repressed talents ahead of parents' craving - दुनिया मेरे आगे: दमित प्रतिभाएं - Jansatta
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दुनिया मेरे आगे: दमित प्रतिभाएं

चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए जब एमए और पीएचडी की डिग्री वाले आवेदन करते हैं तो जनता और नौकरियों के बीच का अनुपात देख कर देश की बदहाली का पता चलता है।

Author June 4, 2018 5:27 AM
आज संतोष कहीं बिला गया है। सुंदरता और गुण बाहरी हैं। आप भीतर से भले खोखले हों, बाहर से भरे-पूरे दिखने चाहिए।

वीणा शर्मा

वह जब पहली बार मेरे पास आई थी तो समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे और क्या न करे। घर में डांट-फटकार का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा था। पूरे साल उसने हाड़तोड़ मेहनत की, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात। वह अपने दुख से उबर नहीं पा रही थी कि पूरा साल उसने आइएएस की परीक्षा के कारण कहीं दूसरी जगह न तो दाखिला लिया और न कुछ और करने के बारे में सोचा। उसके माता-पिता को मैं करीब से जानती हूं। उन्हें पहले की पीढ़ियों से चलती आ रही काफी संपत्ति मिली, लेकिन ऐसा कुछ नहीं सीख सके, जो अपनी खुशी के साथ-साथ बच्चों को समझने की सीख भी देते। उच्च वर्ग की सोहबत ने मन में सिविल सर्विस की लालसा जगा दी।

उस लड़की की रुचि गणित में शुरू से ही नहीं थी, लेकिन ट्यूशन रखवा कर उसे डॉक्टरी पास करने की ओर धकेला गया। वहां कामयाबी नहीं मिली। कॉलेज में जब वह साहित्य पढ़ना चाहती थी तो वहां भी माता-पिता की दूसरी लालसा सिर उठाने लगी। पिता कहीं से सलाह-मशविरा करके आए और सीधा आदेश दिया कि इतिहास और राजनीतिशास्त्र विषयों के साथ स्नातक करो और साथ-साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी शुरू करो। डॉक्टर तो बन नहीं पाई, अब कम से कम आइएएस अफसर बन कर दिखा दो… इस बार हमारा सिर झुकने मत देना… सारी सहूलियतें तो तुम्हें मिल रही है… वगैरह। मैंने कई बार उसके माता-पिता को समझाने की कोशिश की, लेकिन आखिर एक दिन मुझे यह सुना दिया गया कि उन्हें अपनी बेटी को हिंदी की मास्टरनी नहीं बनाना है।

लड़की ने माता-पिता की जिद को अपने कर्तव्य में शामिल कर लिया। मैंने जब भी उसे खोजा, वह या तो पुस्तकालय गई होती या कोचिंग। लगातार पढ़ाई की भागदौड़ शरीर के साथ-साथ उसके मस्तिष्क को भी थका रही थी। पहली बार की कोशिश में वह असफल हुई तो जाहिर है, उसे फटकार मिली होगी। दूसरी बार में भी उसे असफलता ही मिली। तीसरी बार उसने एक दफ्तर की नौकरी के साथ परीक्षा देने का फैसला तो किया था, लेकिन इससे पहले ही उसकी तबियत खराब हो गई। हालत ज्यादा बिगड़ी और जांच में पता चला कि उसके दोनों गुर्दे खराब हो चुके थे। पैसा पानी की तरह बहाने के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका। उसकी बीमारी का कारण डॉक्टरों ने मानसिक तनाव को भी बताया था।

उसकी मौत कई सवाल पैदा करती है। जिन हालात में उसने अपने जीवन को जीया, वह अलग तरह का भी हो सकता था। आज हम अंधाधुंध जिस दौड़ में भागते चले जा रहे हैं, वह बहुत खतरनाक और डरावना है। इस दौड़ ने हमारे मस्तिष्क को जकड़ रखा है। बारहवीं पास करके जब बच्चे दाखिले के लिए आते हैं तो नब्बे प्रतिशत बच्चों को आइएएस अफसर ही बनना होता है। लाखों प्रतिभागी परीक्षा में बैठते हैं। कुछ ही सफल हो पाते हैं। बाकी गुमनामी के अंधेरे में गायब हो जाते हैं। कई वैसे लोग भी हताशा में अपनी जान गंवा देते हैं, जो जीवित रहते हुए बहुत कुछ रचनात्मक कर सकते थे।

चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए जब एमए और पीएचडी की डिग्री वाले आवेदन करते हैं तो जनता और नौकरियों के बीच का अनुपात देख कर देश की बदहाली का पता चलता है। कुछ अपने माता-पिता की इच्छाओं, कामनाओं की भेंट चढ़ जाते हैं। वे एक ऐसा जीवन जीते हैं जो उनका चुना हुआ नहीं होता। पीड़ा में जीने वाले कभी न कभी अपने अंदर समेटे हुए दर्द को जब गलत तरीके से निकालते हैं तो समाज के उस घिनौने चेहरे को देख कर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। दरअसल, समाज की संरचना में भी कई असंगतियां हैं। पूरा समाज तो कभी भी सभ्य नहीं रहा होगा। लेकिन आज की तस्वीर कुछ अधिक डरावनी है।

आज संतोष कहीं बिला गया है। सुंदरता और गुण बाहरी हैं। आप भीतर से भले खोखले हों, बाहर से भरे-पूरे दिखने चाहिए। ऐसे ही दिखावे कई बहुमूल्य जीवन लील लेते हैं। जब माता-पिता अभिभावक और मित्र न होकर मालिक बन जाते हैं तो संतानें या तो मुंहजोर अपराधी निकलती हैं या फिर अपनी जान से हाथ धो बैठती हैं। अंग्रेजों का दिया बाबूगीरी का ढांचा अगर अब तक वैसा ही आकर्षण बनाए हुए है तो आजाद भारत की सरकारें भी जनसामान्य को रोजगार के अवसर नहीं मुहैया करा पाई हैं।

हालांकि तस्वीर में बहुत सुंदर रंग भी हैं और होंगे। लेकिन उस लड़की और उसके जैसे वे तमाम बच्चे जिन्हें अपने भविष्य का निर्णय करने का अधिकार नहीं मिला, उनके प्रति कौन जवाबदेह होगा? अज्ञेय के मुताबिक जो माता-पिता या अभिभावक दुख के मंजे हुए होंगे, वे अपनी संतानों को अपनी लालसाओं के कारण दुखी नहीं करेंगे, उन्हें उनकी स्वतंत्र मंजिल चुनने के लिए मुक्त करेंगे। ऐसी मुक्ति उन्हें न केवल खुद के लिए, बल्कि समाज के लिए भी जिम्मेदार नागरिक बनाने में कारगर साबित होगी।

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