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दुनिया मेरे आगे: खतरे की थैली

यह एक आम हकीकत है कि हमारे यहां जो प्रतिबंधित कर दिया जाता है उसका उल्लंघन करने में हमें आनंद मिलता है। विडंबना यह कि जो खुद हमारे निजी जीवन के लिए नुकसानदेह होता है, उससे बचना भी हमें जरूरी नहीं लगता। केंद्र सरकार ने पचास माइक्रोन से कम मोटाई के पॉलीथिन लिफाफों पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा रखा है।

Author June 11, 2018 4:50 AM
काली और गुलाबी पन्नियां ज्यादा खतरनाक होती हैं। यह खराब पॉलीथीन्स को रिसाइकिल कर बनाई गई होती हैं।

संतोष उत्सुक

यह एक आम हकीकत है कि हमारे यहां जो प्रतिबंधित कर दिया जाता है उसका उल्लंघन करने में हमें आनंद मिलता है। विडंबना यह कि जो खुद हमारे निजी जीवन के लिए नुकसानदेह होता है, उससे बचना भी हमें जरूरी नहीं लगता। केंद्र सरकार ने पचास माइक्रोन से कम मोटाई के पॉलीथिन लिफाफों पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा रखा है। उनतीस राज्य और सात केंद्रशासित प्रदेशों में से कई सरकारों ने राजनीतिक मजबूरियों के चलते किंतु-परंतु करते हुए पॉलीथिन के प्रयोग पर पाबंदी तो लगाई है, लेकिन दरअसल स्थिति कुछ और ही है। सभी राज्यों में कुछ भी एक जैसा लागू नहीं किया जा सकता, राजनीतिक विसंगतियां जरूर रहती हैं। विक्रेताओं, खरीदारों और आम लोगों को पॉलीथिन से निकलने में बहुत तकलीफ हो रही है। हालांकि पर्यावरण और धरती को हो चुके और संभावित नुकसान के मद्देनजर पॉलीथिन के कुप्रभावों को लोगों ने ‘समझनाशुरू किया है।

लेकिन शायद ज्यादा खुश होने की स्थिति नहीं है। कारण साफ है। पॉलीथिन एक लगातार प्रयोग किया जाने वाला उत्पाद है। पूरी लगन से हमने इसे आत्मसात किया हुआ है! इतना कि एक हाथ हवा में लहरा कर हम पॉलीथिन प्रयोग त्यागने का जोरदार नारा लगाते हैं और दूसरे हाथ से पॉलीथिन विरोधी रैली के मुख्य अतिथि को देने के लिए चमचमाते प्लास्टिक में लिपटा गुलदस्ता थामे रखते हैं। दरअसल, हम पॉलीथिन और इसके सह-उत्पादों की आरामदायक गोद में आराम कर रहे हैं। इससे पीछा छूटना आसान नहीं है। अभी भी दूध, ब्रेड, खाने का सामान, कपड़े, खिलौने आदि लगभग हर वस्तु मोटे-पतले आकर्षक रंग-बिरंगे प्लास्टिक में लिपटी है।

