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दुनिया मेरे आगेः रुचियों का पाठ

पिछले दिनों मैंने ऐसी कई खबरें देखीं, जिनमें बताया गया कि स्कूल की लंबी छुट्टियों का इस्तेमाल बच्चे अपने पढ़ने की आदत बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।

raeding, reading books, reading books in vacations, kids study, kids reading books during vacations, interest, study, national news in hindi, india news in hindi, international news in hindi, world news in hindi, political news in hindi, editorial, jansatta editorial, jansattaप्रतीकात्मक चित्र

पारुल बत्रा दुग्गल

पिछले दिनों मैंने ऐसी कई खबरें देखीं, जिनमें बताया गया कि स्कूल की लंबी छुट्टियों का इस्तेमाल बच्चे अपने पढ़ने की आदत बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। इससे भाषा सुधरने के साथ ही ‘ज्ञान’ भी बढ़ रहा है। सवाल है कि ‘पढ़ना’ किसे कहते हैं? मुख्य रूप से हम सभी स्कूल की पढ़ाई और पाठ्यपुस्तकों को पढ़ना मानते हैं, जिससे बच्चों को परीक्षा पास करनी होती है। यह पढ़ना बच्चों के लिए अनिवार्य है। दूसरी तरह की पढ़ाई पाठ्यपुस्तकों से इतर है, जिसे अपनी रुचि, चुनाव, इच्छा से मजे लेकर पढ़ा जाए। इसमें अपनी पसंद की पुस्तक लेकर और बिना किसी ‘अपेक्षित लाभ’ (परीक्षा या ज्ञान प्राप्ति) के पढ़ना शामिल है। यहां आशय ऐसा साहित्य पढ़ने से है, जिससे बच्चों में पढ़ने की आदत का विकास हो और बाल साहित्य में अभिरुचि स्थापित हो सके।

लेकिन जिस तरह की किताबों का जिक्र किया जा रहा है या वे पढ़ी जा रही हैं, क्या वाकई वे ऐसा करने में सक्षम हैं? जैसा कि बताया जा रहा है कि अधिकतर बच्चे छुट्टियों में कॉमिक्स, इनसाइक्लोपीडिया और डिक्शनरी पढ़ रहे हैं। क्या हम इन्हें बाल साहित्य की श्रेणी में रख सकते हैं? देखा जाए तो पुस्तकालय विज्ञान के अनुसार इनसाइक्लोपीडिया और डिक्शनरी ‘रिफरेंस’ यानी संदर्भ की श्रेणी में आते हैं तो इन्हें किसी सूचना को प्राप्त करने, किसी बात को विस्तार से पता करने या किसी जानकारी की पुष्टि करने की श्रेणी में रखा जा सकता है। अधिकतर अभिभावक इस बात पर जोर डालते हैं कि बच्चा उनकी इच्छानुसार इनसाइक्लोपीडिया या डिक्शनरी ही पढ़े और उनसे मिली सूचना और जानकारी को मौका मिलने पर सही जगह उगल सके।

लेकिन पढ़ना वह है जो अपनी रुचि से आनंद लेने के लिए पढ़ा जाए। उसमें पढ़ते-पढ़ते ही बहुत कुछ मिल जाए और आपको पता भी न चले कि आपने क्या-क्या जान लिया है। इनसाइक्लोपीडिया या डिक्शनरी पढ़ना किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने जैसा ही है और यह जरूरी नहीं कि हर बच्चा इन्हें रुचि लेकर ही पढ़े। पढ़ने में समझने के साथ जुड़ाव भी शामिल है। जब आप कोई कहानी पढ़ते हैं तो उसमें वर्णित घटनाओं और स्थान आदि को अपने वातावरण से जोड़ते और महसूस कर पाते हैं और वह कहानी आपके चरित्र और स्मृतियों का हिस्सा बन जाती है। इसी तरह, कोई कहानी या साहित्य बच्चे की भाषा, सोच और व्यवहार का अंग बन जाती है। लेकिन आजकल टीवी पर दिखाए गए कई कार्यक्रमों ने सामान्य ज्ञान को महिमामंडित किया है। रुचि या मजे के लिए कोई पढ़ना नहीं चाहता, हर चीज की ‘कीमत’ मिलना जरूरी है।

