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जिंदगी की छांव

जब कोई वृक्ष काटता है और मैं देखता हूं तो बेहद पीड़ा होती है। आमतौर पर हर संवेदनशील व्यक्ति को वृक्ष कटते देख कर कष्ट और अफसोस होता है।

सांकेतिक फोटो।

सुरेशचंद्र रोहरा

जब कोई वृक्ष काटता है और मैं देखता हूं तो बेहद पीड़ा होती है। आमतौर पर हर संवेदनशील व्यक्ति को वृक्ष कटते देख कर कष्ट और अफसोस होता है। खासतौर पर तब, जब चाहते हुए भी रोक पाने में कामयाबी न मिले। मगर जिस तरह मैंने अपनी आंखों के आगे सैकड़ों वृक्षों को कटते देखा और असहाय होकर रह गया, वह दृश्य जेहन में अंकित हो गया है। जब कोई वृक्ष कटता है तो शायद बाकी कुछ लोग भी मेरी तरह देखते रह जाते हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि हम कटते हुए किसी वृक्ष को बचा पाने की हिम्मत अपने भीतर जुटाएं और फिर बचा भी लें।

हमारे मोहल्ले में कई जंगल जलेबी के वृक्ष लगे हुए थे। मुझे याद है कि बचपन में बड़े कौतुक के साथ हम बच्चे छोटे-छोटे हाथों से ऊंचे वृक्ष पर लगे फलों को तोड़ने की मशक्कत किया करते थे। बच्चों का झुंड जंगल जलेबी के पेड़ों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता था और जो किसी तरह फल पा जाता, वह वीर-बहादुर समझा जाता। हालांकि बच्चों के बीच बांट कर खाने की आम आदत की वजह से वह बहादुरी सबके बीच बंटती। गर्मी के दिनों में हमारी सुबह और शाम अक्सर इन जंगल जलेबी के पेड़ों के पास गुजरती। मीठे फल मिल जाते। असीम आकर्षण था इन पेड़ों का। फिर धीरे-धीरे पेड़ कटते चले गए। किसी ने मकान बनवाया तो एक पेड़ काट दिया। किसी ने घर का छज्जा बाहर की ओर निकाला तो फिर एक पेड़ कट गया। मैं बच्चा था और देखते हुए मन मसोस कर रह जाता। हो सकता है कि तब मेरे दिमाग में उन पेड़ों से मिलने वाली जंगल जलेबी हो, लेकिन उसकी अहमियत आज समझ में आती है।

मोहल्ले में एक व्यक्ति ने होटल खोला। सामने पेड़ था। वह रोज ही पेड़ की जड़ों में नमक डालता। सुना है कि ऐसे में पेड़ सूख जाता है! उसने सोचा होगा कि बिना विशेष श्रम के पेड़ एक दिन अपने आप गिर जाएगा। कोई कुछ नहीं कर सका। कानून, जागरूकता सिर्फ शब्द हैं, जो धरे के धरे रह जाते हैं। दरअसल, जब हम हमारे बीच के लोग संवेदना और दूरदर्शिता खो बैठते हैं तो फिर शायद कुछ अच्छा ह७ोने की गुंजाइश बेहद कम हो जाती है!

हाल ही में एक दिन सुबह मैंने देखा कि मोहल्ले के एकमात्र गंगा इमली और उसके पास जंगल जलेबी के पेड़ को काटने की तैयारी हो रही है। उसे बाधा महसूस कर रहे एक परिवार ने काटने का इंतजाम कर लिया था। एक बड़ी-सी क्रेन चली आ रही थी। कुछ और लोग थे। किसी ने बताया आज इमली और जलेबी के पेड़ को काटा जाना है। यह सुन कर मैं कसमसा कर रह गया। मेरे हृदय में एक हूक-सी उठी। विरोध करने के खयाल और उसके नतीजों का ध्यान आया। मैंने भी यही सोचा कि जिस मोहल्ले में आजीवन रहना है, एक पेड़ की खातिर किससे-किससे बैर लिया जाए।

मन में द्वंद्व चल रहा था कि मैं क्या करूं। आखिर मैंने निश्चय किया कि विरोध तो करना चाहिए… इस एकमात्र बचे जंगल जलेबी के पेड़ को बचाना ही होगा। मैं घर से मोबाइल ले आया और पास खड़ा हो गया। जैसे ही पेड़ पर कुल्हाड़ी चली, क्रेन आगे बढ़ी, मैंने मोबाइल पर वीडियो बनाना शुरू कर दिया। मुझे वीडियो बनाता देख गाड़ी और कुल्हाड़ी रुक गई। एक-दो लोग पास आए। बात हुई, संवाद हुआ। उसके बाद उन्होंने कहा कि हम पेड़ नहीं काटेंगे… हमसे गलती हो गई। मुझे बड़ी राहत महसूस हुई। लोगों ने देखा कि मजदूर नीचे आ गए, क्रेन वापस चली गई। हमारे मोहल्ले का एकमात्र गंगा इमली और जंगल जलेबी का पेड़ बच गया था।

मगर दुख है कि चार लेन का उच्चमार्ग बनाने के क्रम में हमारे शहर की सभी दिशाओं की सड़कों पर लगे अनेक पेड़ बेरहमी काट डाले गए। यह काम कोई निजी नहीं, बल्कि सरकारी आदेश पर सरकारी कारिंदों ने किया। मैं आता-जाता देखता और असहाय होकर रह जाता। मन ही मन सोचता कि सरकार ऐसा क्यों करती है और क्या पेड़ों के बिना क्षति पहुंचाए सड़क नहीं बन सकती या फिर पेड़ों को क्या स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। खासतौर पर तब, जब दुनिया भर में ऐसी तकनीकी आ चुकी है।

एक समय था, जब चारों ओर हरियाली थी। हमारा छोटा-सा शहर तब जिला नहीं बना था, सिर्फ एक गांव था। जब चारों तरफ हरे-भरे पेड़ थे। सड़क के आसपास लगे पेड़ छांव देते थे। कितनी ही चिड़िया रहतीं। मीठी तान सुबह शाम सुनने को मिलती थी। जब गांव था, तब एक अमरैया हुआ करता था। लोग बताते हैं, वहां आमों का विशाल बाग था। मगर समय के साथ अमरैया और बिही बाड़ी में लोगों ने पेड़ों को काट कर अपने आशियाने बना लिए हैं।

मनुष्य जितना संवेदनशील है, उतना ही पाषाण कठोर हृदय और स्वार्थी भी, अपने क्षणिक स्वार्थ से वशीभूत होकर पेड़ों को काटता है और यह भूल जाता है कि हमारी जिंदगी के लिए इनकी छांव कितनी अहम है। ये आॅक्सीजन के अच्छे स्रोत हैं। ये हमारे आसपास से, दुनिया से दूर हटा लिए जाएं तो मनुष्य को लुप्त होने में कितना वक्त लगेगा!

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