ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: अपने पराए

कहने को हम समाज, समुदाय और देश को एक सूत्र में पिरोने के उपदेशों के बीच पले-बढ़े होते हैं। लेकिन आमतौर पर सामान्य ज्ञान के बहुत सारे सवालों से रूबरू होने और उन्हें जुबान पर याद कर लेने के बावजूद अपने आसपास की कुछ चीजों और यहां तक कि अपनी ही तरह के कुछ समुदायों और उनके जीवन से अनजान रहते हैं।

Author June 13, 2018 5:21 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

अमित चमड़िया

कहने को हम समाज, समुदाय और देश को एक सूत्र में पिरोने के उपदेशों के बीच पले-बढ़े होते हैं। लेकिन आमतौर पर सामान्य ज्ञान के बहुत सारे सवालों से रूबरू होने और उन्हें जुबान पर याद कर लेने के बावजूद अपने आसपास की कुछ चीजों और यहां तक कि अपनी ही तरह के कुछ समुदायों और उनके जीवन से अनजान रहते हैं। बाद में कभी किसी संयोग से उनके बारे में कुछ जानकारी मिलती भी है तो आधी-अधूरी, और फिर उन्हीं आधार पर हमारे भीतर कुछ खास तरह की धारणाएं बन जाती हैं। बचपन में मैं जब कभी आदिवासी शब्द सुनता तो दिमाग में एक ऐसे इंसान की आकृति उभरती थी, जिसके शरीर का रंग काला, होंठ मोटे, नाक चिपटी, बाल अजीब तरह बिखरे और घुंघराले हों और तन पर कम कपड़े रहते हों। दरअसल, किताबों में आदिवासी के बारे में इसी तरह का चित्रण पढ़ कर मैं बड़ा हुआ। अगर उस वक्त मुझे इस पहचान से इतर वास्तव में किसी आदिवासी से मिलाया जाता या फिर मैं मिला होता तो शायद मुझे यकीन नहीं होता।

तब स्कूल की किताबें ही जानकारी का मुख्य स्रोत थीं। इसके अलावा, अपने आसपास सिनेमा की तरह जितने भी अन्य उपलब्ध जानकारी के स्रोत थे, उनमें भी आदिवासियों के बारे में लगभग इसी तरह की बात मिलती थी। मेरे जैसे कई और बच्चे आदिवासियों के बारे में यही पहचान लिए बड़े हुए होंगे। ऐसी तस्वीर कुछ आदिवासी समूहों के बारे में आसपास हो सकती है, लेकिन भारत में चार सौ से ज्यादा आदिवासी समूह रहते हैं। उच्च शिक्षा के लिए कस्बानुमा शहर से निकलने के बाद एक नई तस्वीर के साथ आदिवासी के बारे में मेरी एक नई समझ विकसित हुई। इस तरह की समझ को बनने मे कई वर्ष लगे और इसमें सबसे ज्यादा योगदान आदिवासी लोगों से मेरा सीधा संवाद कायम होना था, जो मेरी मित्र मंडली में थे।

अक्सर हम अधूरी या यों कहे गलत जानकारी के चलते किसी के बारे में गलत तस्वीर अपने अंदर बैठा लेते हैं। फिर उसी के मुताबिक प्रतिक्रिया करते हैं और उसे उसी रूप में आगे भी फैलाते हैं। इस तरह से समाज में किसी के बारे में भ्रमित या गलत तस्वीर बन जाती है। उत्तर-पूर्व के आदिवासी समूह को देखने के बाद तो यह तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आई। जब सोचना शुरू किया तो पहले की धारणाओं और उनके संदर्भों पर बहुत अफसोस हुआ। हाल ही में पत्रकारिता के एक छात्र को आदिवासी शब्द से लगभग अनजान पाया। लेकिन वह इसके अंग्रेजी शब्द ‘ट्राइब्स’ का मतलब समझता है। दिल्ली में ही पला-बढ़ा वह छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक करने के बाद एक निजी संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा है। एक दिन कक्षा में मैंने आदिवासी समुदाय के बारे में चर्चा की तो उसे यह शब्द बिल्कुल नया लगा और उसने इसके बारे में मुझसे पूछा।

वह छात्र एक उदाहरण भर है। कहने को तो हम अपनी छोटी-सी जेब में समूची दुनिया की जानकारी लिए घूम रहे हैं, लेकिन अभी भी हम भारत की एक बड़ी आबादी के बारे में ठीक से नहीं जान पाए हैं। सूचना के ज्यादातर स्रोतों से भी इनके बारे में कोई सही और मुक्कमल जानकारी नहीं मिल पाती है। यों भी महानगरीय आबोहवा में आदिवासी की मौजूदगी बहुत कम जगह या नहीं के बराबर दिखती है।हम सोशल मीडिया के जरिए खुद के हर वक्त लोगों से जुड़े होने का दावा करते हैं। लेकिन यह जुड़ाव भी बहुत ही ज्यादा सुविधा का, चुना हुआ और खांचों में बंटा हुआ है। दिल्ली जैसे महानगर में रहने वाले उत्तर-पूर्व के ज्यादातर आदिवासी समूह यहां के लोगों से अपने आप को जोड़ नहीं पाए हैं, जिसके चलते उनके बारे में बहुत कम जानकारी लोगों के पास है। जानकारी के अभाव में हम कई तरह के पूर्वग्रह उनके बारे में पाल लेते हैं। कई मौकों पर लोगों का व्यवहार इनके प्रति ऐसा नकारात्मक रहा है कि इन आदिवासी समूहों में समाज के अन्य लोगों से हमेशा एक डर का भाव बना रहता है। इसलिए वे भी अपने-अपने समूहों में ही रहना पसंद करते हैं। यह जिम्मेवारी गैर-आदिवासी समुदायों की ही बनती है कि जो समूह सदियों से हाशिये पर हैं, उनके अंदर से कैसे इस डर और अलगाव की भावना को निकाला जाए।

बहरहाल, कक्षा में मैंने आदिवासी समूहों के बारे में राज्यसभा टीवी के कार्यक्रम ‘मैं भी भारत’ के माध्यम से बताया। निश्चित तौर पर ‘मैं भी भारत’ जैसे कार्यक्रम अन्य टीवी चैनलों पर भी दिखाए जाने की जरूरत है। साथ ही सूचना के अन्य स्रोतों से भी ऐसे समूहों के बारे में सही जानकारी मिले, ताकि लोग अपने ही बीच के इन लोगों को अपना हिस्सा मानें। यह लोकतंत्र की मजबूती लिए बेहद जरूरी है कि समाज के हर समूह की मौजूदगी समाज के हर संस्थान में साफ दिखे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App