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दुनिया मेरे आगेः कुदरत का कर्ज

मौसम का मिजाज बदल रहा है, धरती दिनोंदिन आग उगलने लगी है। बरसात के मौसम की धूप अपने साथ कई तरह की असुविधाएं लेकर आती है।

Author July 10, 2018 4:12 AM

एकता कानूनगो बक्षी

मौसम का मिजाज बदल रहा है, धरती दिनोंदिन आग उगलने लगी है। बरसात के मौसम की धूप अपने साथ कई तरह की असुविधाएं लेकर आती है। ग्लोबल वार्मिंग, अनसोची प्राकृतिक आपदाएं, बिन बुलाए खतरनाक वायरस, लाइलाज बीमारियां…! दरअसल, ये सब हमारे ‘अपराध’ की सजाएं ही हैं। हमारे साथ-साथ अबोध शिशु और जानवर भी इसका शिकार हो रहे हैं। सच तो यह है कि हम सब प्रकृति का ऋण चुकाने में कोताही करते रहे हैं। कोशिश की जाए तो भी इस ऋण को चुकाया नहीं जा सकता, लेकिन पर्यावरण रक्षा के छोटे-छोटे प्रयासों से अपनी साख जरूर बचाई जा सकती है।

अमूमन हर मौके पर अपनी छुट्टियों को आनंद के साथ बिताने के लिए अक्सर हम प्राकृतिक रूप से सुंदर इलाकों का रुख करते हैं। जंगलों, पहाड़ों, झरनों, नदियों और समुद्र के किनारों के साथ सुकून के कुछ पल बिताते हैं। प्रवासी, दुर्लभ और उस क्षेत्र के खास पक्षियों और पशुओं सहित वहां के स्थानीय जन-जीवन की तस्वीरों के एल्बम और स्मृतियों में यही सब वहां से लेकर लौटते हैं। नहीं लौटते तो इस बात का जवाब और इसके पीछे छिपा संदेश कि आखिर क्यों वहां का वातावरण हमारा मन मोह लेता है, क्यों हमारे आसपास यह सब मौजूद नहीं हो पाता, क्यों कुछ खास जगहें ही पर्यटन के लिए महत्त्वपूर्ण और लोकप्रिय बन जाती हैं और क्यों लोग बार-बार वहां जाना पसंद करते हैं।

हमारे आसपास मौजूद प्रकृति, जीव-जंतु, हवा-पानी और मिट्टी से मिल कर जो परिदृश्य बनता है, हमें धरती पर ठीक से रहने की सुविधा प्रदान करता है, उसका शुद्ध, स्वच्छ होना हमारे तन, मन के स्वस्थ विकास के लिए बहुत जरूरी है। दरअसल, पर्यावरण के सारे घटक प्रकृति और इस धरती की ओर से निस्वार्थ बेशकीमती उपहार हैं। अगर हमारा पर्यावरण बीमार नहीं होगा तो हमारे भी स्वस्थ और खुशहाल होने के अवसर बढ़ जाते हैं। लेकिन आज पर्यावरण के घटकों के बीच जो संतुलन होना चाहिए, वह निरंतर गड़बड़ा रहा है। धीरे-धीरे हमारे आम शहर और बस्तियों के पर्यावरण और पर्यटन स्थलों की आबोहवा के बीच का अंतर भी कम होता जा रहा है।

आपने देखा होगा कि इन दिनों मैदानी इलाकों के लगभग बराबर गरमी पहाड़ी स्थलों पर पड़ने लगी है। स्वच्छता अभियान के बावजूद समुद्र और नदियों के कई किनारों पर स्थित मंदिरों का कूड़ा-कचरा, फूल मालाएं, पूजा सामग्री आदि बिखरी दिखाई दे जाती है। दुर्गंध का असहनीय वातावरण वहां निर्मित हो जाता है। हालांकि कुछ चेतना अब हमारे समाज में आई है और शासन-प्रशासन भी ध्यान देने लगा है। अपनी छोटी-छोटी आदतों में बदलाव से हम अपने पर्यावरण का दृश्य ही बदल सकते हैं। अगर किसी बदलाव की जरूरत है तो उसकी शुरुआत हमारी मानसिकता के बदलाव से होगी।

इंसानी फितरत है कि जो चीज हमें बिना मेहनत और खर्च के मिल जाती है, उसका हम बिना सोचे अपव्यय या दुरुपयोग करने लगते हैं। प्रकृति ऐसी ही देन है जो हमें जन्म के साथ अपने आप मिल गई है। पहली सांस लेते ही प्राणवायु बिना मांगे हमारे अंदर प्रवेश कर धरती पर हमारी अगवानी करती है और इसके बाद तो हर छोटी से छोटी जरूरत के लिए हम प्रकृति पर निर्भर होते चले जाते हैं। जीव-जंतु, पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां सब लग जाती हैं हमारा पोषण करने। शायद मां की तरह ही प्रकृति में भी यह स्वाभाविक गुण होता है जो सब कुछ देकर, सह कर भी अपने बच्चों के भले का ही सोचती रहती है।

मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग है जो असंभव को संभव बनाने में सक्षम है। अनूठे आविष्कार करने में हम दक्ष हैं, पर हमसे भी गलतियां होती हैं। जब क्षणिक सुख के लिए हम यह भूल जाते हैं कि असल में हम उन मूल और प्राकृतिक तत्त्वों में बदलाव ला रहे हैं, जिनका कोई विकल्प नहीं है या उनके बिना हमारा जीवन ही नष्ट हो सकता है। कैसी विडंबना है कि आज चेहरे का मास्क, जल और वायु शोधक यंत्र जैसी चीजें रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं बनती चली जा रही हैं, क्योंकि हमने खुद ही अपनी हरकतों से खुद को यहां ला छोड़ा है।

हमसे काफी पहले से ये प्रकृति, जीव-जंतु, आदिवासी इस पृथ्वी पर रहते आए हैं। हमसे पहले यह धरती इन सबकी भी है। हमने इन्हीं की दुनिया पर अपना हक जमाने का प्रयास किया है। उनके ठिकानों को ध्वस्त करके अपनी ऐशगाहें खड़ी की हैं। पहाड़ों, नदियों, पेड़ों की बर्बादी से बस्तियां सजाई हैं। आज जो पक्षी हमारी बालकनी में आता है, हम शहरी लोग उसके लिए पानी का सिकोरा रख गौरवान्वित होते हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन जरा सोचिए कि असल में कभी वहां उसका बसेरा होता होगा। जो गंदा-सा नाला हमारी सोसायटी के किनारे बहता है, कभी कितनों की प्यास बुझाता रहा होगा। जिस जमीन पर हमारा घर बना है, उसी पर कभी बरगद का ऐसा पेड़ था, जिस पर हजारों पक्षी रात भर बसेरा करते थे। हम तो मात्र किराएदार हैं, जिन्होंने बिना असली मालिक की मंजूरी लिए अवैध कब्जा जमा लिया है। इस अपराध का दंड जरूर मिलेगा! बल्कि मिलने भी लगा है!

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