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दुनिया मेरे आगे: सभ्यता की राह

आज हम तकनीक की दौड़ में शामिल हैं। मशीन ही जीवन बनता जा रहा है और भावनाएं कोने में सिमटती जा रही हैं। रिश्ते-नाते, माता-पिता इन सभी से हमारा संपर्क अब डिजिटल माध्यम में कैद होता जा रहा है।

Author June 12, 2018 5:22 AM
प्रतीकात्म तस्वीर।

अंबालिका

हाल ही में मेरे घर के बरामदे में एक चितकबरी बिल्ली ने चार बच्चों को जन्म दिया। बहुत ही प्यारे दिखने वाले ये बच्चे मां की छाती से चिपके रहते हैं। बच्चों को सुरक्षा देने के लिए उनकी मां हमेशा उनके पास ही बैठी रहती है। एक दिन उसका यह स्वभाव मुझे चिंतित करने लगा कि बिना कुछ खाए-पिए ये दो दिनों से लगातार कैसे बैठी है! मैंने एक कटोरे में उसके सामने दूध रख दिया। पहले वह घबराई, फिर धीरे-से सारा दूध पी गई। मैं उसे दूध देती रही। जितनी देर उसे दूध पीने में लगती, बस उतनी ही देर, वह हिलती थी।
यह देखते हुए मुझे यही समझ आया कि प्रकृति में मातृत्व एक ऐसी देन है, जिसकी तुलना मानव जीवन के किसी और पहलू से नहीं की जा सकती। एक छोटा-सा जीव भी अपने बच्चे को हृदय से लगा कर रखता है। ममता का अहसास इतना संवेदना से भरा होता है कि एक पशु भी इससे बाहर नहीं जा सकता। हालांकि उसे एक जीव के रूप में देखने पर यह सहज बात लगती है। जीव-जगत की निरंतरता के लिए संतति की उत्पत्ति सर्वोच्च स्थान रखती है। पता नहीं यह कैसे हुआ कि हमने स्त्री या मादा को कमजोर मानना शुरू कर दिया। स्त्री और पुरुष की लड़ाई में पुरुष को बलशाली घोषित कर देना समाज को स्वीकार हुआ, लेकिन सच यह है कि स्त्री का बल परोक्ष रह कर जीवन गति को ढोता आ रहा है।

स्त्री जन्म देना और पालना जानती है। यह वह शक्ति है जो अपने अंश को प्रेम के झरने में डुबोए रखती है। अपने बच्चे को अच्छी परवरिश देने की हर संभव कोशिश करती है। अपने बच्चे के लिए हमेशा दुनिया से लड़ने के लिए तैयार रहती है। फिर भी यह समाज कहता कि औरत कमजोर होती है! अगर औरत कमजोर होती तो यह समाज कैसे बनता? तमाम कष्ट सह कर औरत बच्चे को जन्म देती है। प्रसव में होने वाले दर्द का अंदाजा कोई पुरुष नहीं लगा सकता। इस दर्द में एक औरत जो दर्द सहती है, उसे पीड़ा मापने की इकाई पर दस डेल तक माना जाता है। जबकि एक साधारण मनुष्य के दर्द सहने की क्षमता सात डेल ही मानी जाती है। इससे ज्यादा हो तो उसकी मौत हो सकती है। दुनिया में मनुष्य प्रजाति को आगे बढ़ाने के लिए स्त्री जो दर्द सहती है, वह जीवन के लिए प्रेम है जो शायद दुनिया की सभी पीड़ा पर भारी पड़ती है।

जब विचार जगत में ये बिंदु घूमने लगते हैं तो मुझे लोगों के मर्द होने का घमंड बहुत तुच्छ लगने लगता है। समाज में पुरुषों ने अपनी सुविधा की सत्ता गढ़ ली और स्त्री को कमतर का दर्जा दे दिया। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जो एक पुरुष के जीवन का स्रोत है, उसे ही दोयम दर्जे पर खड़ा कर दिया गया। सच यह है कि औरत को दबा कर रखने को ताकत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। स्त्री को व्यक्ति के रूप में स्वीकार करना और उसके वजूद की कद्र करना सच्ची ताकत है। सच कहूं तो दुख होता है जब स्त्री खुद अपने भरोसे और ताकत को नहीं समझ पाती और पुरुषों के हाथों प्रताड़ित होकर भी चुप रहती है। ताकत भले बाजुओं बसती हो, लेकिन हिम्मत दिल में होता है। स्त्री ऊर्जा और हिम्मत की मिसाल है, प्रकृति की व्यवस्था में सकारात्मकता की प्रतीक है। उसे सिर्फ देना आता है। किसी विद्वान ने कहा है कि स्त्री को तुम जो भी दोगे, वह उसे दुगना करके वापस करेगी। प्रेम, जीवन और आशा स्त्री का ही नाम है। मातृत्व स्त्री का वह रूप है जो हरेक कष्ट को सह कर भी अपने संतान को सुख देती है।

आज हम तकनीक की दौड़ में शामिल हैं। मशीन ही जीवन बनता जा रहा है और भावनाएं कोने में सिमटती जा रही हैं। रिश्ते-नाते, माता-पिता इन सभी से हमारा संपर्क अब डिजिटल माध्यम में कैद होता जा रहा है। इसके बावजूद वह सिर्फ मां ही है जो आज भी मातृत्व के माध्यम से जुड़ कर ही अपने बच्चों को प्यार करती है। स्त्रीत्व और मातृत्व प्रकृति की कभी न मिटने वाली देन हैं। इनको छोटा समझने वालों की सोच न केवल संकुचित है, बल्कि वे जीवन की गति को भी नहीं समझ पाते हैं। औरत को कमजोर और हीन समझने वाले समाज का सभ्य होना अभी बाकी है। नया जीवन देने वाली शक्ति कभी कमजोर नहीं हो सकती है। सदियों से एक पुरुष दृष्टि से समाज के विकास ने आज बहुत सारी स्त्रियों को अपनी दृष्टि से समाज की परतों पर विचार करने पर मजबूर कर दिया है। स्त्री के भीतर से उभरे इस भरोसे की वजह से कुछ टकराव भी सामने आ रहे हैं। लेकिन इतना तय है कि स्त्री का आत्मविश्वास और उसकी दृष्टि न्याय आधारित एक बेहतर समाज के सपने को ही साकार करेगा।

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