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सद्भाव का समाज

एक समय था जब हम लड़ाई-झगड़ों को पहले आपस में मिलजुल कर हल कर लिया करते थे या किसी की बात को इतनी गंभीरता से नहीं लेते थे कि लड़ने-झगड़ने लग जाएं।

एक समय था जब हम लड़ाई-झगड़ों को पहले आपस में मिलजुल कर हल कर लिया करते थे या किसी की बात को इतनी गंभीरता से नहीं लेते थे कि लड़ने-झगड़ने लग जाएं। पर अब तो किसी हलकी बात पर भी लोग बिना सोचे-समझे किसी पर भी हमला कर देते हैं, फिर उसे धर्म, जाति आदि की रक्षा से जोड़ देते हैं! हाल की कुछ घटनाओं को देखते हुए यही लग रहा है एक खास तरह का विद्वेष और शक माहौल में घुल रहा है। अब हम यह भी नहीं सोच पा रहे कि भारत विविधताओं को अपने साथ लिए एक अनोखा देश है, जहां लोग आपसी सामंजस्य के साथ जीते रहे हैं। लेकिन आज उन्हें केवल किसी धर्म के आधार पर ही नहीं, बल्कि उन्हें जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भी बांट दिया जाता है। धर्म या जाति के नाम पर हमले छिपे नहीं रहे हैं। हालत यह है कि सड़कों पर हलकी टक्कर जैसी बात पर भी हिंसा हो जाती है।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या पहले भी हमारा समाज ऐसा ही अधैर्य रखने वाला था! अगर हम इसका उत्तर इतिहास में तलाशें तो यह नाटकीय परिवर्तन धीरे-धीरे हुआ लगता है। इस परिवर्तन में सदियों लगे होंगे। अगर हम भारतीय समाज को देखें तो यह मोटा-मोटी चार बार बदला है। हड़प्पा और मोहनजोदेड़ो आदि सभ्यताएं पहला बदलाव थीं, हमारी संस्कृति और समाज का। वहीं से हमने चलने से लेकर जीना सीखा। अगर वे सभ्यताएं नहीं आई होतीं तो हम शायद यहां का सफर नहीं कर पाते, जो कर पाए!
दूसरा बदलाव तुर्क और अफगानों के समय दर्ज किया गया। पर उन्होंने अपना पूरा ध्यान केवल लूट-मार पर कायम रखा। इसी का नतीजा है कि केवल इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज होने के अलावा उनकी कोई स्मृति हमें नहीं दिखाई देती, जिससे एक नए समाज और संस्कृति का निर्माण होता। जबकि मुगलों ने सबको साथ लेकर भारत को अपने मुताबिक एक नए समाज और संस्कृति में ढाला। यही वजह है कि इनकी संस्कृति को हम अंग्रेजों के बाद सबसे ज्यादा प्रभावशाली संस्कृति के तौर पर देख सकते हैं। इसने हमें सोचने का एक अलग ही नजरिया दिया।
लेकिन दो सबसे बड़े बदलाव जो हमारे वातावरण में आए वे थे मुगलों और अंग्रेजों के समय। भारतीय समाज को अगर सबसे ज्यादा फर्क पड़ा तो वह अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ के तहत देश पर राज करने की रणनीति थी। उन्होंने एक अंग्रेजनुमा भारत बनाने की कोशिश भी की। यह भारतीय संस्कृति में मुगलों के बाद किया जाने वाला सबसे बड़ा बदलाव था। पर जो शुरुआत अंग्रेज कर गए थे, वह केवल आजादी के समय नहीं, उससे आगे भी देखने को मिली। पर इतना अधैर्य तो तब भी नहीं था, जब हम आजादी के कगार पर खड़े थे। तब भी हम कुछ किस्से पढ़ते या सुनते रहते हैं कि किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति की जान बचाने के लिए कुछ पड़ोसी उन्हें अपने घर में छिपा लेते थे। पर ऐसे उदाहरण अब बहुत कम देखने में आते हैं!
कहां खड़े हैं हम, खुद को कहां से देख रहे हैं हम? कहां हम बात कर रहे हैं विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तो दूसरी ओर आपस में ही लड़-झगड़ रहे हैं, वह भी उनकी बातों में आकर, जिन्हें हमारे कल्याण से कोई मतलब नहीं है। क्या हमारे समाज में कभी विकास पर सचमुच की बात होगी? क्या हम नहीं देख रहे हैं कि अमेरिका के चुनाव में केवल एक मुद्दा दिखाई देता है और वह है टैक्स का? क्या टैक्स किसी धर्म या जाति से संबंधित है?
आखिर हम कहां जाना चाह रहे हैं? किस तरह के देश, समाज में रहना चाह रहे हैं? क्या बदलाव लाना चाह रहे हैं? किस तरह के राजा और कैसे नागरिक को हम देखना चाह रहे हैं? कैसा साहित्य पढ़ना चाह रहे हैं? किस तरह खाना-बोलना और रहन-सहन चाहते हैं? आज जब खबर सुनते हैं कि हाईकोर्ट के एक निर्णय से शिक्षामित्र से अध्यापक बने कुछ लोग आत्महत्या तक के लिए तैयार हो जाते हैं, तब वह कौन-सी स्थिति होती है। अब तो कई बार लगता है कि हम विश्व अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने की ओर तो बढ़ रहे हैं, पर एक ऐसी संस्कृति और समाज भी बना रहे हैं जहां से हमें कई धाराएं दिखाई दे रही हैं जो हमें अलग-अलग खांचों में बंटा हुआ दर्शा रही हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि इस भारतीय समाज में किस तरह का बदलाव देखना चाहते हैं!

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