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दुनिया मेरे आगेः विश्वास का पुल

राजनीतिक दलों के मंचों या टीवी समाचार चैनलों पर दिखने वाले नेता या धर्म-संप्रदाय के नाम पर बने संगठनों के चेहरे क्या सही अर्थों में अपने धार्मिक पहचान वाले समाज का नेतृत्व करते हैं?

Author August 1, 2018 3:13 AM
आजादी के इकहत्तर साल बाद विभिन्न राजनीतिक दल सांप्रदायिक वोट बैंक बनाने के लिए निरंतर जोड़-तोड़ कर रहे हैं।

आलोक मेहता

राजनीतिक दलों के मंचों या टीवी समाचार चैनलों पर दिखने वाले नेता या धर्म-संप्रदाय के नाम पर बने संगठनों के चेहरे क्या सही अर्थों में अपने धार्मिक पहचान वाले समाज का नेतृत्व करते हैं? वर्षों तक सत्ता में रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री या पूर्व मुख्यमंत्री नाम से भले ही मुसलिम या हिंदू हों, लेकिन अपने ही समाज की बस्तियों, शहरों और प्रदेशों से कितना जुड़े हुए हैं? इस दृष्टि से देखें तो इन दिनों राजनीतिक गलियारों और मीडिया में हिंदू-मुसलिम के हितों को लेकर निरंतर चलने वाली बहस से सवाल उठता है कि भारत में राष्ट्रवादी मुसलिम नेतृत्व की परंपरा कहां और क्यों गड़बड़ा गई है। इस बात पर दुख और आश्चर्य होता है, जबकि दोनों पक्षों के दावेदार अलगाव के मुद्दों और भारतीयता की पहचान को लेकर अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं। कई ‘ठेकेदारों’ को परंपरा का शायद समुचित ज्ञान नहीं होता या फिर वे सांप्रदायिक राजनीतिक स्वार्थों की रोटियां सेकना चाहते हैं। सशक्त लोकतांत्रिक देश में इस बात की ओर अधिक ध्यान दिलाया जाना चाहिए कि सही अर्थों में राष्ट्रवादी मुसलिम नेतृत्व ने स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद भी करीब दो दशकों तक देश और समाज की एकता-संप्रभुता के लिए हिंदू नेताओं के साथ मिल कर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

आजादी से बहुत पहले 27 जनवरी 1883 को सर सैयद अहमद खान ने हिंदू-मुसलिम रिश्तों के संदर्भ में कहा था- ‘हम दोनों भारत की हवा में सांस लेते हैं और गंगा-जमुना का पवित्र जल पीते हैं। हम भारत की जमीन की उपज से अपनी भूख मिटाते हैं। हम एक साथ जीते और मरते हैं। इसलिए अगर हम जीवन के उस हिस्से को थोड़ा अलग रखें, जो ईश्वर की प्रार्थना यानी धर्म का है, तो निस्संदेह इस तथ्य को मानना पड़ेगा कि हमारा देश एक है, कौम एक है और देश की तरक्की, भलाई तथा एकता परस्पर सहानुभूति एवं प्रेम पर निर्भर है। अनबन, झगड़े और फूट हमें समाप्त कर देंगे।’ उन्होंने पंजाब में हिंदुओं की एक आम सभा में कहा- ‘आप जिस हिंदू शब्द का प्रयोग अपने लिए करते हैं, वह उचित नहीं है, क्योंकि मेरी दृष्टि में वह धर्म का नाम नहीं है। हिंदुस्तान का हर निवासी अपने को हिंदू कह सकता है। मुझे इस बात का दुख है कि आप मुझे हिंदू नहीं समझते, जबकि मैं भी हिंदुस्तान का वासी हूं।’

