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दुनिया मेरे आगे: तर्कशीलता की दुनिया

समाजीकरण की प्रकिया से अलग रहने और तर्क की कसौटी पर कसने वाले कौशलों का अभाव होने के कारण इन बच्चों को परीक्षाओं की पढ़ाई वाले विशेष कोचिंग में विज्ञान, गणित, भाषा और सामाजिक विज्ञान के आंकड़े और घर लौटते ही मिथकों और महाकाव्यों की बातें बिना प्रमाण के घोंट-घोंट कर पिलाई जाती हैं।

Author June 26, 2018 4:28 AM
बच्चों में तार्किकता, जिज्ञासा, कल्पनाशीलता जैसे महत्त्वपूर्ण कौशल रहते हैं।

अनानास कुमार ‘अन्नाभाई’

हमारा देश विविधताओं से भरा है, जहां व्यक्ति के सामाजिक से लेकर अकादमिक जीवन तक में पर्याप्त विविधता देखी जा सकती है। हाल में परीक्षाओं के नतीजे और उनमें पनचानबे या अठानबे या फिर सौ फीसद अंक पाने को लेकर जश्न जैसा माहौल रहा। जिन बच्चों ने इतने ऊंचे अंक हासिल कर प्रतिशत की परिभाषा बदलने की कोशिश की है, वे निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। अब सवाल यह उपजता है कि इतने अंक हासिल करने वाले बच्चों के जीवन में इस सफलता का वास्तविक मूल्य क्या है। वे संविधान में संकल्पित समाज के निर्माण में कितनी भूमिका निभा पाएंगे? मैंने जब ऐसे कई बच्चों के साक्षात्कार सुने तो उससे उन्हीं विचारों को मजबूती मिलती लगी कि किसी तरह से कोई परीक्षा पास करके कोई बड़ी डिग्री हासिल कर ली जाए और भौतिक सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन का आनंद उठाया जाए!

हालांकि इसमें समाज, पाठ्यचर्या और किताबों आदि का दोष अधिक है। जब बच्चे किसी खास प्रकार की परीक्षा में पास होने के लिए तैयार किए जाते हैं, तब वे केवल स्मार्टफोन के उस मेमोरी कार्ड की तरह इस्तेमाल हो रहे होते हैं, जिसमें मनचाहे आंकड़ों को सुरक्षित किया जाता है। इस प्रकिया में उनमें ज्ञान, सीखने और समझने के प्रति कितना लगाव है, उनके भीतर आलोचनात्मक चिंतन कितना विकसित हुआ, वे संस्कृति, समाज, प्रकृति और मानवीय मूल्यों के प्रति कितने संवेदनशील होते हैं, ये सारे पक्ष अछूते रह जाते हैं।

समाजीकरण की प्रकिया से अलग रहने और तर्क की कसौटी पर कसने वाले कौशलों का अभाव होने के कारण इन बच्चों को परीक्षाओं की पढ़ाई वाले विशेष कोचिंग में विज्ञान, गणित, भाषा और सामाजिक विज्ञान के आंकड़े और घर लौटते ही मिथकों और महाकाव्यों की बातें बिना प्रमाण के घोंट-घोंट कर पिलाई जाती हैं। कोचिंग और घर-परिवार के ऐसे माहौल के कारण ये बच्चे न केवल मिथकों के प्रति श्रद्धाभाव रखने लगते हैं, बल्कि स्कूल-कॉलेज या परीक्षा के लिए जाते समय प्रसाद चढ़ा कर या मन्नत मांग कर भी जाते हैं। जबकि सबको यह पता होता है कि परीक्षा परिणाम उत्तर पुस्तिका में लिखे गए उत्तरों के सापेक्ष ही आने वाला है।

बच्चों में तार्किकता, जिज्ञासा, कल्पनाशीलता जैसे महत्त्वपूर्ण कौशल रहते हैं। यकीन न हो तो कुछ बच्चों के साथ मित्रवत समय गुजारिए या फिर उन अभिभावकों के साथ संवाद करके देखिए जो अपने बच्चों के सवालों से परेशान रहते हैं। अगर आपके घर में छोटे बच्चे हैं तो उन्हें कोई खिलौना लाकर दीजिए और फिर उन्हें उसे तोड़ने दीजिए। ये सारे उदाहरण इसी बात के प्रमाण हैं कि बच्चों में तार्किकता, जिज्ञासा, कल्पनाशीलता जैसे महत्त्वपूर्ण कौशल होते हैं। लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक कर्मकांड, अंधविश्वास और स्कूल आदि इन जिज्ञासाओं को मार डालते हैं, जिसके कारण ये बच्चे अपने अधिकारी के लिए लक्ष्य प्राप्त करने वाले अच्छे बाबू, दक्ष मैकेनिक, कुशल मैनेजर और बेहतर सहयोगी तो बन जाते हैं, लेकिन अपने-अपने कार्यक्षेत्र में खुद कुछ मौलिक और नवाचार वाले आविष्कार कम ही कर पाते हैं। इनकी शिक्षा आखिर इनमें सोचने-समझने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने की आदत क्यों नहीं विकसित कर पाती है? कहीं यह एक किस्म के सामूहिक भ्रम का रोग तो नहीं है, जिसमें हमारे बच्चे एक ही तथ्य के बारे में कई विरोधाभासी जानकारियां और विश्वास के सहारे अपने सुनहरे और सुरक्षित भविष्य का सपना सजा रहे हैं?

सोच कर देखा जाए कि अगर हमारे घरों में मूर्तियों को दूध पिलाया जाता है और उसे ईश्वर के चमत्कार के रूप में स्थापित कर दिया जाता है, तो यह तय है कि हमारे घर का कोई बच्चा शायद ही स्कूल, किताब या फिर कोचिंग में पढ़े गए द्रवों की गति, पृष्ठ तनाव, आसंजन और संबद्धता के वर्तमान में कोई कमी निकाल कर उसे चुनौती दे पाए। यहां मैं एक और उदाहरण रखने की कोशिश करता हूं। अगर कोई बच्चा मंत्र की शक्ति से अवतरित किसी अवतार की पूजा करता आया है तो क्या वह जेनेटिक्स या जीव विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों की कमियां खोज कर कुछ नया और मौलिक प्रस्ताव सामने रख सकता है? मुझे लगता है कि जो मन आलोचनात्मक चिंतन कर सकता है, अंधविश्वासों पर सवाल उठा सकता है, सामाजिक कुरीतियों के बारे में तर्क-वितर्क कर सकता है, वह कपोल-कल्पना वाली परीलोक की कहानी को जीवन भर नहीं ढो सकता।

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