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दुनिया मेरे आगेः विज्ञान के बरक्स

समय बीतने के साथ हम रूढ़िवादी होते जा रहे हैं!

Author October 29, 2018 3:36 AM
प्रतीकात्मक चित्र

अंशुमाली रस्तोगी

अक्सर मुझे ऐसा लगता है कि हम विज्ञान से लगातार दूर होते चले जा रहे हैं। हमलोग रोज ही किसी न किसी से मिलते हैं। तरह-तरह की ढेर सारी बातें करते हैं। घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार, अड़ोस-पड़ोस, दोस्त-दुश्मन का हाल-चाल भी लेते हैं। लेकिन विज्ञान पर कतई कोई बात नहीं करते कि इस क्षेत्र में क्या नया हो रहा है, हाल में क्या खोज की गई या फिर विज्ञान से जुड़ी किसी पत्रिका का ही जिक्र हो। आलम यह है कि घर में भी हम आपस में विज्ञान पर कोई बातचीत नहीं करते। हमारे पास बात करने के लिए या तो बाजार में आए नए मोबाइल की खासियतें होती हैं या फिर यह कि कौन-सी कंपनी इंटरनेट चलाने के लिए कितना ‘डेटा पैक’ दे रही है। बाइक-कार और रुपए-पैसे की बातें होती हैं या फिर मेरी-तेरी, इसकी-उसकी लगाई-बुझाई का जिक्र होता है।

हाल में जो खबर आई, वह तो और भी चौंकाने वाली है कि हम हर रोज करीब नौ से दस घंटे सोशल मीडिया पर गुजार रहे हैं। हमारे दिन की शुरुआत मोबाइल के इस्तेमाल से शुरू होती है और रात भी इसी के आगोश में बीतती है। इस नशे में हमने पढ़ना लगभग त्याग दिया है। ऐसे में भला विज्ञान पर बात या जिक्र क्या हो? अब तो घरों में पुस्तकालय भी नजर नहीं आते। धर्म, आस्था और राजनीति के बढ़ते प्रचार ने विज्ञान को लोगों से दूर रखने का ही काम किया है। धर्म और विज्ञान में तो यों भी ‘छत्तीस का आंकड़ा’ सदियों से रहा है। धर्म दरअसल आस्था और विश्वास की बात करता है, जबकि विज्ञान तर्क की। तर्क के आगे धर्म ठहर नहीं पाता, इसीलिए लोगों को ज्यादा से ज्यादा धार्मिक आस्थाओं की ओर मोड़ा-तोड़ा जाता है। समाज में धार्मिक आस्थाओं का जिस कदर बोलबाला है, कभी-कभी तो लगता है कि धर्म ही हमारी पहचान है, विज्ञान-सम्मत आविष्कार नहीं। कुछ राजनीति का वर्चस्व भी लोगों के दिलोदिमाग पर ऐसा चढ़ा रहता है कि जो नेता कहे-बोले बस वही ठीक, बाकी सब बेकार। यह हकीकत है कि जवाहरलाल नेहरू के बाद नेताओं में किसी तरह की वैज्ञानिक और प्रगतिशील सोच देखने-सुनने को नहीं मिली है। सारा ध्यान वोट की राजनीति पर केंद्रित है।

सवाल है कि विज्ञान पर बात क्यों और कौन करे! जिस विचार या दृष्टि में तर्क होगा, वहां न राजनीति टिकेगी, न नेता, न किस्म-किस्म की धार्मिक आस्थाएं। दूसरी ओर, जनता और वोट को विज्ञान से नहीं, धर्म और जाति से बहलाए जाते हैं। हम एक ऐसा जड़ समाज बन चुके हैं, जहां विज्ञानसम्मत तर्कों पर बात या बहस करने वाला बेवकूफ समझा जाता है। ज्यादातर लोग उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। वहीं रात-दिन धर्म-ईश्वर की भक्ति में लीन रहने वाले को अक्सर बहुत बड़ा समाज सुधारक घोषित कर दिया जाता है। क्या हमारी सोचने-समझने की शक्ति का विकास इस हद तक पहुंच कर रुक गया है कि हम सही-गलत के बीच फर्क करना भूल गए हैं?

अगर सब कुछ धर्म, आस्था, भक्ति, पुरातन परंपराओं के सहारे ही हो रहा है तो फिर विज्ञान की जरूरत क्या है! क्या जरूरत है रोज नई खोजों और आविष्कारों की! एक बहुत छोटी-सी बात हम नहीं समझना चाहते हैं कि दुनिया, समाज और मनुष्य का अस्तित्व सिर्फ विज्ञान के दम पर ही कायम है, न कि धार्मिक विश्वास के। हाल ही में यह खबर पढ़ी कि चीन अपना चांद बनाने की कोशिश में है! और हमारे लिए धार्मिक आस्थाओं के सवाल ज्यादा अहम हैं। आज इक्कीसवीं सदी में हम ऐसी दयनीय और लापरवाही के हालात में हैं कि रेल की पटरियों पर खड़े होकर तमाशा देखते हैं और इस बीच एक ट्रेन लोगों को गाजर-मूली की तरह काटती हुई निकल जाती है। हंगामा मचता है। जिम्मेदारियां कभी इस पर तो कभी उस पर डाली जाती हैं। कुछ ही दिनों में फिर सब सामान्य! क्या इतने सारे लोगों की मौत वाकई इतनी सस्ती है हमारे यहां?

हमें खुद ही से पूछने की जरूरत है कि हम अपने बच्चों को घर और स्कूलों में विज्ञान के नाम पर क्या दे रहे हैं! आलम यह है कि हम उन्हें यूट्यूब पर फिल्म और गाने देखने के लिए तो कहते हैं, मगर कभी विज्ञान पर कुछ देखने को नहीं कहते! क्यों? या तो हम विज्ञान को समझते नहीं या फिर जानबूझ कर अपने बच्चों को इससे दूर रखना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो यह बहुत ही दुखद और पिछड़ी सोच का प्रतीक है। हैरानी इस बात पर होती है कि समाज और समय जैसे-जैसे नई सदी, नए युग में प्रवेश करता जाता है वैसे-वैसे हम और ज्यादा रूढ़िवादी होते-बनते जा रहे हैं। डिजिटल होना बुरा नहीं। डिजिटल का गुलाम बन जाना बुरा है। इससे बाहर भी एक दुनिया है, जिसमें विज्ञान के साथ-साथ तर्क और विमर्श है। उससे हम खुद को या बच्चों को क्यों जुदा रखना चाहते हैं? विज्ञान के बीच लौटने की जरूरत है, क्योंकि ज्ञान का रास्ता यहीं से होकर निकलता है।

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