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दुनिया मेरे आगे: सेहत के सामने

तेजी से युवा होते देश को क्या अपने हर नवजात के जन्म से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए?

Author June 7, 2018 4:56 AM
किसी को स्वस्थ बनाने के लिए खुद का स्वस्थ होना जरूरी होता है। लेकिन सरकारी व्यवस्था के तहत चलने वाला यह अस्पताल खुद बीमार था

राय बहादुर सिंह

मेरे लिए कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि देश के मध्यवर्ग को सरकारी व्यवस्था से जुड़े शब्दों, जैसे सरकारी स्कूल, सरकारी पानी, सरकारी अस्पताल आदि से किस तरह का डर लगता है! क्या इस डर को बनाए रखने के पीछे कोई सरकारी या किसी तरह का निजी हित काम करता है या कोई और वजह इसके लिए जिम्मेदार है? कुछ समय पहले मैं दिल्ली में एक छोटे सरकारी अस्पताल में जन्मे अपने भतीजे को लेकर आपातकालीन कक्ष में गया। वहां चार-पांच टेबल पर प्रशिक्षु डॉक्टर बैठे हुए थे। दीवारों के प्लास्टर जगह-जगह से उतर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि कई बीमार एक दूसरे बीमार के पास अपने इलाज के लिए आए हों। मरीज स्ट्रेचर पर लेटे हुए खुद तक डॉक्टरी सुविधाओं के पहुंचने का इंतजार कर रहे थे। एक तरफ स्ट्रेचर पर अपने पति को लिटाए एक अधेड़ उम्र की नाइजीरियन महिला भी खड़ी थी। यह सब देखने से ही पता लग रहा था कि तेजी से स्वास्थ्य क्षेत्र में विकास के तमाम दावों के बीच उस कमरे में मौजूद हर व्यक्ति कितना विकल्पहीन है।

मुझे एक पल के लिए लगा कि आपातकालीन कक्ष की यह हालत शायद किसी निर्माण कार्य की वजह से हो। मैंने सोचा कि शायद बच्चों के वार्ड की स्थिति बेहतर होगी। प्रशिक्षु डॉक्टर ने हमें शिशु विभाग में भेज दिया। उसकी स्थिति को शब्दों में लिख पाना कठिन है। शिशु वार्ड में वेंटिलेटर तक की कोई व्यवस्था नहीं थी। चूंकि अस्पताल सरकारी था, इसलिए यह कहना ठीक है कि वेंटिलेटर मशीन खराब थी। उस वार्ड में एक-एक बिस्तर पर तीन-तीन बच्चे लेटे थे। कुछ नवजात थे तो कुछ थोड़े बड़े थे। मेरे साथ नवजात बच्चे की हालत को देखते हुए एक प्रशिक्षु डॉक्टर झल्लाई और कहा कि हमारे पास ऐसी वेंटिलेटर मशीन नहीं है, जिसमें नवजात बच्चों को रखा जाता है। इसके बाद हम आशंका से भर गए। हमने अस्पताल की इस हालत को देखते हुए किसी निजी अस्पताल में जाना ज्यादा बेहतर समझा।

किसी को स्वस्थ बनाने के लिए खुद का स्वस्थ होना जरूरी होता है। लेकिन सरकारी व्यवस्था के तहत चलने वाला यह अस्पताल खुद बीमार था और सैकड़ों लोग यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि यह अस्पताल उनके परिजनों को स्वस्थ बनाएगा। मध्यवर्ग या उच्च वर्ग को सरकारी शब्द से डर क्यों लगता है? वह हमेशा गैरसरकारी व्यवस्था की ओर ही क्यों भागता है, यह सब मैं भुक्तभोगी बन कर ही समझ पाया। मेरे परिवार ने निजी अस्पताल को अपनी अब तक की जमा-पूंजी को चार दिनों में सुपुर्द कर दी। उसके बाद से मैं लगातार सोच रहा हूं कि देश ने व्यापार के क्षेत्र में ज्यादा विकास किया है या स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में, जो जरूरतमंदों को वक्त पर मयस्सर नहीं है।

महात्मा गांधी ने कहा था कि असली भारत गांव में बसता है। अगर यह सच है तो गांव में आज तक स्वास्थ्य सुविधाएं क्यों नहीं पहुंची? लोग अच्छे इलाज की भूख में शहरों या फिर दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पतालों की ओर क्यों भागे चले आते हैं? जबकि यहां से भी कई बार उन्हें निराश लौटना पड़ता है। देश भर में लगातार फल-फूल रहे निजी अस्पतालों के बाजार से यह साफ है कि सरकारी अस्पतालों की स्थिति मरीजों का इलाज कर पाने भर की नहीं है। अगर वहां अच्छा और सुविधापूर्ण इलाज होता तो मध्यवर्ग निजी अस्पतालों की ओर नहीं भागता और साधारण लोगों को निराश नहीं होना पड़ता।

मैं दिल्ली के जिस इलाके में रहता हूं, वहां से थोड़ी ही दूर पर सरकार की ओर से एक बड़े भवन में अस्पताल बना है। बाहर से देखने में यह किसी निजी अस्पताल से कम नहीं लगता है। लेकिन इसके अंदर का हाल बेहाल है। उसे देख कर व्यवस्था की नीयत पर ही संदेह होता है। कई बार ऐसा लगता है कि सरकार की ओर से बनवाए गए अस्पतालों में जानबूझ कर डर पैदा किया जाता है, ताकि भारत के लोग निजी अस्पतालों की ओर रुख करें। यह सोचने की बात है कि जिस देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, जहां लोगों को सरकारी सुविधाएं समय से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं, सरकारी अस्पतालों में एक-एक बेड पर दो या तीन मरीजों का इलाज किया जाता है, वहां सिर्फ मकान की शक्ल में खड़े अस्पताल व्यवस्था की नीयत को खोखला सिद्ध करते हैं।

तेजी से युवा होते देश को क्या अपने हर नवजात के जन्म से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? आखिर कब तक व्यवस्था की वेदी पर एक के बाद एक बच्चे सांस की कमी से दम तोड़ते रहेंगे? आज हकीकत यह है कि गरीब लोग अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त करने की हैसियत में नहीं है। लोकतंत्र में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त करना हमारा हक है। लेकिन यह खुद बीमार है। ऐसी स्थिति में निजी अस्पतालों की शरण में जाना मजबूरी है। मगर यह विकल्प भी आसान नहीं है। इसके लिए कर्ज लेना या घर बेचना एक शर्त की तरह हो गया है।

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