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संकल्प से सामना

अक्सर देखा-सुना है कि नया साल आते ही बहुत लोग तरह-तरह के ‘संकल्प’ लेते हैं। खुद से कोई खास काम करने और कुछ काम नहीं करने का वादा करते हैं। कुछ तो अपने संकल्प और वादे को बाकायदा ‘ट्विटर’ या ‘फेसबुक’ पर लिख कर सबके साथ साझा भी करते हैं।

Author January 5, 2019 3:42 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

अंशुमाली रस्तोगी

अक्सर देखा-सुना है कि नया साल आते ही बहुत लोग तरह-तरह के ‘संकल्प’ लेते हैं। खुद से कोई खास काम करने और कुछ काम नहीं करने का वादा करते हैं। कुछ तो अपने संकल्प और वादे को बाकायदा ‘ट्विटर’ या ‘फेसबुक’ पर लिख कर सबके साथ साझा भी करते हैं। इन तमाम तरह के संकल्पों और वादों में आधे से अधिक शराब या सिगरेट छोड़ने पर केंद्रित होते हैं। अब तो लोग धीरे-धीरे सोशल मीडिया छोड़ने या उससे दूर रहने का संकल्प भी लेने लगे हैं। लेकिन अच्छा है। भले किसी बहाने से ही सही, अगर बुरी आदतें छूट जाती हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। शराब और सिगरेट ने कितने ही परिवारों की जिंदगी तबाह कर डाली, सब हमारे सामने है। दूसरी तरफ, सोशल मीडिया के प्रति हद दर्जे की दीवानगी भी हमें न केवल खुद से, बल्कि अपनों से भी दूर लिए चली जा रही है। दिन का खाली वक्त आपस में बातचीत करने में नहीं, स्मार्टफोन या मोबाइल की टच-स्क्रीन पर अंगुलियां चलाने में ही खाक हो जाता है। खाना-पीना, उठना-जागना, रोना-हंसना, मिलना-जुलना या गुस्सा-प्यार- सब कुछ अब सोशल मीडिया पर ही है।

इस सबसे इतर जो बात मैं जानना चाह रहा हूं, वह यह है कि नए साल पर लिए जाने वाले तमाम संकल्पों में क्या हममें से किसी ने कोई संकल्प बेहतर इंसान बनने का भी लिया होगा! क्या कोई संकल्प ऐसा भी होगा, जिसमें समाज में तेजी से बढ़ रहे हिंसा और घृणा के माहौल को बनने से रोकने का इरादा हो? हम आपस में इंसानों की तरह ही रहें, न कि हिंसक हो चुके जानवरों की तरह। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर हम एक बेहतर इंसान बन कर इंसानियत को देश और समाज में कायम नहीं रख पाते हैं तो हमारे द्वारा लिए गए सारे अभिजात किस्म के संकल्प सिर्फ ढकोसला साबित होंगे। यह मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति नए साल से सिगरेट, शराब और सोशल मीडिया को अपने संकल्प के मुताबिक छोड़ देता है। लेकिन क्या एक बेहतर इंसान बन कर दिखा पाना भी उसके लिए इतना ही आसान है?

विडंबना यह है कि आज समाज के पास सब कुछ है। लेकिन अगर कुछ नहीं है तो बेहतर इंसान। न जाने सामाजिक माहौल को यह क्या होता जा रहा है कि लोग तुरंत बिना कुछ सोचे-समझे, अपने से असहमति रखने वाले को या तो मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं या फिर उसे गालियां देने या ‘देशद्रोही’ साबित करने को लेकर आक्रामक हो जाते हैं। जो समाज असहमतियों और आलोचनाओं को बर्दाश्त नहीं कर पाता, उसका पतन निश्चित है। आखिर लोग शब्द का जवाब शब्द से और भाषा का भाषा से क्यों नहीं देना जानते? क्यों हिंसा को ही हर मसले का एकमात्र समाधान बनाए रखना चाहते हैं? यह सोच बेहद खतरनाक है। हमारे भीतर यह जो ‘केवल हम ही सही हैं, बाकी सब गलत’ का अहंकार बैठ गया है, यह बहुत गड़बड़ पैदा कर रहा है। यही अहंकार गुस्से और हिंसा की शक्ल ले रहा है। न हर बात को सही माना जा सकता है, न गलत। कुछ तो आलोचना और असहमति की गुंजाइश अपने बीच रखनी ही होगी हमें।

यह कितना अजीब है कि हम बेहतर इंसान भी बनना चाहते हैं और अपने अहंकार को भी त्यागना नहीं चाहते। दो नावों पर पैर रख कर क्या नदी को पार किया जा सकता है? बस कोई बड़ा कलाकार यह कह भर दे कि उसे देश में रहने से डर लगता है, फिर देखिए कि हम उसकी किस हद तक लानत-मलामत नहीं करते? विरोध में यहां तक अंधे हो जाते हैं कि ‘देशद्रोही’ और ‘गद्दार’ तक कहने-बोलने से नहीं चूकते। कोई बात सही है या नहीं, वक्त उसे साबित कर देता है। जब देश का लोकतंत्र सबको बोलने की आजादी देता है तो भला मैं या हम कौन होते हैं उसे बोलने से रोकने वाले? हां, अपनी बात कह कर हम अपना विरोध दर्ज करवा सकते हैं लेकिन व्यक्तिगत छीछालेदर गलत है। इन्हीं असहमतियों और विपरीत विचारधारा रखने वालों को सुन कर पता चलता है कि हम बेहतर इंसान अभी बन भी पाए हैं कि नहीं। अपने कानों में इतनी क्षमता पैदा कीजिए कि वे कड़वा भी सुन सकें और मीठा भी। लेकिन क्यों न कई तरह के संकल्पों के बीच हम एक बड़ा संकल्प बेहतर इंसान बनने का भी लें! यह उतना कठिन नहीं होगा, जितना हम सब समझते हैं। एक दफा करके तो देखिए, हो सकता, आपके नक्शे-कदम पर कुछ और लोग भी साथ आ जाएं। ऐसा अगर होता है तो यही नहीं, आने वाले सालों में भी हम एक बेतहर इंसान के रूप में जाने और पहचाने जाएंगे।

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