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हाशिये की कला

गायन-वादन में पारंगत ये कलाकार ठाढ़ी और मीरासी नामों से जाने जाते हैं। हालांकि ये मुसलिम धर्मावलंबी है, लेकिन हिंदुओं के सभी शुभ कार्यों में शरीक होकर ये लोग अपना पारंपरिक गायन करते हैं

चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गयाहै।

राजस्थान कलाओं का घर है और यहां की कलाएं और उनके कलाकार विश्व में अपनी मौलिकता के कारण जाने जाते हैं। पश्चिमी राजस्थान में रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले हैं और प्राकृतिक सुरम्यता की दृष्टि से इस क्षेत्र को वर्षा की कमी सदैव खलती रही है। लेकिन इनका कलात्मक वैभव अतुलनीय है। सभी क्षेत्रों में यहां गायन-वादन की अनूठी परंपराएं प्रचलित हैं और शुष्क प्रदेश होने के बाद भी यहां के निवासियों में संगीत की नमी की गंगा सदैव प्रवाहित रहती है।

गायन-वादन में पारंगत ये कलाकार ठाढ़ी और मीरासी नामों से जाने जाते हैं। हालांकि ये मुसलिम धर्मावलंबी है, लेकिन हिंदुओं के सभी शुभ कार्यों में शरीक होकर ये लोग अपना पारंपरिक गायन करते हैं। यहां तक कि धार्मिक रात्रि जागरण आदि के मौके पर भी ये श्रद्धापूर्वक भजन-कीर्तन करते हैं। मगर दुर्भाग्य इस बात का है कि सदियों से पारंपरिक संगीत और उसके प्राचीन वाद्यों को बचाए रखने के बाद भी इनकी समृद्धि के लिए सरकारी स्तर पर ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं और ये वही विरासत में मिला अपना विपन्नतापूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं।

सरकार अगर इन्हें प्रोत्साहन दे तो इनकी कला को बचा कर एक अहम सांस्कृतिक थाती को बचाया जा सकता है। वरना एक-दो पीढ़ी के बाद इन कलाकारों की कला खत्म हो जाएगी और लोक कलाओं के प्रतीक इन कलाकारों से भी कला जगत हाथ धो बैठेगा। ये कलाकार, सुरवाई, कमावचा, सारंगी, अलगोजा और खड़ताल जैसे प्राचीन दुर्लभ वाद्यों को बजाते हैं और इन पर लोकधुनों में चिरनी, निंबोली, हिचकी, माचवो और बायरियो जैसे लोकप्रिय लोकगीतों को गाते हैं। इन वाद्यों के साथ इनकी सुरीली आवाज की पारंपरिक गायन केवल इन्हीं के मुंह से भला लगता है। विरह वेदना और पे्रम के आख्यानों को गीतों में गूंथ कर जब वे गीत अलापते हैं तो वातावरण में अजीब खनक के साथ सुनने वालों के कान सन्नाटे में बंध जाते हैं- ‘साजन आया है सखी/ काई मनुहार करूं/ थाल भरूं गज मोतियां/ ऊपर नैण धरूं…!’

भावात्मक ऊंचाई का भी इन लोक गीतों में कोई मुकाबला नहीं है। जब वे भावातिरेक में जाकर इन लोक गीतों को साजों पर छेड़ते हैं तो मन के वीणा के तार झंकृत हो जाते हैं। पे्रम के अलावा प्राकृतिक आपदा और वैभव पर भी इनका कला स्वरूप बहुत ही समृद्ध है, वह पणिहारी में हो या फिर जेठता-ऊजली या फिर ढोला-मारू के पारंपरिक पे्रमाख्यानों में ही तिरोहित क्यों न हो! राजस्थानी के ठेठ शब्दों में पाई जाने वाली ये गीतिकाएं इतनी प्रबल मार्मिक होती हैं कि इन्हें सुन कर पत्थर दिल भी एक बार हिल जाए। इन पारंपरिक कार्यों के साथ हारमोनियम ढोलक और मजीरों का प्रयोग नूतन भाव-बोध भी प्रदान कर रहा है और अब इनमें सामयिक युग चेतना का स्वर भी प्रस्फुटित होने लगा है। पश्चिमी राजस्थान में बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर संभागों में ऐतिहासिक स्थलों की बहुलता के कारण पर्यटकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है।

लेकिन यह इन कलाकारों का जीवन स्तर उठाने के लिए पर्याप्त नहीं है। किसी तरह इनकी केवल आजीविका ही चल पाती है। पर्यटकों का हाल यह है कि वे इनका गायन-वादन सुन कर मस्ती में झूम उठते हैं और बहुत ही हैरत में रह जाते हैं। वे लोक कला को समर्पित इन कलाकारों के चातुर्य पर मोहित हो जाते हैं और आश्चर्य करते हैं कि इतने बड़े कला साधक किस तरह का निम्न जीवन जी रहे हैं।

यों भी ऋतु के अनुकूल ये गायक अपना गायन घरों में शौकिया रूप से करते हैं। वर्षा ऋतु आई नहीं कि इनके अलगोजे विरहणियों की गाथाएं गाने लगते हैं। जिस संस्कृति को वे लोग जीवंत करते हैं, वह हमारी अपनी ही प्राचीन संपन्न लोक संस्कृति है, जिसे नई पीढ़ी ने भुला दिया है। आज भी मांगणियारों, मीरासियों और डाढ़ियों का मुख्य पेशा शादी-ब्याह, पुत्र जन्म और अन्य मांगलिक कार्यों के समय गाकर आजीविका जुटाना है। आवश्यकता इन्हें आवश्यक वाद्य सुलभ करवा कर और आर्थिक सहायता देकर इनकी कला को समुचित संरक्षण प्रदान करने की है। अन्यथा लोक गीतों के चितेरे इन कलाकारों ने अपनी आजीविका आसन्न संकट में बदल ली तो यह बची-खुची कला भी लुप्त हो जाएगी। यों भी, आय के अभाव में नई पीढ़ी के लोग दूसरे काम अपनाने लगे हैं।

इनके बच्चों की निशुल्क शिक्षा और इनकी ढाणियों में स्कूलों की व्यवस्था समय की आवश्यकता है। आज मांगणियार, मीराती और डाढ़ी सारे समाज से मिल-जुल कर सांस्कृतिक एकरूपता में घुले-मिले हैं। उनका रहन-सहन, खान-पान तथा पहन-पहनावा ठीक वहां के दूसरों लोगों की तरह ही है। सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक इन लोक कलाकारों के कल्याण की दिशा में सोचा जाना चाहिए, इनके विकास और हित के लिए कारगर योजनाएं बनानी चाहिए।

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