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दुनिया मेरे आगे: मन की परतें

कुछ समय पहले आई एक खबर में बताया गया था कि रेलवे के आरक्षित डिब्बों में यात्रा करने वाले कुछ यात्री अपने साथ कंबल, मग, तकिया आदि साथ लेकर चले गए। इस छिटपुट चोरी से रेलवे को कुल तीन करोड़ रुपए का झटका लगा।

Author June 19, 2018 4:23 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर

रजनीश जैन

कुछ समय पहले आई एक खबर में बताया गया था कि रेलवे के आरक्षित डिब्बों में यात्रा करने वाले कुछ यात्री अपने साथ कंबल, मग, तकिया आदि साथ लेकर चले गए। इस छिटपुट चोरी से रेलवे को कुल तीन करोड़ रुपए का झटका लगा। आम धारणा है कि वातानुकूलित डिब्बों में आरक्षण करा कर यात्रा करने वाले लोग पढ़े-लिखे और संपन्न होते हैं। लेकिन विचित्र यह है कि पकड़े जाने पर किसी भी पक्ष ने अपनी पृष्ठभूमि पर आने वाली आंच की परवाह नहीं की। लालच ने उन उच्च शिक्षित और संपन्न लोगों के विवेक को हर लिया। टीएस लुइस ने कहीं कहा है- ‘जब कोई नहीं देख रहा हो तब भी आप संयत व्यवहार रखते हैं तो इसे ईमानदारी कहा जा सकता है।’ शॉपिंग मॉल, दफ्तर और रिहाइशी इलाकों में स्पष्ट नजर आने वाले बोर्ड के माध्यम से याद दिलाया जाता है कि ‘कृपया अपनी हद में रहिए। आप सीसीटीवी की जद में हैं।’ भले ही कैमरे चालू अवस्था में न हों, लेकिन उनकी चेतावनी आम आदमी पर मनोवैज्ञानिक असर करती है।

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इस प्रश्न का उत्तर लंबे अरसे से तलाशा जा रहा है कि भला आदमी मौका मिलते ही क्यों स्तरहीन हरकत कर गुजरता है! यहां मनोविज्ञान ही इस गुत्थी को समझने और सुलझाने में मदद के लिए आगे आता है। मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने वाले अधिकतर चिंतकों ने मनुष्य के व्यक्तित्व को दो रंगों में बांटा है। सफेद और धूसर काला। सफेद रंग व्यक्ति की सरलता, रचनात्मकता, सादगी और ईमानदारी को दर्शाता है, वहीं काला ठीक विपरीत विशेषणों को बताता है। हालांकि किसी रंग को सकारात्मक और नकारात्मक छवि देने का यह प्रसंग विवादों का सवाल भी बना है और इस विभाजन को सामाजिक संदर्भ में कठघरे में भी खड़ा किया गया है। लेकिन फिलहाल अगर प्रचलित मान्यता के मुताबिक देखें तो मजबूत इच्छाशक्ति वाले लोग अपने सफेद रंग को तो बचा लेते हैं, लेकिन थोड़े-से भी कमजोर विश्वास वाले धूसर प्रभावों के शिकार बन जाते हैं। ‘उसने गलत किया तो मैं भी कर सकता हूं…’ या फिर ‘सब कानून तोड़ते हैं तो मैं क्यों न तोडूं’ का भाव अच्छे और भले आदमी से भी छोटा-मोटा अपराध करा देता है।

यही नहीं, भीड़ में यही बात सामूहिकता का रूप लेकर और अधिक विकराल हो जाती है। किसी बड़े व्यवसायी की टैक्स चोरी, किसी फिल्म स्टार की बदचलनी या किसी नामचीन खिलाड़ी की नशे की लत के समाचार आम आदमी के अवचेतन में ‘ग्लोरिफाइड’ यानी महिमामंडित होकर धधकते लावा की तरह बहते रहते हैं। जब भी इसे रिसाव को मौका मिलता है, यह भले आदमी से स्तरहीन आचरण करा देता है। अवचेतन की यह धारा और अधिक ताकतवर तब हो जाती है जब टीवी स्क्रीन या बड़े परदे की छवियां अतृप्त इच्छाओं और आकांक्षाओं को ‘जस्टिफाई’ करने यानी सही ठहराने लगती हैं। रियलिटी टीवी शो ‘बिग बॉस’ की लोकप्रियता का आधार ही उसके प्रतियोगियों का घटिया और स्तरहीन व्यवहार था। इस शो ने साबित किया कि बहुत सारे दर्शक नकारात्मकता पसंद करते हैं। और कोई वजह नहीं कि पिछले दो-तीन दशकों में बड़े परदे पर खलनायकों के लिए विशेष भूमिकाएं लिखी गर्इं और वे पात्र नायक से ज्यादा टिकाऊ लोकप्रियता को प्राप्त हुए। ‘शाकाल’, ‘मोगेम्बो’, ‘गब्बर’ आदि चरित्र नकारात्मकता की खदान के नायाब नमूने हैं। फिल्मों में नायक की लंबी पारी खेल चुके शीर्ष अभिनेताओं में भी ‘ग्रे शेड्स’ की भूमिकाओं के लिए खासा रुझान रहा है।

राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को एक पटकथा पढ़ने के लिए दी। संयोग से अमिताभ बच्चन दिल्ली जा रहे थे। समय बिताने के लिए उन्होंने वह पटकथा साथ रख ली। कहानी इतनी रोचक थी कि मुंबई से दिल्ली के सफर का पता ही नहीं चला। हवाई अड्डे पर उतरते ही अमिताभ बच्चन ने राकेश ओम प्रकाश मेहरा को फोन लगाया कि वे यह फिल्म कर रहे हैं। इस तरह ‘अक्स’ (2001) परदे पर आई। अमिताभ को इस फिल्म के लिए ‘फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ का पुरस्कार मिला। दरअसल, बुरे आदमी यानी मनोज वाजपेयी की काया अच्छे आदमी के शरीर में प्रवेश कर क्या गुल खिला सकती है, इस फिल्म का कथानक था। सुदूर अफ्रीकी जनजातियों में आज भी अपने घर के प्रवेश द्वार पर डरावने मुखौटे टांगने की परंपरा है। भारत में भी ग्रामीण और कई बार शहरी इलाकों में भी घरों पर ऐसे मुखौटे टंगे दिख जाते हैं। शायद आगंतुक को यह स्मरण कराने के लिए कि वह अपनी बुराई और नकारात्मकता घर के बाहर ही छोड़ आए।

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