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झुकने के संदर्भ

आत्मसम्मान को खोकर झुकना खुद को खोने के समान है।

मोहन वर्मा

रोजमर्रा की जिंदगी में व्यक्ति को अलग-अलग वजहों से कई बार झुकना पड़ता है। जूते के फीते बांधने से लेकर जमीन पर पड़ी कोई वस्तु उठाने तक। भोजन करते समय रोटी का कौर मुंह में रखने से लेकर भोजन देने वाले परमात्मा के सामने कृतज्ञता प्रकट करने और अपने मन की बात उस तक पहुंचाने के लिए कई-कई बार झुकना पड़ता है। इस लिहाज से देखें तो झुकना बहुत अच्छी बात है। यह विनम्रता की पहचान है।

लेकिन अगर झुकने के संदर्भ में आत्मसम्मान का सवाल आए तब? इस बात पर शायद सभी सहमत होंगे कि आत्मसम्मान को खोकर झुकना खुद को खोने के समान है। मशहूर कवि दुष्यंत कुमार की गजल का एक शेर है- ‘ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा/ मैं सजदे में नहीं था,आपको धोखा हुआ होगा।’ यानी कोई व्यक्ति जिंदगी की गाड़ी का बोझ ढोने के लिए झुकता है तो कोई सर्वशक्तिमान को धन्यवाद अदा करने। तो अगर हम झुकने की समस्या पर विचार कर ही रहे हों तो इसके संदर्भों के मुताबिक ही झुकने की व्याख्या होनी चाहिए।

यों झुकना व्यक्ति के मनोभावों को प्रकट करने की जरूरत भी है और कई बार जरूरी क्रिया भी। निजी जीवन में अपनी जरूरतों के लिए हो या फिर पारिवारिक या सार्वजनिक जीवन मे मजबूरीवश झुकना जरूरी हो, ज्यादातर लोगों को ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ सकता है। मजबूरी से जुड़ी इस तरह की अनिवार्यता कई बार रिश्तों को बचाने, नौकरी, व्यवसाय बचाने या फिर दांव पर लगी इज्जत और अस्मिता बचाने के लिए व्यक्ति को झुकने के लिए मजबूर कर देती है।

डाली पर लगा खिलखिलाता फूल अपनी सुंदरता और खुशबू के कारण गर्व से अकड़ कर नहीं, बल्कि अपना सर्वस्व दूसरों को सौंप देने और समर्पण की भावना से झुका होता है। डाली पर झुक कर लगे फूलों से गुंथी माला या गुलदस्ते दरअसल कड़वे या उलझे रिश्तों को सुलझाने से लेकर किसी के प्रति मान-सम्मान और प्यार के इजहार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। नम्रता से झुक कर और झुके हुए फूलों का सहारा लेकर कई उलझी गुत्थियां सुलझाई जा सकती हैं। कई अहंकारियों के मस्तक झुकाए जा सकते हैं। कहा जा सकता है कि आत्मसम्मान को बचाने के लिए नहीं झुकना जहां अहम हो सकता है, वहीं यह भी सही है कि इससे अहंकार का भी इलाज किया जा सकता है।

किसी के प्रति गुस्से और आक्रोश से भरी तनी हुई आंखें देख लीजिए या फिर शर्म-हया और नफासत से झुकी आंखें देख लीजिए, झुकने का फन आपको प्रभावित किए बिना नहीं रहेगा। झुकना हमेशा अहंकार नहीं, बल्कि ज्यादातर मामलों में विनम्रता का प्रतीक है। झुकना कहीं रणनीति भी हो सकती है और इस तरह झुक कर कोई दुनिया को झुका सकता है। जैसे मुस्कुराहट और मुस्कराते चेहरे सबका दिल जीत लेते हैं, ठीक वैसे ही विनम्रता से झुक कर कई बिगड़े काम बन सकते हैं।

झुकना जितना सकारात्मक है, किसी को झुकाने के प्रयास या कोशिश उतनी ही नकारात्मक है। झुकने में जहां विनम्रता है, वहीं झुकाने में दम्भ और अहंकार है। झुक कर व्यक्ति सब कुछ जीत सकता है, वहीं झुका कर व्यक्ति को जीत कर भी हार जाने का एहसास भी हो सकता है। इतिहास गवाह है कि दुनिया जीतने निकले कितने ही सम्राटों ने हारे हुए के सामने समर्पण कर दिया। इसे झुकने वालों की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए।

एक जाने-माने कवि की एक बहुचर्चित कविता है, जिसमें वे भी झुकने की विभिन्न क्रियाओं की बात करते हुए झुकने की सकारात्मकता की बात करते हुए लिखते है- ‘हां मैं झुकता हूं, खाना खाते, जमीन पर गिरा सिक्का उठाते, जूते के तस्मे बांधने के लिए झुकता हूं, मगर उस तरह नहीं झुकता जिस तरह एक चापलूस की आत्मा झुकती है। किसी शक्तिशाली के सामने आंखें झुकती है, लज्जित और अपमानित होकर। ये झुकने की जीत की बात है।’ किसी भी फलविहीन पेड़ या ठूंठ की बनिस्बत फल लदे पेड़ को देखेंगे तो दूसरों को अपने फलों से खुश करने की विनम्रता से उन्हें हमेशा झुके हुए पाएंगे। यानी कि झुकना खुद के साथ दूसरों को खुशी देने का भी एक विनम्र प्रयास है।

ऐसे ही झुकने वाला व्यक्ति दूसरों की खुशी के साथ खुद भी एक सुकून पाता है। अपने आसपास के कोई भी उदारहण देख लीजिए, अकड़ कर जो मामले उलझते हैं, वे ही नम्रता से झुक कर सुलझा लिए जाते हैं।जीवन में झुकने के कई कई अर्थ होते हैं। मामला अगर आत्मसम्मान पर चोट का हो तो झुकने के बजाय सीधे खड़ा होकर संघर्ष का रास्ता ज्यादा बेहतर है। दूसरी ओर, रोजमर्रा की जिंदगी मे कई बार झुकने से लेकर वक्त, जरूरत, जबूरी या फिर उलझनों को सुलझाने के लिए हो या फिर विनम्रता से किसी का दिल जीतने के लिए, खुद की खुशी के लिए हो या दूसरों को खुश रखने के लिए, अलग-अलग संदर्भों में कई-कई बार झुकना होता है। कई बार झुकने वाला व्यक्ति अपने कद में बड़ा हो जाता है।

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