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दुनिया मेरे आगे: संवेदनहीन व्यवस्था

अनुशासन होना चाहिए। लेकिन अनुशासन के नाम पर यह नहीं होना चाहिए कि विद्यार्थियों का भविष्य ही खराब हो जाए।

Author June 18, 2018 4:42 AM
दिल्ली में आयोजित होने वाली सभी परीक्षाओं में प्रवेश के निर्धारित समय के बाद विद्यार्थियों को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती और हर एक परीक्षा केंद्र में प्रतिवर्ष सात-आठ विद्यार्थी ऐसे रह जाते हैं जो चार-पांच मिनट की देरी से पहुंचते हैं

अमिता तिवारी

मृत्यु मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी दुखद घटना है। पर आज के युग में हम इतने यांत्रिक और मशीनी हो गए हैं कि ऐसी घटनाओं का आमतौर पर हमारे हृदय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हमारी संवेदना इतनी सूख गई है कि हमें किसी के दुख से न कोई वास्ता होता है न उसका अहसास होता है। किसी मां की दर्दनाक आवाज हमारे हृदय को झकझोरती नहीं है। व्यवस्था और नियमों के नाम पर हम इतने निर्मम हो गए हैं कि किसी युवा की मृत्यु की घटना हमें एक खबर मात्र लगती है। हाल ही में यूपीएससी यानी संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने गए एक युवक की मृत्यु पर हमारा समाज जिस तरह शांत रहा, किसी को पीड़ा नहीं हुई, वह मानवीय लिहाज से देखें तो बेहद निराशाजनक है।

युवक यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। परीक्षा केंद्र पर प्रवेश के महज चार मिनट देर से पहुंचने के कारण उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया। इसी वजह से निराश होकर युवक ने आत्महत्या कर ली। परीक्षा केंद्र पर देरी से पहुंचने का कारण यह था कि वह पहले गलत केंद्र पर चला गया था और वहां प्रवेश से काफी पहले पहुंच गया था। साफ है कि युवक को समय से पहुंचने का बोध था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह लापरवाह था। यों कई बार अत्यधिक तनाव में व्यक्ति गलती कर बैठता है। लेकिन हमें यह देखना चाहिए कि वह गलती किस प्रकार की है। दिल्ली की यातायात व्यवस्था के बारे में हम सब जानते हैं जहां किसी रास्ते में अगर दस मिनट का समय लगता है तो कई बार वही रास्ता घंटों में पूरा होता है। इसलिए चार मिनट की देरी को इतनी बड़ी गलती नहीं माना जाना चाहिए था।

यह सच है कि हमें नियम बनाने चाहिए। उनका पालन भी होना चाहिए। लेकिन वे नियम अगर किसी का जीवन समाप्त करने की वजह बन रहे हों तो उन नियमों में संशोधन आवश्यक है। युवक ने अपने आत्महत्या-नोट में यही लिखा है कि ‘नियम सख्त होना चाहिए, लेकिन इतने भी नहीं, जिससे किसी का कॅरियर खराब हो जाए।’ प्रवेश के समय या परीक्षा शुरू होने के कुछ मिनट बाद भी अगर कोई परीक्षार्थी परीक्षा केंद्र पर पहुंचता है तो इससे उसी विद्यार्थी की हानि होती है, न कि परीक्षा आयोजकों की। अगर उस युवक को प्रवेश दे दिया जाता तो शायद वह परीक्षा पास कर लेता और उससे किसी का नुकसान नहीं होता। इसके अलावा, कम से कम उसका जीवन समाप्त नहीं होता।

दिल्ली में आयोजित होने वाली सभी परीक्षाओं में प्रवेश के निर्धारित समय के बाद विद्यार्थियों को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती और हर एक परीक्षा केंद्र में प्रतिवर्ष सात-आठ विद्यार्थी ऐसे रह जाते हैं जो चार-पांच मिनट की देरी से पहुंचते हैं और उन्हें अनुमति नहीं मिलती। उनका साल खराब हो जाता है। इस वर्ष भी आईपी विश्वविद्यालय की बीटेक की प्रवेश परीक्षा में कुछ विद्यार्थियों को प्रवेश नहीं दिया गया। खबरों के मुताबिक चार विद्यार्थी तो ऐसे थे जो समय पर परीक्षा केंद्र पर पहुंच गए थे। लेकिन उनके पास प्रवेश पत्र की एक ही कॉपी थी। उन्हें कहा गया कि फोटो कॉपी करा कर ले आएं। वे यह काम करा कर जब तक वापस आए तब तक मुख्य दरवाजा बंद हो चुका था और काफी गुहार लगाने के बावजूद उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया गया। ऐसे नियमों से क्या लाभ? क्या उन बच्चों के प्रवेश पत्र की फोटो कॉपी स्कूल में नहीं कराई जा सकती थी?

अनुशासन होना चाहिए। लेकिन अनुशासन के नाम पर यह नहीं होना चाहिए कि विद्यार्थियों का भविष्य ही खराब हो जाए। परीक्षा आयोजकों का दृष्टिकोण लचीला होना चाहिए। यों हम विद्यार्थियों के हित की बात करते हैं, लेकिन ऐसे कठोर नियमों से विद्यार्थियों का हित नहीं होता। विद्यार्थी किस परिस्थिति में पहुंच रहा है, उसका भी ध्यान रखना चाहिए। कई बार परीक्षा केंद्र ऐसी जगह होते हैं कि वहां किसी नए व्यक्ति के लिए पहुंचना मुश्किल होता है।

इतने कठोर नियम हमें बनाने चाहिए सामाजिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए। रिश्वतखोरी समाप्त करने, अपराधियों को दंडित करने और यातायात के नियमों का उल्लंघन करने पर दंड देने के लिए। अगर हम इन क्षेत्रो में नियमों का पालन कठोरता से सुनिश्चित करवा पाते हैं तो स्वस्थ समाज का निर्माण होगा। लेकिन हम इन क्षेत्रों में नियमों का कठोरता से पालन नहीं कराते, बल्कि जो बच्चा परीक्षा देने जा रहा है, उस पर हम नियमों का सारा बोझ डाल देते हैं। जबकि बेहद मामूली चूक में उसकी गलती या जिम्मेदारी नहीं भी हो सकती है। जहां उसने अपनी ओर से कोई अपराध नहीं किया होता है, वहां हम नियमों का कठोरता से पालन करते हैं। यह कैसी विडंबना है और कैसी संवेदनहीन हमारी सामाजिक व्यवस्था है!

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