कॉमिक्स मनोरंजन होते हैं, पर वे भाषा और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से कमजोर होते हैं। इन्हें टीवी पर आने वाली कार्टून शृंखलाओं का छपा हुआ संस्करण भी कह सकते हैं। कॉमिक्स में विषयों को लेकर भी अपनी सीमाएं हैं। ये पहले से ही काफी प्रचलित या लोकप्रिय विषयों या चरित्रों, जैसे- सुपरमैन, बैटमैन, शक्तिमान, चाचा चौधरी आदि पर आधारित होती हैं। किसी नए विषय की शुरुआत की संभावनाएं कम ही होती हैं। कॉमिक्स में घटनाओं का विस्तार और बातचीत इस तरह से नहीं होती कि पढ़ते समय विचारों की शृंखला बन सके। मनोरंजन के मकसद से पढ़ना अल्पावधि के लिए तो ठीक है, लेकिन हमेशा ऐसी किताब से ‘पढ़ने की आदत’ का विकास होना संभव नहीं है।

इन्हें पढ़ने से भाषा के कौशलों का विकास या ज्ञान बढ़ना तब तक संभव नहीं, जब तक ये भाषा और चित्र-चित्रण की दृष्टि से उच्च कोटि के न हों। चिंता इस बात की है कि जिस देश में कदम-कदम पर लोक-कथाएं, गीत-मुहावरे और बोलियां बिखरी हों, वहां अधिकतर उच्च-मध्यवर्गीय बच्चे डिज्नी एडवेंचर, हैरी-पॉटर, स्पाइडरमैन, टॉम एंड जैरी, बार्बी और सिंड्रेला जैसी किताबें पढ़ना पसंद करते हैं और अभिभावक उन्हें प्रोत्साहित भी करते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि इस तरह की किताबें पढ़ना बिल्कुल ठीक नहीं है। लेकिन शायद एक बड़े तबके को यह नहीं पता कि हिंदी में भी बच्चों के लिए अच्छा साहित्य उपलब्ध है। बहुत-से कारणों से हिंदी में साहित्य पढ़ना कहीं दोयम दर्जे का मान लिया जाता है।

बाजार में जिस तरह की मांग होती है वैसी ही किताबें छापी जाती हैं और इस मांग को पैदा करने में बाजार का भी बड़ा हाथ है। किसी शहर की किताब की दुकानों में मुख्य रूप से कॉमिक्स, इनसाइक्लोपीडिया या बच्चों की चित्रकारी या लेखनी सुधारने जैसी गतिविधि आधारित किताबें ही मिलेंगी। इनमें रचनात्मकता, विचार और विविधता की गुंजाइश शायद ही होती है। इसके अलावा, किशोरवय के बच्चों के लिए रोमांचक और मनोरंजक साहित्य के बजाय नैतिक उपदेश संबंधी किताबों की भरमार होती है।

फिलहाल हमारे देश में बच्चों के लिए अच्छा साहित्य हर जगह उपलब्ध नहीं हो पाता, न पुस्तकालय होते हैं। कुछ संस्थान गुणवत्ता से लैस अच्छा और उपयोगी बाल साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं। अभिभावकों के साथ ही ‘पाठ्यक्रम के बाहर’ की ये पुस्तकें शिक्षकों और शिक्षण के लिए भी उतनी ही उपयोगी हैं। इस तरह की बाल साहित्य की पुस्तकों के इस्तेमाल से हम कक्षागत पठन-पाठन की प्रक्रिया को भी ज्यादा रुचिकर और समृद्ध बना सकते हैं।

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