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दुनिया मेरे आगेः असल जीवन का अक्स

अपने स्कूली जीवन के दौरान देखी हुई एक फिल्म याद आती है जिसमें अभिनेत्री रेखा पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं और अपराधियों से लोहा लेती हैं।

Author May 27, 2016 2:57 AM
‘Phool Bane Angaray में रेखा का लुक

अपने स्कूली जीवन के दौरान देखी हुई एक फिल्म याद आती है जिसमें अभिनेत्री रेखा पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं और अपराधियों से लोहा लेती हैं। अपने साथ हुए जुल्म का बदला लेने के लिए नायिका दूसरों से इंसाफ के लिए गिड़गिड़ाने के बजाय खुद मेहनत करके अपने आपको सक्षम बनाने की कहानी कहती है। इससे भी पुरानी एक और फिल्म मुझे याद है, जिसमें अशिक्षित मगर आत्मसम्मान से लैस औरत अपने पति के नहीं रहने पर किस तरह गरीबी से जूझती, अपने बच्चे पालती है। यह फिल्म ‘मदर इंडिया’ थी। अलग-अलग समय में बनी इन फिल्मों के अलावा ऐसी कम फिल्में हैं जो रुपहले परदे पर औरत के किरदार को लेकर उकेरी गर्इं। यों भी, हर कालखंड में महिलाओं ने अपनी पहचान बनाने के लिए घर-परिवार और समाज में अपनी सही जगह पाने के लिए खूब मेहनत की, पर उस संघर्ष को सामाजिक स्वीकृति मिली हो, ऐसा कभी-कभार ही हुआ।

समाज की कोई एक घटना लेखक से कहानी निकलवा लेती है और वह कहानी किसी फिल्मकार को फिल्म बनाने के लिए प्रेरित कर देती है। फिल्में सिर्फ किसी फिल्म निर्माता के सिनेमा बनाने के सपने पूरा करने का जरिया भर नहीं हैं। यह माध्यम कहानी के साथ-साथ मनोरंजन का वादा भी करता है। कुछ काल्पनिक घटनाओं, अविश्वसनीय परिस्थितियों का ताना-बाना बुन कर रुपहला परदा दर्शकों के मन में छिपे सपनों को दो-ढाई घंटों के दौरान सच में बदलने का भ्रम पैदा करता है। यह सौदा बुरा नहीं है जो हमारी दबी-छिपी आकांक्षाओं को पर लगा कर कुछ देर सपनों की दुनिया में उड़ान भरने का जरिया बनता है। फिल्म देख कर लौटता दर्शक कहानी में अपनी पहचान ढूंढ़ता है, अपने आसपास के लोगों में चरित्र खोजता है।

सामाजिक बदलाव से लेकर आजादी की लड़ाई तक, गृहस्थी के मोर्चे से राजनीतिक ऊंचाइयों तक, हर समय स्त्री का संघर्ष जारी रहा है। सुनहरे परदे पर महिलाओं को एकाध अपवाद छोड़ कर सुंदरता और मनोरंजन परोसने तक सीमित कर दिया गया। फिर भी महिलाओं ने हार नहीं मानी, अपना संघर्ष जारी रखा और कई दशकों के बाद कुछ फिल्मों ने औरतों के साथ कभी-कभी न्याय भी किया।

परिवार में बेटों की बराबरी की कोशिश करती बिटिया ने, समाज में पुरुषों के समान हक पाने की कोशिश में आवाज उठाती स्त्रियों ने अपने होने की लड़ाई लड़ी, जिससे प्रेरित होकर कभी-कभी उनके जीवन पर कहानियां लिखी गर्इं और उससे भी कम बार किसी फिल्मकार ने महिला प्रधान फिल्म बनाने का जोखिम उठाया। पर आज तस्वीर बदल रही है। आज के दौर में कहानीपरक फिल्में दर्शकों को अपनी ओर खींच रही हैं यानी जिसमें सच्चाई यानी समाज से जुड़ी घटनाएं दिखें। समाज की बुराइयों से अकेले लड़ते नायक पर बनी फिल्में अब बासी हो चुकी हैं, क्योंकि असल जीवन में औरतें अपनी पहचान गढ़ रही हैं। लगातार अनदेखी का शिकार होती महिलाओं को आज के फिल्म निर्माता और ज्यादा अनदेखा नहीं कर सकते।

जब बड़े-बड़े सुपर स्टारों की काल्पनिक कहानियों पर बनी फिल्में औंधे मुंह गिर रही हैं ऐसे दौर में जीवन की सच्चाइयों से दो-दो हाथ करती ‘मैरी कॉम’ लोगों को पसंद आती है। एक साधारण लड़की की असाधारण-सी कहानी में मुख्य किरदार निभाती अनुष्का शर्मा ‘एनएच 10’ में लोगों के दिलो-दिमाग पर चढ़ जाती है। ‘पीकू’ की दीपिका पादुकोण हो या ‘हाइवे’ की आलिया भट्ट या फिर एक दबी-कुचली-सी लड़की की कायापलट के किरदार में ‘क्वीन’ की कंगना रनौत को दर्शक सिर-माथे पर बैठा लेते हैं। इन सभी फिल्मों की कहानियां ऐसी हैं जो हमारे आसपास फैली हुई हैं, मगर आज तक उन्हें अनदेखा कर दिया गया था। पर अब वक्त बदल गया है। आज नायिका प्रधान फिल्में न सिर्फ जरूरत बन गई हैं, बल्कि वही सच्चाई का बोझ ढोती असल जीवन की महिलाएं रुपहले परदे पर अपना अक्स उतरता देख रही हैं।

भारतीय सिनेमा पर आज तक आरोप लगते रहे कि वह कहानियां और गीत-संगीत चुरा कर अपना काम चलाता है, लेकिन पिछले कुछ समय से महिलाओं को केंद्र में रख कर बनी फिल्मों की बराबरी तो हॉलीवुड में भी नहीं मिलती। मुझे याद नहीं आता कि वहां का सिनेमा इतने कम समय में इतना ज्यादा बदला होगा या उसमें इतनी तेजी से विकास हुआ। हमारे समाज की महिलाओं ने अपनी पहचान पाने लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। कभी वह हारी, कभी जीत गई। कहीं उसे पहचान मिली तो कहीं उसका अस्तित्व मिटा दिया गया, पर वह रुकी नहीं। स्त्रीवाद और लैंगिक समानता के नाम पर अलग-अलग धड़ों में बंटे समाज में फिल्मों का बदलता स्वरूप, स्त्री के संघर्ष और अपनी पहचान पाने की लड़ाई को प्रामाणिक करता है। महिलाओं के हक में अभी सफलताएं आनी शुरू हुई हैं, राह बहुत लंबी है। मंजिल दूर सही, मगर संघर्ष जारी है।

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