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दुनिया मेरे आगेः विषमता की तकनीक

भारत जैसे विकासशील देश में सबसे बड़ी नियोक्ता खुद सरकार है। दूसरी तरफ उसके पास रोजगार उस अनुपात में नहीं हैं, जितने अभ्यर्थी रोजगार के लिए पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं।

Author July 13, 2018 4:45 AM
जहां किसी प्रतिभागी को कम रोजगार की स्थिति पर सवाल उठाना चाहिए था, वह परीक्षा में नाकाम रहने पर एक प्रकार की ‘छंटनी’ प्रक्रिया के जरिए बाहर हो जाता है, वह खुद को दोष देने लगता है

शचींद्र आर्य

भारत जैसे विकासशील देश में सबसे बड़ी नियोक्ता खुद सरकार है। दूसरी तरफ उसके पास रोजगार उस अनुपात में नहीं हैं, जितने अभ्यर्थी रोजगार के लिए पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं। ऐसी स्थिति में क्या किया जाता है? इसका एक सरल जवाब पदों पर चयन के लिए परीक्षा है। संबंधित विभाग पदों पर नियुक्ति के लिए परीक्षा आयोजित करते हैं और जहां किसी प्रतिभागी को कम रोजगार की स्थिति पर सवाल उठाना चाहिए था, वह परीक्षा में नाकाम रहने पर एक प्रकार की ‘छंटनी’ प्रक्रिया के जरिए बाहर हो जाता है, वह खुद को दोष देने लगता है कि उसमें ही कुछ कमी ही रह गई होगी… अगली बार खूब मेहनत करेगा… हो सका तो कोचिंग कर लेगा! गौर करने वाली बात यह है कि आखिर वे कौन लोग हैं जो सरकार प्रदत्त रोजगार चाहते हैं? इसे उलटी तरफ से भी पढ़ा जा सकता है। क्या आपने निजी क्षेत्र में ऐसी किसी सार्वजनिक परीक्षा की बात सुनी है? अगर कहीं परीक्षा होती भी है तो अपने स्वरूप में वह अपवाद ही है।

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पहले सरकारी बैंक में नौकरियों के लिए आईबीपीएस द्वारा ऑनलाइन परीक्षा का आयोजन होता था। इस बार दिल्ली अधीनस्थ चयन बोर्ड अध्यापकों की नियुक्ति के लिए ऑनलाइन जांच परीक्षा ले रहा है। ऑनलाइन परीक्षा का दायरा एनटीए यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के आ जाने के बाद फैलने जा रहा है। नेट, जेईई, नीट, सी मेट, जी पेट आदि परीक्षाएं भी अगले साल तक इसमें जुड़ जाएंगी। पहली नजर में यह एक स्वाभाविक स्थिति लगती है। समय और आधुनिकी तकनीकी के विकास के साथ परीक्षा प्रणाली में परिवर्तन हो रहा है। कुछ लोग इसमें कागज, समय, पेड़ सबकी बचत भी देख रहे होंगे। परीक्षा फल जल्दी आएगा, पर्चा लीक नहीं होगा, नियुक्ति समय से हो जाएगी आदि। इस तरह परीक्षा लेने के कितने फायदे हैं!

लेकिन इसे थोड़ा तल में चल कर देखते हैं और एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। हममें से ज्यादातर को याद होगा जब पिछले साल दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ा तो उसके बाद क्या हुआ! आधिकारिक आंकड़े बताने लगे कि रोजाना कितने लाख यात्री कम हो गए। सोचिए कि जो लोग मेट्रो के दायरे से बाहर हुए, वे इस मेट्रो से सफर क्यों नहीं कर रहे होंगे! बढ़े हुए किराये में ऐसा क्या है कि जो लोग आने-जाने के लिए इसका उपयोग करते थे, वे अब नहीं कर रहे? समझने में थोड़ी दिक्कत हो सकती है।
इस स्थिति को हम परीक्षा प्रणाली में हुए परिवर्तनों के संदर्भ में देख सकते हैं। जो परीक्षा अब तक अभ्यर्थी के लिए अपने हाथ में प्रश्न-पत्र लेकर संपन्न हो रही थी, वही अचानक ऑनलाइन होने लगी। क्या हमें नहीं लगता कि कंप्यूटर चलाना और उससे पूरी तरह परिचित होना उसी तरह सामाजिक और आर्थिक पूंजी का मसला है, जैसे कि जो यात्री बढ़े हुए किराए का खर्च वहन नहीं कर पाया, वह उस परिवहन व्यवस्था से ही बेदखल हो गया? इसकी व्याख्या में एक दूसरा स्तर यह भी है कि तकनीक का उपयोग कौन तय कर पाएगा! यह इतना सरल प्रश्न नहीं है। यह तकनीक अपने प्रयोक्ताओं का चयन करती है। इस अर्थ में वह एक विषम समाज का निर्माण करती है, समाज का विभेदीकरण करती है। इससे नई विषमताएं पैदा होना कोई नई बात नहीं है।

एक और उदाहरण से बात की जा सकती है। एक रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रति वर्ष कितने परिवार स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने के बाद गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। यह सारा मामला पहुंच का है। कौन सफर कर पाएगा, कौन स्वस्थ रह पाएगा, यह हमारे समय में कोई सवाल भी नहीं है। हम एक नए तरह के विषम समाज में प्रवेश कर चुके हैं, जहां राज्य जैसी संस्था विफल हो चुकी है, लेकिन अभी भी वह हमारे बदले निर्णय करने का अभिनय करते रहना चाहती है।

मसलन, अभ्यर्थियों के पास ऑफलाइन या ऑनलाइन परीक्षा देने का विकल्प नहीं रखा गया है। उन्हें मजबूरन ऑनलाइन परीक्षा देनी होगी। अब हम खुद से सवाल पूछ सकते हैं कि कितने लोग हमारे यहां इस तरह की तकनीक में साक्षर हैं? क्या अब तक सबके लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसे अवसर मुहैया कराए गए हैं, जिसके बाद हम यह निर्णय ले रहे हैं? बल्कि सच यह है कि वे तो इस काबिल भी नहीं छोड़े गए कि इस अपरिचित परिवर्तन के बाद अपना मुखर विरोध भी दर्ज करा सकें। उन्हें यही डर खाए जाता है कि अगर यह भर्ती भी रद्द हो गई तो पता नहीं फिर नई भर्ती कितने साल बाद होगी।

जो लोग इसे ‘डिजिटल भारत’ के सब्जबाग से जोड़ रहे हैं, उन्हें या तो पता नहीं है या वे सच से अनजान बने रहना चाहते हैं। ऐसे लोग भी इन नौकरियों के फॉर्म साइबर कैफे में बैठे व्यक्ति को परीक्षा शुल्क के अलावा पांच सौ रुपए देकर भरवाते हैं, लेकिन ऑनलाइन परीक्षा के एकमात्र विकल्प की तरफदारी करते हैं।

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