इसी तरह, 1890 में कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष बदरुद्धीन तैयबजी ने अल्पसंख्यक होने के कारण घाटे में रहने की धारणा को गलत बताते हुए एक कार्यक्रम में कहा था- ‘जरा पटना का ही उदाहरण लीजिए। पटना नगरपालिका के बीस वार्ड में हिंदुओं की संख्या अधिक है। लेकिन वे मुसलमानों को अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। वहां बीस म्युनिसिपल कमिश्नरों में तेरह मुसलमान हैं। बंबई नगरपालिका क्षेत्र में हिंदू सबसे अधिक हैं, लेकिन वहां पांच पारसी, तीन ईसाई, दो हिंदू और दो मुसलिम कमिश्नर हैं।’ हाल के वर्षों में जन्माष्टमी और गणेशोत्सव को हिंदू पर्व के रूप में अधिक प्रदर्शित किया जाता है। लेकिन 1896 में शोलापुर से गणेशोत्सव प्रारंभ करने वाले लोकमान्य गंगाधर तिलक ने इस उत्सव को हिंदू मुसलिम तथा अन्य धर्मावलंबियों को जोड़ने और एकता के लिए शुरू किया था। बंबई से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार ‘राफ्त गोफ्तार’ में लिखा था- ‘गणपति उत्सव की उल्लेखनीय बात यह रही कि स्थानीय मुसलमान भी इस जुलूस में शामिल हुए और हिंदुओं के साथ मिल कर गणपति की आराधना कर रहे थे। नासिक में तो गणेश विसर्जन के जुलूस का नेतृत्व एक मुसलमान सज्जन कर रहे थे।’ भारत का विभाजन तो बहुत बाद में हुआ, लेकिन लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन की योजना शुरू करने पर 1903 में ख्वाजा अतीकुल्ला ने कांग्रेस अधिवेशन में विभाजन विरोधी प्रस्ताव पेश किया। ‘स्वदेशी रैली’ का सभापतित्व मोहम्मद यूसुफ ने किया। चौधरी युगाम अली मौला ने ‘राखी अपील’ पर हस्ताक्षर किए।

इस तरह के प्रभावशाली प्रसंगों से इतिहास भरा पड़ा है। फिर भी आजादी के इकहत्तर साल बाद विभिन्न राजनीतिक दल सांप्रदायिक वोट बैंक बनाने के लिए निरंतर जोड़-तोड़ कर रहे हैं। मुसलिम लीग या हिंदू महासभा को कहीं व्यापक समर्थन नहीं मिल सकता है। लेकिन नए दल और संगठन बना कर समाज को अधिकाधिक बांटने के प्रयास जारी हैं। कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में वोट समीकरण से चुने जाने वाले ऐसे नेता क्या संपूर्ण भारतीय मुसलमानों या हिंदुओं के नेतृत्वकर्ता माने जा सकते हैं? मसलन, अब तक कई दलों से जुड़े मुसलिम पृष्ठभूमि के ऐसे कई नेता रहे, जो अपने चुनाव क्षेत्रों में जीते और केंद्र में या किसी राज्य में मंत्री भी बने, लेकिन अल्पसंख्यकों के कल्याण कार्यक्रमों को लेकर अपेक्षा के मुताबिक सक्रिय नहीं रहे। यही नहीं, मुसलिम पहचान के बावजूद कई नेता आम मुसलमानों का समर्थन नहीं जुटा सके या उनका विश्वास जीतने में उन्हें ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। जबकि इनके मुकाबले हिंदू पहचान वाले ऐसे अनेक नेता रहे, जिन्हें मुसलमानों ने अपना विश्वास और समर्थन दिया। दूसरी ओर, कई ऐसे मुसलमान नेता रहे, जिन्हें हिंदुओं ने अपना व्यापक समर्थन और विश्वास दिया। इसलिए असली समस्या विश्वास अर्जित करने की है। नेता और जनता के बीच विश्वास एक ऐसा पुल है, जो धार्मिक पहचान की सीमाओं को गैरजरूरी बना देता है। वहां देश और जनता का हित प्राथमिक होता है।

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