जन्मदिन के मौके पर रंग-बिरंगी क्रीम के साथ रंगीन पॉली-पलास्टिक के कटे हुए फूल, रिबन, लंबे पत्तीनुमा टुकड़ों से सजावट होती है। मोमो की एक प्लेट पैक करवाएं तो उसमें तीन तरह की चटनी के लिए तीन और कुल मिलाकर पॉलीथिन की पांच थैलियां प्रयोग हो रही हैं। विवाह में भोज के लिए पत्ते या धातु के बर्तनों की जगह प्लास्टिक से बने प्लेट, कटोरी, चम्मच, गलास ने हथिया ली है। पढ़े-लिखे समझदार नागरिक घर का कचरा, कचरा ले जाने वाले को न देकर खुद भी नगरपालिका के कूड़ेदान मे फेंकने की जहमत न उठा कर पॉलीथिन में भर कर कहीं भी रख देते या फेंक देते हैं। अगली ‘कृपाविस्थापित जानवर कर देते हैं। सुविधाओं की ऊंची नाक तले हमें अच्छी परंपराओं और पुरातन वस्तुओं में रूढ़िवाद की बदबू आती रही। इसीलिए आंखें मींच कर हमने पॉलीथिन और प्लास्टिक के बीहड़ में परिणामों के बारे में बिना सोचे-समझे बेधड़क प्रवेश किया। अब पॉलीथिन ने खूब धूम मचा कर गर्दन पकड़ ली है और सांस घुटना शुरू हुआ है तो तकलीफ हो रही है। मगर अब भी आधार-स्तर पर तो बिलकुल चेत नहीं रहे। कागज, जूट और कपड़े के थैले हाथों में आ चुके हैं, लेकिन कितने!

सरकार ने पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगा दिया, सख्त कानून बना दिए, मगर उस पर अमल के बारे में हम सब जानते हैं। सीधी-सी बात है कि जब देश में पॉलीथिन बनाने की नित नई इकाइयां लगाई जा रही हैं, उत्पादन और प्रयोग बढ़ता जा रहा है, तो पाबंदी कितनी कारगर होगी? सरकार अच्छी तरह समझती है कि जब पॉलीथिन का उत्पादन बंद नहीं हो सकता तो प्रयोग पर प्रतिबंध कितना व्यावहारिक होगा! पूरी तरह रोक के लिए अगर कुछ नहीं सूझ रहा तो फिलहाल प्रयोग हो चुके पॉलीथिन के पुनर्चक्रण के उपाय किए जा सकते हैं। हालांकि नागरिकों को अपना कर्तव्य समझना होगा। व्यक्ति के मन के किसी कोने में बदलाव का बीज होता है। ऐसे लोग अभी हैं जो पुराने सही रास्ते पर चल रहे हैं। कहीं छोटी-सी दुकान पर चाट-कचौड़ी, समोसे-छोले, आलू-टिक्की पानीपूरी, दही, पत्ते के दोने में काफी लोगों द्वारा हाथ से खाया जा रहा है। इनमें पढ़े-लिखे शहरी ग्राहक भी हैं। ऐसे प्रयोग प्रेरक हैं, मगर प्रेरणा तो स्वत: उगानी होगी।

यह सभी जानते हैं कि प्लास्टिक कचरा जो हम रोजाना उत्पादित कर रहे हैं, कभी नष्ट न होने वाला है। वैज्ञानिक ऋतुचक्र में आ रहे असंतुलन का प्रमुख कारण पॉलीथिन को बता चुके हैं। प्लास्टिक की थैलियों का कचरा अभी भी चारों ओर बिखरा पड़ा है। सोचना यह है कि जितना पॉलीथिन अभी हमारी जिंदगी पर चिपका है, उसे कैसे उतारा जाए! क्या हम अपनी जड़ों की तरफ देख कर कोई सकारात्मक कठोर निर्णय लेकर अपना ही दीर्घकालिक हित सुनिश्चित कर सकते हैं? बदलाव को अनुशासन समझ कर अपना लिया जा सकता है। थोड़ा कष्ट कुछ समय तक होगा, मगर सही उपायों से स्थायी परिवर्तन आएगा। सरकार की सूझबूझ भरी पहल को राजनीतिकों, अफसरशाही और प्रशासन के साथ-साथ सामाजिक संस्थाओं, समूहों और हर नागरिक के निस्वार्थ ही नहीं, बल्कि नितांत व्यावहारिक दृष्टिकोण की जरूरत होती है। हम क्यों सोचते रहते हैं कि कानून सरकार ने बनाया तो सरकार ही लागू करवाए। स्वानुशासन से बड़ा शासक कोई नहीं!

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