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चमकीली खोल में कचरे का सामान

बाजार से एक पैकेट मशरूम लाया, तो पत्नी ने तारीफ करते हुए कहा- क्या बढ़िया मशरूम है।

प्रभात कुमार

बाजार से एक पैकेट मशरूम लाया, तो पत्नी ने तारीफ करते हुए कहा- क्या बढ़िया मशरूम है। मशरूम सचमुच बहुत अच्छा था, ताजा, साफ-सुथरा, दाग रहित। कुछ देर वह पैकेट खाने की मेज पर रखा रहा। बाद में उस पर नजर गई, नीले रंग का घटिया किस्म के प्लास्टिक का आयताकार पैक और ऊपर पतला पालीथिन लपेटा हुआ। मन में सवाल आया कि क्या यह मशरूम कागज या अन्य पर्यावरण मित्र पैकिंग में नहीं हो सकता था।

सेहत के लिए अच्छा माना जाने वाला मशरूम, सेहत के लिए हानिकारक माने जाने वाले प्लास्टिक और पालीथिन पैकिंग में। सरकार प्लास्टिक का प्रयोग बंद करने के लिए सख्त कानून बनाती है, उसे सख्ती से लागू करने का दावा करती है, लेकिन खरा सच यह है कि सही तरीके से बात बननी शुरू नहीं होती। जनता को चाहिए अनुशासन का कोड़ा।

उपदेश दिए जाते हैं कि शुरुआत खुद से करें। हर व्यक्ति कपड़े का थैला लेकर बाजार जा सकता है, ताकि खरीदा गया सामान उसमें लाए। किसी भी सामान, सब्जी, किरयाना या पहले से पैक सामान को अलग-अलग थैलों में लेने के बजाय, सीधे घर से लाए हुए थैले में डाले। यह वही नियम है कि आप दूसरों को नहीं बदल सकते, खुद में बदलाव ला सकते हैं। वैसे ऐसा भी नहीं कि हम कुछ बदल नहीं सकते।

मसलन, मशरूम के पैकेट की बात करें तो उस विक्रेता से मशरूम उगाने वाले का संपर्क नंबर लेकर उससे बात कर उसे प्रेरित कर सकते हैं कि वह मशरूम की पैकिंग में बदलाव लाए। वह सीधे-सीधे इनकार कर सकता है, क्योंकि उसकी वर्तमान पैकिंग मशरूम को ज्यादा समय तक ताजा रखती है। उसे अपने स्वार्थ से मतलब है। वह पूछ सकता है कि आप कौन होते हैं उसे समझाने वाले। किसी सरकारी कर्मचारी ने तो कभी कुछ नहीं कहा।

हम उसकी शिकायत कर सकते हैं सरकारी मंच पर, लेकिन लगता नहीं कि प्रशासनिक स्तर पर कोई संजीदा प्रयास करेगा। हम सभी जानते हैं कि इसी तरह से कितने किस्म के सामान की पैकिंग की जा रही है। पैकिंग मैटिरियल भी घटिया है और जो सामान उसमें पैक किया गया है वह उसे भी नुकसानदेह बना रहा है हमारे स्वास्थ्य के लिए। अगर सीधे उससे बात न कर प्रशासनिक अधिकारी से बात करेंगे तो बुरे बनेंगे और लिख कर शिकायत करनी पड़ेगी। मामला कानून की शरण में जाएगा, हमें एक गवाह के रूप में शामिल होना पड़ेगा। अपना कीमती समय देना होगा। मशरूम का वह विक्रेता दुश्मन हो जाएगा। अगर वह प्रभावशाली व्यक्ति हुआ, तो नुकसान हमारा होगा।

अगर हम कुछ साल पीछे जाकर बाजार से किसी भी किस्म का सामान बेचने-खरीदने की स्थिति देखें तो पाएंगे कि कितनी ही चीजें हैं, जिन्हें पैक करने की जरूरत नहीं है। मगर अब तो ज्यादातर चीजों की पैकिंग की जा रही है। पैकिंग उद्योग ने बाजार पर काबू कर रखा है। पैकिंग करके सामान के बाहरी हिस्से को सुंदर बना दिया, जिससे चीजें महंगी भी हो गई हैं और सामान की मात्रा कम होती गई है।

आम आदमी कुछ भी कर ले, पैकिंग की यह शैली बदलने वाली नहीं है। सब जानते हैं कि पैकिंग और डिजाइनिंग एक सशक्त व्यवसाय के रूप में उभरा है। इस व्यवसाय ने बेशक जीवन को ज्यादा चमक-दमक बख्शी, लेकिन इतना कूड़ा-कचरा भी बढ़ा दिया कि पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है। पैकिंग कूड़े का उचित तरीके से निस्तारण करना मुश्किल हो रहा है। अब हमारा ध्यान, सामान की पैकिंग जरूरतों को कम करने वाले, ज्यादा व्यवहारिक तरीकों की ओर जाना चाहिए।

हम अपनी जीवन शैली में थोड़ा सुधार कर कचरा कम करने में अपना योगदान दे सकते हैं। हमें यह बिलकुल नहीं सोचना होगा कि कोई और तो योगदान नहीं दे रहा है, इसलिए हम भी किसी भी किस्म का योगदान क्यों दें। सरकार कानून बना देती है और आमजन उसका सख्ती से लागू होने का इंतजार करते रहते हैं। एक अनुमान के मुताबिक अगर एक व्यक्ति घर से कपड़े का अपना थैला लेकर सामान लेने बाजार जाए, किसी भी दुकानदार से किसी भी किस्म का अतिरिक्त थैला न ले तो वह एक साल में कई हजार अतिरिक्त थैले न प्रयोग कर अपना योगदान दे सकता है।

ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें वह बिना किसी थैले या लिफाफे के हाथ में पकड़ कर घर तक ला सकता है, क्योंकि वह चीज पहले ही पैक्ड है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है, हम सामान खरीद कर लाए हैं, चुराकर नहीं। हमें यह गर्व महसूस करना चाहिए कि हमने बिना किसी के आग्रह के पैकिंग का कचरा न बढ़ाने में सहयोग किया। हमारा यह सहयोग एक तरह से राष्ट्रप्रेम ही है, जिसमें पूरी शुद्धता है, कोई विज्ञापन नहीं।

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