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दुनिया मेरे आगे: कागज का जीवन

अब एक तरफ कोविड-19 के भविष्य के बारे में अटकलें लगाई जा रही हैं, दूसरी तरफ जो पत्रिकाएं अपने डिजिटल संस्करण ले आ सकीं या लाने की सोच रही हैं, उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है। बाकी सब दम साध कर सोच रही हैं- ‘रहिमन चुप हो बैठिए, देख दिनन का फेर, जब नीके दिन आइहें बनत न लगिहे देर।’

अखबार का लोगों के जीवन से गहरा नाता है।

बोरोसिल या सफेद धातु की केतली से बोनचाइना के कप में दार्जिलिंग चाय को नफासत से ढाल कर पीने वालों की बात करें या नुक्कड़ की दुकान की बेंच पर बैठ कर धारीदार शीशे की छोटी-छोटी गिलासियों में ‘कटिंग’ या ‘सिंगल’ चाय पीने वालों की, या फिर देश के सुदूर दक्षिण में स्टील के कटोरे-ग्लास में पलट-पलट कर ब्रू कॉफी सुड़कने वालों की, सुबह की सही शुरुआत करने के लिए लगभग सबके एक हाथ में चाय-कॉफी का कप और दूसरे हाथ में पढ़ने के लिए अखबार होता था। वह घर आने वाले अखबार की निजी प्रति या चाय की दुकान पर साझा किए हुए दैनिक का एकाध पन्ना, कुछ भी हो सकता था। जो इस तामझाम की जरूरत नहीं महसूस करते, वे बगल में अखबार दबा कर सीधे शौचालय में घुस लेते थे और तब तक खबरों में डूबे रहते थे, जब तक दरवाजा बाहर से खटखटाया न जाए या बवासीर की किसी दवा का विज्ञापन ध्यान न दिला दे कि इतनी देर तक बैठना इस बीमारी को न्योता देना है।

कड़क पन्नों से छपाई की ताजा स्याही की खुशबू आने की बात भले अतिश्योक्ति हो, अखबार में छपी हुई तमाम खबरें भले रात में खबरिया चैनलों पर दी जा चुकी खबरों का बासी रूप बन चुकी हों, पर सुबह का अखबार लगभग सभी साक्षरों की कमजोरी बन चुका था। ‘ई-पेपर’ यानी डिजिटल संस्करण ने मुद्रित अखबार के घर में सेंध लगा कर घुसने की कोशिश काफी पहले से शुरू कर दी थी, लेकिन पढ़ने वालों के दिलोदिमाग पर कब्जा अभी भी पुराने यार का बना हुआ था। डिजिटल हमले का असर कुछ हुआ तो बस इतना कि समय की कमी के सताए लोग ई-पेपर पर उड़ती हुई नजर मार लेते थे और जिनके पास समय की इफरात हो, वे एक ही दिन में कई अखबारों का स्वाद लेने के लिए ई-संस्करणों को टटोलते रहते थे।

महीने भर के पुराने अखबारों की रद्दी बेच कर मिलने वाली कीमत महीने भर के अखबार के बिल के आसपास होने के कारण ‘बचपन की मुहब्बत’ को त्याग कर नए के चंगुल में पूरी तरह गिरफ्तार होने वाले तोताचश्मों की संख्या खास तेजी से नहीं बढ़ पाई। इसमें संदेह नहीं कि दुनियाभर में छपने वाले अखबारों की पठनीयता और बिक्री कम हो रही है, लेकिन यह इलेक्ट्रॉनिक दृश्य और श्रव्य मीडिया में विज्ञापनों की बढ़ती लोकप्रियता का असर है या अखबारों के डिजिटल संस्करण से बढ़ते प्रेम का, इसका अभी तक कोई निर्णयात्मक उत्तर नहीं मिला है।

डिजिटल संस्करण निकालने की दौड़ में पत्रिकाएं अब तक बहुत पीछे हैं। हिंदी के अतिरिक्त बंगाली, मराठी, गुजराती, तमिल और मलयालम अन्य प्रमुख भारतीय भाषाएं हैं, जिनमें साहित्यिक पत्रिकाएं छपती हैं। एकाध सरकारी संस्थाओं और संपन्न संस्थानों के प्रकाशनों को छोड़ कर हिंदी की मासिक, द्वैमासिक और अनिश्चित अंतराल वाली पत्रिकाओं की आर्थिक स्थिति इतनी दर्दनाक है कि उन गिनी-चुनी छह-सात साहित्यिक पत्रिकाओं में कौन कब दम तोड़ देगी, कहना कठिन है। पाक्षिक, मासिक या द्वैमासिक आवृत्ति वाली इन पत्रिकाओं के अप्रैल और मई के अंक मार्च के अंत में अचानक पूर्णबंदी की घोषणा होने के बाद अप्रकाशित रह गए। सामग्री तैयार थी, लेकिन उसे छापना और पाठकों तक पहुंचाना टेढ़ी खीर थी।

अब एक तरफ कोविड-19 के भविष्य के बारे में अटकलें लगाई जा रही हैं, दूसरी तरफ जो पत्रिकाएं अपने डिजिटल संस्करण ले आ सकीं या लाने की सोच रही हैं, उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है। बाकी सब दम साध कर सोच रही हैं- ‘रहिमन चुप हो बैठिए, देख दिनन का फेर, जब नीके दिन आइहें बनत न लगिहे देर।’

लेकिन क्या अब मुद्रित मीडिया के ‘नीके दिन’ सचमुच कभी लौट कर आ सकेंगे? कागज के बढ़ते दाम, वितरण का बढ़ता खर्च, विज्ञापनों का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ बढ़ता झुकाव, लगातार गतिशील होती जीवन-पद्धति में लंबी रचनाओं के प्रति बढ़ती अरुचि और तुरंता साहित्य का बढ़ता दायरा, जैसे दर्जनों प्रतिरोधों को मुद्रित अखबार और पत्रिकाएं केवल इसलिए फलांगते चले आ रहे थे कि इंसान आदत का गुलाम होता है।

पाठकों और मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं के बीच कोविड जैसे खलनायक के नितांत अप्रत्याशित ढंग से आ टपकने के चलते बहुत संभव है कि पाठक, मजबूरी में ही सही, डिजिटल अखबारों और पत्रिकाओं का भी आदी हो जाए। फिर शायद धीरे-धीरे मुद्रित अखबार और पत्रिका उसे असुविधाजनक और महंगे महसूस होने लगें। ‘लाइव चैट’ और ‘वेबनार’ जैसे हथियारों का सहारा लेकर मोबाइल और लैपटॉप दिनोंदिन पाठक को दर्शक-श्रोता बना देने की कोशिश में पहले ही से जुटे हुए हैं। ऐसे में पूर्णबंदी समाप्त होने के बाद भी हमारी जीवनशैली में कुछ परिवर्तन जरूर स्थायी रूप ले लेंगे। मेरे जैसे कागज के कीड़ों के लिए शायद सबसे भयानक प्रश्न यह है कि क्या यह दौर कागज को खा जाएगा!

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