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दुनिया मेरे आगे: महत्त्वाकांक्षा की मार

दिल्ली से बाहर रहने के कारण अभिभावक-शिक्षक मीटिंग में मेरी शिरकत पहले कम ही रही है। पत्नी ने इस दायित्व को निभाया है। लेकिन हाल ही में दसवीं में पदोन्नत हुए बच्चे के स्कूल में अभिभावकों के एक कार्यक्रम में हम दोनों शामिल हुए।

Author June 14, 2018 5:19 AM
सामाजिक दबाव में हमारी अपेक्षा एक नवीं-दसवीं में पढ़ने वाले बच्चे से कुछ ज्यादा हो गई है।

दिल्ली से बाहर रहने के कारण अभिभावक-शिक्षक मीटिंग में मेरी शिरकत पहले कम ही रही है। पत्नी ने इस दायित्व को निभाया है। लेकिन हाल ही में दसवीं में पदोन्नत हुए बच्चे के स्कूल में अभिभावकों के एक कार्यक्रम में हम दोनों शामिल हुए। दिल्ली में अच्छा माने जाने वाले स्कूल में ज्यादातर अभिभावक शिक्षित और उच्चपदों पर आसीन वर्ग के थे। स्कूल ने अभिभावकों को बताया कि पिछली कक्षा के अंकों के आधार पर स्कूल ने अलग-अलग समूह बनाए हैं। गणित और विज्ञान पर खास जोर है और जिन विद्याथियों ने इन विषयों में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनके लिए कुछ विशेष कक्षाओं का भी प्रावधान है।

लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि भाषा, सामाजिक विज्ञान जैसे मानविकी विषयों पर कोई चर्चा नहीं हुई। आज भी अभिभावकों का एक बड़ा हिस्सा विज्ञान पढ़ने-पढ़ाने को प्राथमिकता देता है और विज्ञान पढ़ना एक मेधावी छात्र होने की सामाजिक स्वीकृति बन जाता है। यहां कुछ अभिभावक बच्चों को देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश दिलाने के लिए तीन-चार साल पहले से ही अपने बच्चों को स्कूल के बाद कोचिंग में भी प्रवेश दिला चुके हैं। कुछ कोचिंग संस्थान छठी कक्षा से इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करवा रहे हैं। ऊंची रकम वाली नौकरी और विदेश जाने का रास्ता, इंजीनियरिंग संस्थानों से होकर जाता है। इसलिए अधिकतर माता-पिता ने अपने नवीं-दसवीं के बच्चों को खेल-कूद में समय बर्बाद न करके स्कूल-कोचिंग-होमवर्क के चक्र में बांध दिया है!
बहरहाल, वहां अभिभावकों को बताया गया कि बच्चों पर ज्यादा दबाव नहीं डालें। नियमित तीन-चार घंटे की मेहनत से बच्चे दसवीं की परीक्षा आराम से पास कर लेंगे। लेकिन जैसे ही औपचारिक सत्र संपन्न हुआ, नवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे की मां एक शिक्षिका से यह विमर्श कर रही थीं कि उनके बच्चे के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के लिए कौन-सी भाषा सहायक होगी। शिक्षिका ने उन्हें ये समझाने की कोशिश की कि अगले साथ-आठ साल में बच्चे की अपनी रुचि कुछ और हो सकती है और सिविल सर्विसेज परीक्षा में भी बदलाव हो सकता है। इसलिए अभी बच्चे को अपनी मर्जी की भाषा और विषय पढ़ने दें, लेकिन वह शिक्षित मां शिक्षिका के तर्क से विचलित नहीं दिखीं!

स्कूल के शिक्षकों ने छात्रों के उग्र व्यवहार, भाषा में गाली-गलौज का आना, बच्चों के मोबाइल और सोशल मीडिया के अतिशय प्रयोग जैसी कुछ चिंताएं साझा कीं। प्रश्नोत्तर सत्र से ऐसा आभास हुआ कि अधिकतर अभिभावक किशोर उम्र के अपने लड़के-लड़कियों को लेकर चिंतित तो हैं ही, लेकिन समस्या समाधान का कोई एक रेडीमेड फार्मूला पाना चाहते थे। कुछ जो खुद टीवी-मोबाइल से घिरे रहते हैं, पूछ रहे थे कि बच्चों को कैसे नियंत्रित करें। मूल समस्या अभिभावकों के पास समय की कमी है। बहुतायत में अभिभावक ऐसे थे, जिनके पास बच्चों को देने के लिए संसाधन तो थे, लेकिन समय नहीं। कुछ अपने बच्चों के प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं थे और बच्चों की दक्षता को अपनी सामाजिक हैसियत से जोड़ कर देखते हैं। क्या सभी बच्चे एक जैसे होते हैं या हो सकते हैं? माता-पिता को भी यह स्वीकार करने में कि ‘बच्चा जैसा भी है, जितना कर सका, उतना ठीक है’, वर्षों लग जाते हैं। कुछ ग्रामीण पृष्ठभूमि और छोटे शहरों से आए अभिभावकों ने ये स्वीकार किया कि उनके माता-पिता ने संसाधन भले कम दिया, लेकिन समय और प्रोत्साहन ज्यादा दिया। आज वे अपने बच्चों को सामान-सुविधा ज्यादा दे रहे हैं, लेकिन समय कम से कम!

सामाजिक दबाव में हमारी अपेक्षा एक नवीं-दसवीं में पढ़ने वाले बच्चे से कुछ ज्यादा हो गई है। क्या एक स्कूल में या एक कक्षा में सभी विद्यार्थी मेधावी हो सकते हैं? कोई विद्यार्थी विज्ञान पढ़ेगा तो कोई सामाजिक विज्ञान। सामाजिक विषय में जिसकी रुचि है, उसे और उसके अभिभावकों को अपने भीतर हीनभावना क्यों भर लेनी चाहिए? एक सामान्य कक्षा में आमतौर पर साठ प्रतिशत विद्यार्थी औसत होते हैं। तो माता-पिता को अनावश्यक तनाव लेने और बच्चे में हीन भावना भरने का क्या मतलब है? समाज में अलग-अलग भाषा-विषयों के लोगों की जरूरत है। जो बच्चे स्कूल की पढ़ाई में आज औसत हैं, ऐसा जरूरी नहीं कि वह आगे कुछ विशेष नहीं कर सकते। क्या अभिभावक अपने बच्चे का एक सामान्य विद्यार्थी होना स्वीकार नहीं कर सकते? जीवन की हर विधा में कोई अव्वल नहीं रह सकता है। समाज के सफल व्यक्ति असफलता की राह से गुजरे होते हैं। यह और बात है कि सफलता के आगे उसकी असफलता के किस्से कोई नहीं सुनाता!

मैंने अपने दोस्तों और परिचितों से बात की, जिनके बच्चे नवीं-दसवीं में हैं। इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, शिक्षक, शिक्षाविद, प्रोफेसर, वकील, नौकरशाह सभी अभिभावक होने के नाते यह स्वीकार करते हैं कि वे खुद अपने घर में बच्चों के साथ समायोजन, एकाग्रता की कमी और रोज बढ़ती मांग जैसी चुनौतियों से जुझ रहे हैं। एक किशोर का अभिभावक होना एक प्रयोग है और इसका कोई शॉर्टकट फार्मूला नहीं है। ऐसे में समय, विश्वास और धैर्य ही आपके साथी हैं और बच्चों के बेहतर भविष्य की शर्त भी।

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