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दुनिया मेरे आगेः अवसाद के पांव

मैंने गौर किया कि एक दोस्त पिछले कुछ दिनों से कम बोलने लगा था। बातचीत में उदासीन दिखता था और कई बार तनाव उसके चेहरे से झलक जाता था। मैंने कारण पूछा तो वह टाल गया।

Author July 4, 2018 04:19 am
प्रतीकात्मक चित्र

अश्विनी शर्मा

मैंने गौर किया कि एक दोस्त पिछले कुछ दिनों से कम बोलने लगा था। बातचीत में उदासीन दिखता था और कई बार तनाव उसके चेहरे से झलक जाता था। मैंने कारण पूछा तो वह टाल गया। दरअसल, देश में लोग मानसिक बीमारियों के बारे में ज्यादा बात नहीं करते हैं। एक आम धारणा यह है कि अगर किसी को कोई मानसिक बीमारी है तो ऐसा जरूर उसकी गलतियों की वजह से हुआ होगा। देश में मानसिक रोगियों का इलाज कराने की जगह लोग उन्हें ताने मारते हैं और उनका मजाक उड़ाते हैं। हालत यह है कि मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। किसी के भी घर में ऐसा सदस्य हो सकता है जो तनाव के दौर से गुजर रहा हो, क्योंकि तनाव एक ऐसी बीमारी होती है जिसके बारे में शुरुआती कुछ वर्षों में पता नहीं चलता।

हम कई बार यह सोचते रहते हैं कि अमुक व्यक्ति इतना गुस्से में या फिर अकेला क्यों रहता है? लेकिन हम यह नहीं सोचते कि वह व्यक्ति तनाव का शिकार हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में भारत में पांच करोड़ लोग तनाव के मरीज थे। ऐसे लोग तनाव की वजह से अपना सामान्य जीवन भी नहीं जी पा रहे हैं। दक्षिण एशियाई देशों में सबसे ज्यादा तनाव के मरीज भारत में ही रहते हैं। इनमें से ज्यादातर घबराहट के शिकार हैं। चिंता से जुड़ी घबराहट कई बार इतनी बढ़ जाती है कि व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेता है। देश में नौ करोड़ लोग ऐसे हैं जो किसी न किसी तरह की मानसिक परेशानी का सामना कर रहे हैं और अपना सामान्य जीवन नहीं जी पा रहे हैं।

ऐसे लोगों को समझने के बजाय उनसे परिवार और दफ्तर के लोग परेशान रहते हैं। पूरी दुनिया में बत्तीस करोड़ लोग तनाव के शिकार हैं। इनमें से पचास फीसद केवल भारत और चीन में रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2005 से 2015 तक पूरी दुनिया में तनाव के मरीजों की संख्या उन्नीस फीसद तक बढ़ गई है। इन आंकड़ों के अनुसार, अठहत्तर फीसद आत्महत्या कम और मध्यम आय वाले देशों में होती है। भारत भी एक निम्न मध्यम आय वाला देश है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के मुकाबले भारतीयों ने 2016 में तनाव की दवाइयों का अधिक सेवन किया। ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस’ के मुताबिक भारत में हर बीस में से एक व्यक्ति तनाव का शिकार है।

विडंबना यह है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा बात नहीं होती और सरकारें भी इस तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं देती हैं। भारतीय परिवारों में लोग अकसर अपनी मानसिक परेशानियों को एक-दूसरे के साथ साझा नहीं करते हैं। छोटी-छोटी बातों पर तनाव में चले जाना हमारा स्वभाव बनता जा रहा है। छोटी उम्र से ही तनाव हम पर हावी होने लगा है और उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह कई दूसरी बीमारियों की वजह बन जाता है। आंकड़ों के मुताबिक बेशक भारत में तनाव के पांच करोड़ मरीज हों, लेकिन यह आंकड़ा और भी बड़ा हो सकता है, क्योंकि देश में मानसिक परेशानियों के ज्यादातर मामले डॉक्टरों तक कभी पहुंचते ही नहीं हैं। बहुत सारे मामलों में यह पता ही नहीं चलता कि व्यक्ति तनाव का शिकार है और उसे इलाज की जरूरत है।

भारत युवाओं का देश है। हमारा सोशल मीडिया का दायरा तो हर दिन बड़ा हो रहा है, लेकिन किसी से मिल कर अपने दिल की बात कहने वाला नेटवर्क दिनोंदिन छोटा होता जा रहा है। यों अब आत्महत्या जैसे कदम उठाने वाले लोगों की पहचान करने के लिए सॉफ्टवेयर की मदद भी ली जा रही है। फेसबुक समेत कई सोशल मीडिया के मंच अब कृत्रिम बुद्धि की मदद से ऐसे सॉफ्टवेयर तैयार कर रहे हैं, जो पहले ही यह चेतावनी दे देंगे कि फलां यूजर आत्महत्या कर सकता है। फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने बीस लाख ऐसे मरीजों का आंकड़ा इकट्ठा किया, जो मानसिक रूप से परेशान थे और फिर सॉफ्टवेयर की मदद से यह जानने की कोशिश की गई कि उनमें से कितने मरीज आत्महत्या कर सकते हैं। सॉफ्टवेयर विश्लेषण से जो नतीजे सामने आए, वे अस्सी से नब्बे फीसद तक सही थे।

लेकिन अवसाद को रोकने के लिए कंप्यूटर की मदद लेने के बजाय हमें अपने आसपास के लोगों की मदद लेनी चाहिए। कृत्रिम बुद्धि और कृत्रिम भावनाओं की जगह असली भावनाओं का मोल पहचानना चाहिए। तनाव लाइलाज बीमारी नहीं है। इसे परामर्श और कुछ दवाओं के जरिए ठीक किया जा सकता है। इसके इलाज में आपस में की गई बातचीत सबसे ज्यादा मदद कर सकती है। जरूरी काम को बेहतर तरीके से करने के लिए थोड़ा तनाव लेना जरूरी भी होता है। लेकिन जब यह तनाव जिंदगी पर भारी पड़ने लगे तो इसे छोड़ने में ही फायदा है।

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