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दुनिया मेरे आगे: संस्कृति के मेले

प्राचीन काल से चली आ रही मेलों की अनूठी भारतीय परंपरा मानव मन के उल्लास और उमंग की तो द्योतक है ही, यह सामयिक संदर्भों से जुड़ने की भी एक जीवंत प्रथा बनी रही है।

इन मेलों के मूल में कोई अंतर्कथा है, संवेदना है और आदि लोक परंपरा है। यही कारण है कि इन मेलों से लोक आस्था आज तक जुड़ी रही है, इसे मिटाना असंभव रहा है।

प्राचीन काल से चली आ रही मेलों की अनूठी भारतीय परंपरा मानव मन के उल्लास और उमंग की तो द्योतक है ही, यह सामयिक संदर्भों से जुड़ने की भी एक जीवंत प्रथा बनी रही है। हालांकि समय-समय पर मेलों का रूप बनता-बिगड़ता और संवरता रहा है, लेकिन उनकी लाक्षणिकता एक ही बिंदु को दर्शाती है और वह है राष्ट्रीय एकता और पारंपरिक सद्भाव का एक मिला-जुला प्रतिरूप। यही वजह है कि मेले आज विज्ञान के युग में भी मानव मन का चाव बनाए हुए हैं तो अक्षुण्ण रूप से अपने स्वरूप को किसी न किसी रूप से साधे हुए हैं।

दरअसल, मेलों का मौसम या तो वर्षा ऋतु की समाप्ति पर देश में विविध रूपों में प्रचलित है या फिर मेले फाल्गुन से शुरू होकर ज्येष्ठ माह तक चलते हैं। फाल्गुन माह तो वैसे भी मौज-मस्ती और रंगों से सराबोर महीना होता है। इस मौसम में जहां फसल पक कर कटने को तैयार रहती है, वहीं बदले मौसमी वातावरण से मन नैसर्गिक रूप से महकने-गमकने लगता है। किसान फसल के पकने की खुशी में अपने कामों को पूरा करते हैं। ये मेले चाहे पशु या कपड़ों की खरीद या फिर बेटे-बेटी के विवाह के रूप में भी हो सकते हैं। कोई सामूहिक आयोजन मेले का रूप धर ही लेता है। वसंत के बाद फाल्गुन में बाग-उपवन में प्राकृतिक रंग चटखने लगते हैं और युवा मन एक अनजाने उत्साह में प्रकृति के साथ घुल-मिल कर जीवन की सरसता में रच-बस जाता है। हमारे देश की संस्कृति में मेलों के सतरंगी रूप देखने को मिलते हैं। यों मेलों का ग्राम्य स्वरूप मशहूर रहा है, लेकिन अब शहरों में भी आधुनिकतम सुख-सुविधाओं के साथ मेलों का प्रचलन चल निकला है। इसके बावजूद ग्रामीण मेलों का अपना मौलिक आनंद है।

इन मेलों के मूल में कोई अंतर्कथा है, संवेदना है और आदि लोक परंपरा है। यही कारण है कि इन मेलों से लोक आस्था आज तक जुड़ी रही है, इसे मिटाना असंभव रहा है। भारतीय ग्रामीण मेलों के मूल में या तो कोई धार्मिक कारण है या फिर आर्थिक खुशहाली का पूर्वानुमान। आमतौर पर देश में मेलों में पशुओं की खरीद भी यहां बहुतायत से देखी जा सकती है। विविध मनोरंजन प्रधान कार्यक्रम होते हैं और दुकानें सजी रहती हैं। चूंकि ग्रामीण फाल्गुन माह से कृषि कार्य से निपटने लगता है, इसलिए वह ज्येष्ठ तक लगभग फुरसत में रहता है। इन मेलों में उसका चाव इन चार-पांच महीनों तक लगातार बना रहता है।

हमारे मेलों में मुख्य रूप से ग्रामीण सौंदर्य सामग्री, लकड़ी-मिट्टी के खिलौने, मिठाइयों की दुकान, बने-बनाए सस्ते-मोटे रेजे के कपड़े और खेती-बाड़ी के काम में आने वाले औजारों की बिक्री देखी जाती है। ये मेले एक दिन की अवधि से लेकर एक सप्ताह तक की अवधि तक के लिए भी होते हैं। ग्रामीण मेलों की खासियत युवक-युवतियों की टोलियां भी होती हैं जो अकसर लोकगीत टेरती हैं यानी लोकगीत से लोगों का ध्यान खींचती हैं। कई बार इन टोलियों में गायन प्रतियोगिताएं भी होती हैं। कुश्तियों के आयोजन से लेकर ऊंट और घोड़ा-दौड़ इतनी रोमांचक होती है कि घंटों तक हजारों लोग इनका आनंद लेते हैं। रहटों की चरमराहट और गुब्बारे वालों का शोर वातावरण को एक अजीब-सी गीतात्मक खनक प्रदान करते हैं। चाट-पकौड़ी और आइसक्रीम बेचने वालों की आवाजें लोकांचल को सतरंगा रूप प्रदान करती हैं।

धार्मिक मेलों में लोक देवी-देवता के स्थल की पूजा-अर्चना का प्रचलन है। मेलों का सरताज विराट कुंभ ही नहीं, देश में अनेक मेले किसी तालाब और नदी किनारे किसी धार्मिक और आध्यात्मिक कारणों को लेकर आयोजित होते देखे गए हैं। वहां हजारों की संख्या में लोग स्नान कर अपनी यात्रा को सार्थकता प्रदान करते हैं। देश में ऐसे कई मेले हैं, जिन्हें लक्खी मेला कहा जाता है। ऐसे मेलों का महत्त्व किसी खास स्थानीय महत्ता के कारण नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्रीय वैचारिक मतैक्य के कारण होता है। ऐसे स्थलों पर देश-भर से हर जाति और हर वर्ग के और सारे भाषा-भाषी लोग पहुंचते हैं।

हालांकि कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित होने वाले मेलों में निहायत ग्राम्य परिवेश ही देखने को मिलता है, लेकिन अब धीरे-धीरे शहरी संस्कृति भी घुलने-मिलने लगी है। प्लास्टिक के दिखावटी सामान गांवों के हर घर में पहुंच गए हैं। यही हाल कपड़ों, रिबन, नाखूनी, बिंदी, लिपस्टिक और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों का है। खान-पान की चीजें भी ग्राम्य परिवेश से हट कर शहरी वातावरण को छूने लगी हैं। आज आवश्यकता है इन मेलों के आदि-स्वरूप को बचाने और उसे संवारने की, तभी मेलों का जीवन बचा रह सकेगा। वरना कृत्रिमता के हावी होने के साथ इनकी जीवंतता भी मिटने लगेगी। मेले हमारी संस्कृति, सामाजिक और राष्ट्रीय एकता के जीते-जागते प्रमाण हैं। इन्हें वैयक्तिक से लेकर सरकारी स्तर तक के प्रोत्साहन की जरूरत है।

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