस्बेनुमा शहर की नगरपालिका की सड़कों से कूड़ा उठाने की तत्कालीन व्यवस्था का ध्यान करके। लेकिन शीघ्र ही उपहास अश्रुसिक्त करुणा में बदल गया।

कृषक समाज की हताशाओं से नितांत अपरिचित मेरे शहरी मन को पहली बार पता चला- ‘जिसमें मानव की दानवता, फैलाए है निज राज पाट, साहूकारों का भेष धरे, हैं जहां चोर और गिरहकट- चांदी के टुकड़ों को लेने, प्रतिदिन पिसकर, भूखों मर कर, भैंसागाड़ी पर लदा हुआ, जा रहा चला मानव जर्जर, मानवता का कंकाल लिए, चरमर-चरमर चूं चरर-मरर, जा रही चली भैंसागाड़ी।’

भूखे-नंगे किसानों की मजबूरी के इस यथार्थ विवरण ने विह्वल कर दिया था। एक गहन अपराध भावना सताने लगी थी कि मटर की स्वादिष्ट घुघनी ने ग्राम्य जीवन की क्रूर सच्चाइयों से कितना अपरिचित रखा था मुझे। पिछले दशकों में हरित क्रांति और धवल क्रांति के बावजूद हजारों किसानों की आत्महत्या के समाचार ‘भैंसागाड़ी’ में वर्णित शहरी बिचौलियों और साहूकारों द्वारा शोषण का सत्य उजागर करके उद्वेलित करते रहे हैं। लेकिन यह छटपटाहट उस पीड़ा के सामने फीकी पड़ गई जो कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सुविधा विधेयक और कृषक सशक्तिकरण और संरक्षण विधेयक संसद के उच्च सदन में पारित किए जाते देख कर हुई।

राज्यसभा में इस विधेयक के पारित होते समय बेनकाब हुआ हमारी गणतांत्रिक व्यवस्था का चेहरा हैरान कर गया। दलगत राजनीति से असंपृक्त करोड़ों देशवासियों के लिए, जो इतने महत्त्वपूर्ण विधेयक को समझना चाहते थे, सदन की कार्यवाही एक अजूबा बनकर रह गई। सत्ता पक्ष के अनुसार यह विधेयक किसानों को व्यापारियों, खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों और निर्यातकों से सीधे संपर्क में लाकर आत्मनिर्भर बनाएगा, फसल का सही मूल्य दिलाएगा और बाजार में आई प्रतिस्पर्धा कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देगी, उधर विपक्ष सत्ता पक्ष के हर बिंदु का विरोध करते हुए इसे किसानों के लिए काला कानून मानता है तो किसान अपने अस्तित्व के खिलाफ!

करोड़ों शहरी नागरिक जो कृषि उत्पादन और वितरण से सीधे संबद्ध नहीं हैं. इन अत्यंत महत्त्वपूर्ण विधेयकों के दूरगामी नतीजों के अच्छे-बुरे दोनों पक्ष ठीक से समझना चाहते थे, लेकिन राजनीतिक दलों के आचरण ने उन्हें क्या दिया! इन अहम विधेयकों के संसद में आने से एक दिन पहले तक बड़े राजनीतिक दल बॉलीवुड में नशीली दवाओं और अन्य तरह के शोषण की गहन पड़ताल में और फिल्मी सितारों की संलिप्तता उजागर करने या मिटाने में व्यस्त थे। पारित हो जाने के बाद जिन विधेयकों को समाचार पत्रों के विज्ञापनों में इस कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए बेहद लाभदायक बताया जा रहा था, उन्हें संसद में लाने से पहले किसानों को समझाने के लिए प्रचारित करना कहीं बेहतर होता।

उधर विपक्ष संसद की मर्यादा को ध्वस्त करने वाले आचरण की भर्त्सना करने के बजाय उसके समर्थन में गांधीजी की मूर्ति को दुहाई दे रहे थे। इस समूचे प्रसंग के दौरान उस परिसर में जिनकी तकदीर लिखी जा रही थी, वे कहां थे या क्या कहीं उनकी आवाज सुनाई दे रही थी? कैसा लगता है जब हम किसी से गुहार लगाते रह जाते हैं कि हमारी बात भी सुन ली जाए और इस गुहार को दरकिनार करके हमारे अस्तित्व तक के बारे में फैसला सुना दिया जाता है!

मेरे जैसे जिज्ञासु सोचते ही रह गए कि सदन में इन विधेयकों की ज्ञानवर्धक समीक्षा होगी। कुछ सांसदों की गरिमाविहीन हरकतों के कारण लगता है कि स्वाधीन भारत में किसान तो भैंसागाड़ी के बजाय ट्रैक्टर ट्रालियों पर अपनी उपज लाद कर ले जाने लगे, लेकिन अब किसानी को हथियार बना कर देश के संविधान और जनतांत्रिक परंपराओं की हत्या की जा रही है। उनकी लाशें राजनीति की जिस भैंसागाड़ी में लाद कर दफनाने ले जाई जा रही हैं, उनसे भी वही चिर-परिचित ध्वनि आ रही है ‘चरमर-चरमर चूं चरर-मरर’!

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