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आस्था का सागर

भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहां आस्था प्रकट करने के अनगिनत अवसर आते हैं। खासकर दीपावली के बाद कथा, पुराण और भक्ति संध्या का सिलसिला चल पड़ता है।

भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहां आस्था प्रकट करने के अनगिनत अवसर आते हैं। खासकर दीपावली के बाद कथा, पुराण और भक्ति संध्या का सिलसिला चल पड़ता है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहां आस्था प्रकट करने के अनगिनत अवसर आते हैं। खासकर दीपावली के बाद कथा, पुराण और भक्ति संध्या का सिलसिला चल पड़ता है। भागवत की कथा यहां-वहां, इस या उस मंदिर में, बड़े हॉलों और बगीचों में ही नहीं, सड़क रोक कर आने-जाने वालों को परेशान करते और आस-पड़ोस के लोगों को हैरान करने की परवाह किए बिना बड़े जोशो-खरोश से आयोजित होती है। कथावाचक मोटी रकम ऐंठ कर अपने पूरे लवाजमे के साथ आते हैं और कथा के नाम पर लोगों का शुद्ध मनोरंजन करते हैं। हारमोनियम और तबले की थाप के साथ संगीतमय भजन होते हैं और श्रोताओं को सुबह-शाम उम्दा भोजन कराया जाता है।

धर्म के नाम पर और आस्था के बहाने लोग पैसा पानी की तरह बहाते हैं। पिछले दिनों मेरे एक परिचित ने भागवत कथा पर पंद्रह लाख रुपए खर्च किए। आयोजन एक मंदिर परिसर में हुआ और करीब डेढ़-दो सौ लोगों ने पूरे सप्ताह सुबह-शाम स्वादिष्ट भोजन किया। ऐसे ही एक बार जब मैं दिल्ली से इंदौर आ रहा था तो ट्रेन में पता चला कि दिल्ली के किसी रईस परिवार ने उज्जैन में भागवत कथा रखी है और सभी रिश्तेदारों के लिए प्रथम श्रेणी एसी और हवाईजहाज से आने-जाने की व्यवस्था की है। रेल में तत्काल कोटे से जो टिकट बुक कराए गए थे, उनमें पंद्रह के पैसे व्यर्थ गए, क्योंकि बहुत से लोग हवाईजहाज से गए। जब इस अनुपात में धर्म के नाम पर पैसा लुटाया जाता हो तो कैसे कहा जा सकता है कि देश में लोग गरीबी से परेशान हैं?

एक ताजा आयोजन तो ठीक सड़क पर मंच बना कर किया गया। आयोजन के चार दिन पहले से ही यातायात रोक दिया गया था और अगले हफ्ते तक बंद रहा। इसी मार्ग पर तीन-चार स्कूल बसें भी आती-जाती हैं। बेचारे छोटे बच्चे दूर से उतरते-चढ़ते रहे। इसी जगह सब्जी बाजार भी लगता है, मगर भागवत के कारण नहीं लग पाया। मुहल्ले के लोग शोर-शराबे से अलग परेशान होते रहे। पर किसी ने कोई एतराज या शिकायत नहीं की। न ही प्रशासन या पुलिस से कोई संज्ञान लिया कि ऐसी घनी और व्यस्त बस्ती में सड़क रोक कर आयोजन कैसे हुआ? इसी बीच आयोजक भाइयों की एकमात्र बहन मंच पर नृत्य करते-करते हृदयगति रुकने से चल बसीं। मगर कथावाचक का कहना था कि भागवत बीच में रुकती नहीं, इसलिए उनके घर के ठीक सामने ढोल-ढमाके के साथ कथा जारी रही। क्या यह आस्था का विकृत रूप नहीं है? लोग यह भी कहते हैं कि भागवत कथा मंदिरों में ही की जाती है, ऐसे सार्वजनिक स्थान पर नहीं। तो क्या कथावाचक को यह नहीं पता था और उसने एतराज क्यों नहीं किया?

दिक्कत यही है कि स्थान-स्थान पर ये कथावाचक कथा कहने के लिए आ तो जाते हैं, पर सिवाय अपने पारिश्रमिक और चढ़ावे के उनका ध्यान किसी अन्य चीज पर नहीं होता। यह भी पता चला कि एक कथावाचक तो सीए हैं और उन्होंने कुछ साल अपना दफ्तर भी चलाया, पर पंडिताई में उन्हें अच्छी आमदनी नजर आई। सो, भगवा दुपट्टा ओढ़ लिया। यहां आमदनी ही आमदनी है, न टैक्स का डर न किसी तरह की असुरक्षा। ऊपर से समाज उद्धार का तमगा और लोगों के कल्याण का दावा अलग।

हैरानी की बात है कि धर्म की आड़ में सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले ऐसे आयोजन सभी नियम-कायदों की सरेआम धज्जियां उड़ाते हैं। उन्हें न बिजली की चिंता है, न आवागमन रुकने की और न ही प्रदूषण की। बेफिक्र बने रहते हैं कि कोई किसी तरह की कभी शिकायत करेगा ही नहीं। ऐतराज करने वाला अधार्मिक, नास्तिक और धर्म विरोधी माना जाएगा।

नियम विरुद्ध और आम लोगों को तकलीफ देने वाले ऐसे आयोजन क्या लोगों को जाने-अनजाने धर्म के खिलाफ नहीं कर रहे हैं? परेशान लोग इतना डरते हैं कि वे खुल कर इन बातों के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा पाते और आयोजक बेखौफ। पर लोग आखिर कितना सहन कर सकते हैं? ऐसी क्या मजबूरी है कि लोग गलत बात के खिलाफ भी आवाज नहीं उठाते। जो हाल आम आदमी का है वही जिम्मेदार लोगों का है, वह पुलिस हो या अन्य प्रशासकीय अधिकारी। सब सोचते हैं कि जब किसी को किसी बात की शिकायत ही नहीं है, तो फिर कार्रवाई क्यों की जाए? यही ढर्रा चलता रहता है और नियम तोड़ने वाले मनमर्जी करते रहते हैं। ऊपर से राजनीतिक दखल का डर तो रहता ही है। आखिर यह दृश्य कब सुधरेगा?

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