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दुनिया मेरे आगे: बचपन की गलियां

गरमी की छुट्टियों में नानी के घर जाने का मौका साल-भर इंतजार के बाद आता था। स्कूल बंद होते ही हम मां और पिताजी से नानी के घर जाने की जिद करते थे। जबकि नानी और हम किसी दूसरे शहर नहीं, बल्कि एक ही शहर में रहते थे।

Author June 25, 2018 4:24 AM
वे मशीन नहीं हैं जो हर वक्त एक ही काम करते रहें। घर से स्कूल पढ़ने, फिर स्कूल से घर खाना खाने, उसके बाद कोचिंग सेंटर में पढ़ने।

अंशुमाली रस्तोगी

गरमी की छुट्टियों में नानी के घर जाने का मौका साल-भर इंतजार के बाद आता था। स्कूल बंद होते ही हम मां और पिताजी से नानी के घर जाने की जिद करते थे। जबकि नानी और हम किसी दूसरे शहर नहीं, बल्कि एक ही शहर में रहते थे। बावजूद इसके नानी का घर ही गरमी की छुट्टियों में प्राथमिकता पर रहता, क्योंकि जितनी आजादी हम भाई-बहनों को नानी के घर मिलती थी, उतनी अपने घर नहीं। कितनी ही देर खेला जाए, कड़ी धूप में कभी छत पर पतंग उड़ाएं या गली-मोहल्ले के साथियों के साथ मस्ती करें, जब मौका मिले तो पड़ोस में लगे आम के पेड़ से चोरी-छिपे आम तोड़ कर खाएं, कोई रोकने वाला नहीं। एकाध बार तो आम तोड़ते हुए पकड़े भी गए, मगर नानी ने बचा लिया।

बचपन की गरमी की छुट्टियों का वह वक्त आज भी मेरे मानस-पटल पर हूबहू दर्ज है। तब का बचपन कितना सुकून, कितना बेफिक्र होता था। न पढ़ाई की खास चिंता रहती थी, न होमवर्क की। स्कूल से जो काम मिलता भी था, हंसते-खेलते निपट ही जाता था। उस दौर में गरमी की छुट्टियां भी लंबी होती थीं। तकरीबन दो महीने की आजादी। बच्चों को उलझाए रखने के लिए तब न ग्रीष्म ऋतु शिविर लगते थे, न पढ़ाई की अतिरिक्त कक्षाओं का कोई जोर था और न ही मां-पिता की हर की वक्त की टोका-टाकी कि पढ़ लो..! तब कॅरियर बनाने का इतना जोर भी कहां रहता था बच्चों के कंधों पर। खुला और स्वतंत्र बचपन था हमारा।

आज जब गरमी की छुट्टियों में अपने बच्चों सहित आसपास के तमाम बच्चों को देखता हूं तो बार-बार उनसे उनके बचपन को छीन लिये जाने का दुख सलाता है। छुट्टियां हैं, फिर भी कक्षा के काम के बोझ और शिविर के बेतुके बंधन में उन्हें बांध दिया गया है। क्या स्कूल, क्या शिक्षक, क्या मां-बाप, हर किसी का जोर उन पर अच्छा और ऊंचा कॅरियर बनाने का है। मैंने तो गरमी की छुट्टियों में भी बहुत-से बच्चों को कोचिंग क्लास जाते देखा है। मतलब कैसे भी हो, बच्चे किताबों, स्कूल और पाठ्यक्रम से बंधे रहें। गरमी की छुट्टियों में भी अपनी किताबों में फंसे रहने वाले बच्चे भला कैसे ले पाते होंगे नानी के घर जाने का सुख? मुझे तो इस बात पर भी शक है कि बच्चे अब अपनी नानी के घर जाते भी होंगे! बच्चे अब गरमी की चार-पांच दिन की छुट्टियां काटने या तो किसी खूबसूरत पहाड़ी इलाके में जाते हैं या फिर विदेश, क्योंकि उनके मां-बाप के पास इतना ही वक्त होता है उन्हें देने के लिए।

गांव जब से शहरों में तब्दील होना शुरू हुए, तब से नानी के घर और भी दूर होते चले गए हैं। अपवादों को छोड़ दें तो नानियां भी शहरों में आकर बस गर्इं। गांव छूट गए हैं। गांव के खेल और साथी भी साथ-साथ छूटते चले गए। शहरों में नानी के घरों के बीच फासला इतना बढ़ गया है कि जाने से पहले दस बार सोचना पड़ता है कि इतनी दूर जाएं या न जाएं। इन सब दुश्वारियों के बीच रही-सही कसर मोबाइल पूरी कर रहे हैं। मोबाइल न केवल बड़ों का, बल्कि बच्चों का भी प्रिय शगल बन गया है। दिन का आधे से ज्यादा समय तो मोबाइल पर ही गुजरता है। कुछ माता-पिता के लिए भी थोड़ी आसानी हो गई है कि वे अपने बच्चों को मोबाइल थमा कर उन्हें व्यस्त रखते हैं। ऐसा कर वे समझते हैं कि वाकई वे बच्चों की जिंदगी को आसान कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि वे बच्चों के बचपन को मोबाइल की जकड़न में जबरन जकड़ रहे हैं।

गरमी की छुट्टियों में अब बच्चे नानी के घर कम, मोबाइल गेम के घर में रहना अधिक पसंद करते हैं। उन्हें अहसास ही नहीं हो पाता कि गरमी की छुट्टियों में नानी के घर जाने का सुख क्या होता है। कभी-कभी तो वाकई समझ नहीं आता कि आज के दौर के बच्चों को हम कहां ले जा रहे हैं। एकल परिवार के चलन और दूरियों की दुश्वारियों ने पहले ही आपसी रिश्तों की दीवारों को ध्वस्त कर रखा है, ऊपर से छुट्टियों में भी बच्चों को व्यस्त रखने की आदत न केवल उनसे उनके बचपन के स्वाद को छीन रही है, बल्कि खुद तक सीमित रहने को भी मजबूर कर रही है।

आज पुराने दिनों को याद कर अच्छा लगता है कि मैंने अपनी गरमी की छुट्टियों का एक बड़ा हिस्सा अपने नाना-नानी की ममता की छांव में गुजारा। बचपन को जी सका। मगर अफसोस होता है आजकल के बच्चों के बोझयुक्त बचपन को देख कर, जिन्हें अकसर अपनी नानी के घर और उनकी ममता से वंचित रह जाना पड़ता है!

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